भारत सऊदी और इराक से बढ़ाएगा तेल आपूर्ति

Samachar Jagat | Tuesday, 07 May 2019 04:24:56 PM
India will increase oil supply from Saudi and Iraq

इरान से कच्चे तेल की खरीद पर लगी अमेरिकी पाबंदी से भारत समेत 8 देशों को मिली छूट दो मई को खत्म हो गई है। ऐसे में भारत ने खाड़ी में तेल के बड़े उत्पादक देशों सऊदी अरब, इराक और यूएई से आपूर्ति बढ़ाने का संकेत दिया है। अगर सऊदी अरब की अगुवाई वाले संगठन ओपेक और रूस जैसे सहयोगी देश भारत और चीन को तेल आपूर्ति नहीं बढ़ाते हैं तो कीमतों में तेज उछाल आने की आशंका है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी खाड़ी देशों पर आपूर्ति बढ़ाने का दबाव डाला है। पेट्रोलियम मंत्रालय साफ कर चुका है कि कच्चे तेल की आपूर्ति में कोई कमी नहीं आएगी। दूसरे तेल उत्पादक देशों से इस कमी को पूरा कर लिया है। रिफाइनरी मांग को पूरा करने में सक्षम है।

इस बारे में अधिकारियों का कहना है कि तेल की उपलब्धता नहीं बल्कि परिवहन खर्च की चिंता का कारण है। ईरान की तरह दूसरों से 3-4 डालर की छूट मिलती है तो परिवहन लागत से संतुलन बिठाया जा सकता है। यहां यह बता दें कि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। अभी 72.8 डालर प्रति बैरल है कच्चे तेल के दाम। जनवरी में 58 डालर प्रति बैरल था। भारत की जरूरत की 10 फीसदी आपूर्ति अब तक ईरान से हो रही थी। 2018-19 में 107 अरब डालर तेल खरीद पर खर्च होगा, जबकि पिछले वर्ष 2017-18 में यह 87 अरब डालर था। ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति इसलिए अहम थी क्योंकि ईरान तेल खरीद पर अतिरिक्त छूट देता है। 

यही नहीं ईरान का कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरी के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इसके अलावा ईरान भारत को भुगतान के लिए ज्यादा समय देता है और वह कुछ भुगतान भारतीय मुद्रा रुपए में भी स्वीकार करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत, चीन और जापान जैसे बड़े खरीदारों को ईरान से आपूर्ति बंद होने के बाद अगर दूसरे देश आपूर्ति नहीं बढ़ाते हैं तो कच्चा तेल सौ डालर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। इससे भारत ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। भारत, चीन, जापान समेत तमाम देशों की अर्थव्यवस्था तेल आयात पर निर्भर है। दाम बढ़े तो पेट्रोल-डीजल समेत सभी वस्तुओं व सेवाओं की महंगाई भी तेजी से बढ़ेगी। इससे हमारी जेब भी काफी हल्की हो जाएगी। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कच्चा तेल सौ डालर प्रति बैरल पहुंचता है तो रुपया तेजी से लुढक़ सकता है। 

जिससे भारत को आयात के बदले ज्यादा पूंजी चुकानी होगी और शेयर बाजार भी नीचे आने की आशंका है। हालांकि निर्यात में लाभ होगा। इसके अलावा भारत जैसे देशों का व्यापार घाटा, राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ेगा और मुद्राएं नीचे आएंगी। इससे केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाने को मजबूर होंगे। ब्याज दर बढ़ने से होम, पर्सनल, ऑटो लोन और उद्योगों के लिए लागत बढ़ेगी। यही नहीं कच्चे माल की लागत बढ़ने से उद्योग उत्पादन में कमी लाते हैं या उत्पादों के दाम बढ़ाते हैं तो झटका लगेगा।

इसके कारण उपभोक्ता कम खर्च करते है तो उत्पाद सेवाओं की बिक्री पर असर पड़ेगा और उससे विकास दर नीचे आएगी। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से भारत ही नहीं पूरी दुनिया में विकास दर घट सकती है जो अमेरिका-चीन में व्यापार युद्ध से पहले ही दबाव में है। महंगाई बढ़ने से यूरोप और अमेरिका से भारत को निर्यात आर्डर में कमी आ सकती है। यहां यह बता दें कि भारत ने अमेरिका से तेल-गैस खरीद तेजी की है। अमेरिका ने भारत को तेल की बिक्री 2017 में शुरू की थी, दो साल में ही उसकी बिक्री चार गुना बढ़ाकर वर्ष 2018-19 में 64 लाख टन पहुंच गई है। जबकि वर्ष 2017-18 में उसने सिर्फ 14 लाख टन कच्चे तेल को भारत भेजा था। जो भी हो भारत को अपनी जरूरत का तेल प्राप्त करने के लिए तेजी से नए प्रयास करने पड़ेंगे।



 

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