मुझे मेरे मां-बाप चाहिए

Samachar Jagat | Monday, 27 May 2019 03:52:34 PM
I want my parents

यह कोई कहानी नहीं है, कोई प्रसंग नहीं है वरन् हकीकत है। कुछ दिनों पहले मेरे ऑफिस में एक नौजवान जो कहीं नौकरी करता है, आया। उसकी बॉडी लैंक्बेज से ऐसा लग रहा था कि वह काफी आहत था। ऐसा भी लग रहा था कि उसने न कुछ खाया था और न ही स्नान किया था। ऑफिस में वह लड़खड़ाते कदमों से और धीरे से नमस्कार किया, मैंने उसे इस तरह पहली बार देखा था, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही नौजवान है। जो हमेशा हंसता-खिलता आया करता है।

 खैर, मैंने उसे बड़ी ही आत्मियता से बैठने को कहा। उसके मुंह से कुछ शब्द निकलने से पहले उसकी आंखों से आंसू निकलने क्या बहने लगे। मैंने स्थिति को भांप कर, उसके सिर पर आत्मियता से हाथ फेरा और इसी आत्मियता से वह फूट पड़ा। समय और आत्मियता बड़े से बड़ा घाव भर देते हैं। वह कुछ समयोपरांत कुछ नॉर्मल हुआ और बोला- सर, प्लीज मेरे बेटे की टी.सी. दे दो। बड़े आग्रह से वह बोला सर मुझे अब यहां नहीं रहना है। मैंने उसी आग्रह से उससे कहा कि टी.सी. कोई मैटर नहीं है, यह तो मिल जाएगी। आपको स्कूल से कोई शिकायत है या अन्य कोई बात है। वह रुंधे गले से बोला- सर मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरा बेटा आपके आशीर्वाद और दिशा निर्देशन में बारहवीं तक यहीं पढ़े, इसमें न केवल गुणात्मक सुधार आया है, बल्कि संस्कारों को लेकर यह बहुत संवेदनशील सुशील और विनयशील बना है। मैं इसे पढ़ाना तो यहीं चाहता हूं।

जब मैंने उससे इसका मूल कारण पूछा तो वह एक बार फिर से फफक-फफक कर रोने लगा और कहने लगा कि मैं आज रात भर घर के बाहर गैरेज में बिना खाये फर्श पर लेटा रहा, हमारी भाइयों में आपस में अनबन हो गई और मुझे ऐसे बोला गया, वैसे बोला गया और बात बंटवारे तक जा पहुंची। बीच-बीच में वह यह भी कह रहा था कि क्या इसी दिन के लिए मां-बाप न हमें बड़े कष्टों को झेलते हुए पढ़ाया था और आगे बढ़ाया था। 

उसने आगे कहा कि मैंने अपने भाई से कह दिया है कि मुझे कुछ नहीं बंटवाना है, मुझे न घर चाहिए, न प्लॉट चाहिए और न ही कोई अन्य प्रोपर्टी चाहिए, मुझे तो केवल मेरे मां-बाप चाहिए जिन्होंने मुझे अपने लहू से सींचा, स्नेह और आत्मियता से पाला-पोसा, आगे बढ़ाया, पढ़ाया और मैं जो कुछ हूं, केवल उन्हीं की बदौलत हूं और अब मेरे बच्चे दूर गांव में मेरे माता-पिता की छांव में पढ़ेंगे और मुझे भी अपना कुछ फर्ज निभाने का अवसर मिलेगा। यह शहर की बनावटी, कोरी और स्वार्थी जिंदगी किस काम की। ऐसा कहकर वह धीमे-धीमे कदमों से लौटने लगा अपने मां-बाप की ओर, काश सभी लोग भी ऐसा सोचें और करें।

प्रेरणा बिन्दु:- 
मां की लोरी जय श्रीकृष्णा
पिता की उंगली जय श्रीकृष्णा
मात-पिता सा ना कोई
साथ उन्हीं से जीवन हर जय श्रीकृष्णा।



 

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