भारत-जापान में ऐतिहासिक असैन्य परमाणु करार

Samachar Jagat | Tuesday, 15 Nov 2016 01:23:06 PM
भारत-जापान में ऐतिहासिक असैन्य परमाणु करार

जापान ने अपने परंपरागत रुख से हटकर पिछले सप्ताह शुक्रवार को भारत के साथ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु सहयोग करार पर हस्ताक्षर किया जिसके साथ ही परमाणु क्षेत्र में दोनों देशों के उद्योगों के बीच गठजोड़ के लिए दरवाजे खुल गए। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने के लिए नौ अन्य समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए।

 अपने जापानी समकक्ष शिंजो आबे के साथ विस्तृत बातचीत के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौतों में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग से जुड़ा करार शामिल है, जो स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी के निर्माण के संदर्भ में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है। दोनों देशों के बीच छह साल से अधिक समय की गहन बातचीत के बाद दोनों देशों ने परमाणु करार पर हस्ताक्षर किए है। 

मोदी के साथ साझा प्रेस वार्ता में आबे ने कहा कि परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उद्देश्य से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने से वह बहुत प्रसन्न है। जापानी प्रधानमंत्री ने कहा कि यह समझौता एक कानूनी ढांचा है कि भारत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उद्ेदश्य को लेकर तथा परमाणु अप्रसार की व्यवस्था में भी जिम्मेदारी के साथ काम करेगा। हालांकि भारत एनपीटी में भागीदार अथवा हस्ताक्षर कर्ता नहीं है।

 आबे ने कहा कि यह परमाणु करार विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की जापान की आकांक्षा के अनुरूप है। यहां यह उल्लेखनीय है कि परमाणु प्रसार को लेकर जापान का पारंपरिक तौर पर कड़ा रुख रहा है क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उसने परमाणु बम हमले की त्रासदी झेली है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह समझौता होने से अमेरिकी कंपनियों को भारत में परमाणु संयंत्र स्थापित करने का रास्ता साफ हो गया है। 

दो बड़ी कंपनियां इसलिए भारत को रिएक्टर नहीं बेच पाई, क्योंकि उनमें जापानी कंपनी हिताची और तोशिबा की भी हिस्सेदारी है। जापान परमाणु मुद्दे पर अत्यधिक संवेदनशील रहता है। वजह यही है कि वह एकमात्र देश है जिस पर परमाणु बम गिराए गए और जिसके प्रभावों से वह आज तक नहीं उबरा है। इसलिए असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता उसने उन्हीं देशों से किए हैं, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए हैं। 

भारत उन देशों में नहीं है। मगर जब अमेरिका से असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता हुआ, तब भारत ने आगे परमाणु परीक्षण नहीं करने का एकतरफा वचन दिया था। इसे अमेरिका सहित कई देशों ने मंजूर किया। 

लेकिन जापान नहीं माना। तो वह चाहता है कि भारत और जापान के बीच समझौता हो, उसमें यह स्पष्ट लिखा हो कि भारत ने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया तो यह समझौता रद्द हो जाएगा। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे पिछले साल दिसंबर में भारत यात्रा पर आए थे। तब इस समझौते पर दस्तखत होने की आशा जताई गई थी। लेकिन जापान की उसी मांग को लेकर मामला फंस गया था। 

अब जापान के प्रमुख अखबार ‘योमियुरी शिंमबुन’ ने खबर दी थी कि मोदी और आबे शुक्रवार को इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे और उसके कथनानुसार शुक्रवार को हस्ताक्षर हो भी गए। तो प्रश्न उठता है कि आखिर किसने अपनी शर्त छोड़ी? क्या भारत ने जापान की मांग मानली, अथवा नरेन्द्र मोदी सरकार जापान को समझाने में सफल रही है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से जापान से भारत के संबंध सुदृढ़ हुए हैं। इसका कारण चीन के प्रति दोनों देशों की आशंकाएं हैं। जापान और आस्ट्रेलिया पहले से अमेरिकी धुरी का हिस्सा रहे हैं। पिछले दो साल में भारत इस ओर बढ़ा है। 

भारत जापान में नए रिश्ते बनना और पुराने रिश्तों का नए स्तर पर पहुंचना इस घटनाक्रम का तार्किक परिणाम है। जापान और भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दोनों अमेरिका के दोस्त है। बल्कि पिछले दो-ढ़ाई साल में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका-जापान-आस्टे्रलिया तथा भारत एक धुरी का हिस्सा बनते नजर आ रहे हैं। चीन की ताकत को नियंत्रित रखने में ये सभी देश अपने हित समझते हैं। 

ऐसी मान्यता है कि भारत और जापान के बीच परमाणु सहयोग समझौते से अमेरिकी कंपनियों को खास फायदा होगा। अत: अनुमान है कि अमेरिका ने दोनों देशों को प्रोत्साहित किया। उल्लेखनीय है कि भारत ने पहले ही जापान और अमेरिका की कंपनियों हिटाची और जेनरल इलोक्ट्रॉनिक्स के साझा उद्योग को परमाणु संयंत्र के लिए जमीन दे चुका है। इसके अलावा तोसिबा वेस्टिंग हाउस को भी भारत में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए जमीन दी है। तात्पर्य यह है कि भारत और जापान के बीच परमाणु सहयोग की जमीन पहले ही तैयार हो चुकी थी। 

अब इसे अगले चरण में ले जाया जाना है। आशा है कि इस समझौते से दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सहयोग और गहराएगा, जो दोनों देशों के हित में है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समझौते के लिए जापान के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि ‘‘मैं प्रधानमंत्री आबे, जापान सरकार और जापान की संसद का इस समझौते का समर्थन करने के लिए धन्यवाद देता हूं।’’ इस समझौते के अलावा दोनों देशों के बीच विनिर्माण, कौशल हस्तांतरण प्रोत्साहन कार्यक्रम को लेकर भी एक अहम करार किया गया।

 जिसके तहत दस साल में 30 हजार भारतीय युवाओं को जापानी शैली विनिर्माण करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके साथ ही इसरो और जापानी अंतरिक्ष ऐजेंसी जाशा के बीच उपग्रहों की खोज, संयुक्त मिशन चलाने, समुद्री और पृथ्वी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि, मछली पालन, कपड़ा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा परिवहन एवं शहरी विकास के निवेश एवं ढांचागत विकास के समझौतों पर भी दस्तखत किए गए। गुजरात सरकार और जापान के बीच शिक्षा, व्यवसाय एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान को लेकर भी एक करार पर हस्ताक्षर किए गए। 

एक करार भारत में रेलवे एवं परिवहन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास, बंदरगाहों, हवाई अड्डों के निर्माण और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग व निवेश बढ़ाने के लिए है। कुल मिलाकर सभी दस समझौते दोनों देशों के हित में है।

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