‘फेक न्यूज’ से भारतीयों का सामना सबसे ज्यादा

Samachar Jagat | Tuesday, 12 Mar 2019 10:29:19 AM
Indians face most with 'Fake News'

‘फेक न्यूज’ से भारतीयों का सामना सबसे ज्यादा होता है। माइक्रोसॉफ्ट की ओर से 22 देशों में की गई रायशुमारी में 64 फीसदी भारतीयों ने सोशल मीडिया पर ‘फेक न्यूज’ से पाला पड़ने की बात स्वीकारी थी, जबकि वैश्विक स्तर पर ऐसे यूजर की संख्या 57 प्रतिशत के करीब थी। ‘फेक न्यूज’ विश्व शांति और मानवता के लिए बड़ा खतरा है। इसका प्रचार-प्रसार तीसरे विश्व युद्ध का सबब बन सकता है। 1986 में साहित्य का नोबेल जीतने वाले नाइजीरियाई कवि वोल सोइंका करार ने जनवरी में अबुजा में आयोजित एक सम्मेलन में यह बात कही थी। ‘फेक न्यूज’ की समस्या देश-दुनिया में कहर बरपा रही है। 

बीबीसी के सर्वे से खुलासा हुआ है कि ज्यादातर भारतीय अफवाहों को सच मान उनका प्रचार-प्रसार करना राष्ट्रीय कर्तव्य समझते हैं। बड़ी संख्या में लोग अफवाहों की पुष्टि करने या सामाजिक-राजनीतिक झुकाव दर्शाने के लिए ऐसे मैसेज आगे बढ़ाते हैं। किसी फेसबुक पोस्ट को मिले ‘लाइक’, ‘कमेंट’, ‘शेयर’ के आधार पर उसकी विश्वसनीयता आंकते हैं ज्यादातर भारतीय। पोस्ट में शामिल फोटो पर भी गौर फरमाते हैं। 

दोस्तों-परिजनों की ओर से भेजे गए मैसेज पर तो आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। सर्वे के अनुसार 35 फीसदी भारतीय देश-दुनिया की हलचल जानने को सोशल मीडिया पर निर्भर है। 72 फीसदी भारतीय सच्ची खबरों और ‘फेक न्यूज’ में अंतर करने में सक्षम नहीं है। यही नहीं 40 फीसदी सोशल मीडिया का वेब ट्रैफिक दुनिया भर में ‘फेक न्यूज’ प्रसारित करने वाली साइटों पर जाता है। बीते तीन वर्षों में 31 भारतीय भीड़ हत्या के शिकार हुए है, सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के कारण। 

अकेले साल 2018 में 25 भीड़ हत्या के मामले सामने आए और 50 से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए। सर्वे में बताया गया है कि सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैलाने का मकसद किसी साइट पर ज्यादा से ज्यादा हिट्स आमंत्रित करना, इसके अलावा यूजर और उसके परिजनों की निजी जानकारी जुटाना और किसी पार्टी या राजनीतिक हस्ती की छवि बनाना और बिगाड़ना रहा है। 

सर्वे के अनुसार सोशल मीडिया में बिना सोचे जो शेयर करते हैं, उनमें भारत की तरक्की, हिंदुत्व के बखान साइबर ठगी, बीमारियां-संक्रमण के ब्योरे, सेहतमंद के नुस्खे और राजनीतिक हस्तियों दलों के गुणगान व विपक्षी नेताओं पर वार से जुड़े मैसेज और पोस्ट शामिल है। सर्वे में बताया गया है कि सोशल मीडिया के यूजर को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी संवेदनशील संदेश बिना जांचे-परखे ‘फारवर्ड’ न करें, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले मैसेज को फोरन डिलीट कर दें। मैसेज का स्त्रोत, उसे जारी करने वाली साइट की विश्वसनीयता देखें। पोस्ट की सत्यता आंकने के लिए गूगल और एएलटी न्यूज की मदद लें।

 यहां यह बता दें कि ‘फेक न्यूज’ रोकने के लिए विभिन्न कंपनियों ने कई कदम उठाए हैं। इसके लिए व्हाट्सएप ने ऐसे मैसेज पर ‘फॉरवर्डेड’ टैग लगाना शुरू किया, जो कई लोगों से गुजरकर दूसरों के पास पहुंचते हैं। इसके साथ ही ‘फास्ट फारवर्ड’ बटन हटाया, ‘फारवर्ड मैसेज’ को एक बार में पांच यूजर या ग्रुप में भेजने की सीमा भी बांधी। अखबारों में विज्ञापन देकर ‘फेक न्यूज’ पहचानने के उपाय बताए, आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले अकाउंट बंद किए। फेसबुक ने पोस्ट की सत्यता जांचने वाली ‘बूम लाइव’ जैसी साइटों से मिलाया हाथ और लाखों फर्जी अकाउंट बंद किए हैं। इसके अलावा ट्विटर ने खास एल्गोरिझ बनाया जो आपत्तिजनक शब्दों से लैस ट्वीट की पहचान कर उन्हें ब्लाक करने में सक्षम है। 

‘फेक न्यूज’  के मद्देनजर फेसबुक ने भारत, नाइजीरिया, यूके्रन और यूरोपीय समुदाय के लिए राजनीतिक विज्ञापनों के नए नियम बना दिए हैं। इसके तहत विदेश की जमीन से विज्ञापन नहीं किए जाएंगे, विज्ञापन के साथ इसके भुगतान का ब्योरा होगा। इनके साथ एक आर्काइव होगा जिसके लिए राजनीतिक विज्ञापनों के बारे में ज्यादा जानकारी पा सकेंगे। फेसबुक बताएगा कि राजनीतिक विज्ञापनों के पेज किस जगह से संचालित हो रहे हैं। भारत में 30 करोड़ लोग फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। नए नियम 21 फरवरी से लागू हो गए हैं। जैसा कि पूर्व में बताया गया है व्हाट्सऐप ने थोक में मैसेज फारवर्ड करने की प्रक्रिया बंद कर दी है और उसने भारतीय राजनीतिक दलों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने नियम तोड़े तो उनके अकाउंट बंद हो जाएंगे।

कंपनी 120 करोड़ रुपए खर्च पर झूठ का प्रसार रोकने का अभियान चलाया है। इधर ट्विटर अपने शेयर की कीमत में गिरावट का जोखिम उठाकर भी फर्जी एकाउंट बंद कर रहा है। उसने राजनैतिक विज्ञापनों के लिए एक डैशबोर्ड बनाया है, जिससे पता चलेगा कि कौन इन पर कितना पैसा खर्च कर रहा है। गफलत में रहने की जरूरत नहीं गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि मुनाफे के लिए काम करते हैं। राजनीतिक विज्ञापनों पर सख्ती से विज्ञापन की मद में कमी से उन्हें भारी नुकसान होगा, फिर भी सख्ती बरती जा रही है।

यह सब इसलिए किया जा रहा है क्योंकि अभिव्यक्ति के इस नवोदित बाजार की साख पर बन आई है। खतरे की शुरुआत किस्म-किस्म की झूठ से यानी ‘फेक न्यूज’ से हुई थी, जो इनके कंधों पर बैठकर दिग-दिगांत में फेल रहा था। झूठ से लड़ाई करते हुए इन्हें पता चला कि इसकी सप्लाई चेन तो पूरी दुनिया में सियासत के पास है। 

यह बाजार अगर कुटिल सियासत और झूठ बोलने की आजादी को नहीं बचा सके तो इनका धंधा तो बंद हुआ समझिए। संसद की एक समिति ने पिछले दिनों ट्विटर के प्रबंधन को तलब कर लिया। शिकायत यह थी कि ट्विटर सरकार समर्थक दक्षिणपंथी संदेशों के साथ भेदभाव करता है। समिति को पता नहीं था कि वह अमेरिकी सोशल नेटवर्क के प्रबंधन को हाजिरी का आदेश नहीं दे सकती। 

ट्विटर ने मना कर दिया। तकनीक की ताकत, आर्थिक आजादी और ग्लोबल आवाजाही के बीच सोशल नेटवर्क लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। इस्तेमाल से यह अच्छी या बुरी बनती है। रसायन-परमाणु के बाद सोशल नेटवर्किंग ऐसी तकनीक होगी जिसका बाजार अपने इस्तेमाल के नियम तय कर रहा है, ताकि कोई सिरफिरा नेता लोकतंत्रों को गैसीए कत्लखाने में न बदल दें।  



 

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