कच्चे तेल में उछाल से महंगाई की आशंका

Samachar Jagat | Saturday, 12 May 2018 09:56:40 AM
Inflation in crude oil fears inflation

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कच्चे तेल में उछाल और रुपए की गिरावट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी है। इससे खुदरा महंगाई बढ़ने के साथ रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर में बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं। नवंबर 2014 के बाद पहली बार कच्चे तेल की कीमत 75 डालर प्रति बैरल पार कर गई है। कच्चे तेल में जारी तेजी के चलते एक बार फिर से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के साथ महंगाई बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। माना जा रहा है कि ईरान पर अमेरिका द्वारा नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की घोषणा से तेल के दामों में ओर बढ़ोतरी होगी। तेल उत्पादक देशों के प्रमुख संगठन ओपेक द्वारा उत्पादन में कटौती से कच्चा तेल वैसे ही उछाल पर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आयात बिल बढ़ने से सरकार के खजाने पर सीधा असर पड़ेगा। 

विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल के बढ़ते दामों का अगले हफ्ते महंगाई के आंकड़ों पर असर दिखाई देगा। अगर अप्रैल में महंगाई बढ़ने के नतीजे आते हैं तो जून में रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा बैठक अहम होगी, जिसमें ब्याज दरों पर फैसला होगा। विदेशी संस्थागत निवेशकों और फंड द्वारा भारतीय बाजारों से लगातार पैसा निकालने से रुपए पर दबाव बढ़ रहा है। तेल विशेषज्ञ कंपनी कांसंटन फ्रिट्सेच का कहना है कि अमेरिका से तेल उत्पादन में उछाल आया है, लेकिन वेनुजुएला की नाजुक स्थिति इस बढ़त को खत्म कर रही है। वेनेजुएला का उत्पादन वर्ष 2000 की तुलना में 50 फीसदी यानी आधा रह गया है। अगर अमेरिका प्रतिबंध लगाता है तो ईरान के तेल उत्पादन में करीब दो-तीन लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती होना तय है।

 इससे दाम में बनावटी इजाफा करने में तुले ओपेक देशों को लाभ मिलेगा। यहां यह बता दें कि कच्चे तेल का भुगतान कंपनियों को डालर में करना पड़ता है। देश की जरूरतों का करीब 80 फीसदी तेल आयात होता है। आयात कमजोर होने और उत्पाद शुल्क बढ़ने से परेशान कंपनियां इलेक्ट्रानिक्स सामान, महंगे रत्न, रसायन और भारी मशीनरी का आयात भी महंगा पड़ रहा है। कच्चे तेल का दाम एक डालर बढ़ने से चालू खाते का घाटा करीब एक अरब डालर बढ़ जाता है। कच्चे तेल के अलावा रुपए में लगातार गिरावट से भी आयात महंगा हो रहा है। रुपया डालर के मुकाबले 67 रुपए के पार पहुंच गया है। रुपया पहली बार 17 फरवरी 2017 के बाद इस ऊंचाई पर पहुंचा है। अगर यह 68 रुपए के करीब पहुंचता है तो भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) कुछ कदम उठा सकती है। 

हालांकि आर्थिक सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा है कि रुपए की गिरावट अभी चिंता की बात नहीं है। पहले भी यह 67-68 तक पहुंचा है। प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकारों द्वारा वैट या बिक्री कर में कमी न करने से केंद्र पर उत्पादन शुक्ल घटाने का दबाव बढ़ गया है। फिलहाल तेल कंपनियों ने कच्चे तेल के दाम में उछाल के बावजूद पिछले दो हफ्ते से कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है। सूत्रों का कहना है कि दाम न बढ़ने से तेल कंपनियों का बिक्री पर लाभ 3.6 रुपए प्रति लीटर से दो रुपए प्रतिलीटर आया है। जबकि डीजल पर भी एक से डेढ़ रुपए का प्रतिलीटर घाटा हो रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन के मुनाफे में करीब 50 फीसदी का असर पड़ा है।

 वहीं तेजी से बढ़ी पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने देश की आम जनता पर कमर तोड़ प्रभाव डाला है। इनकी कीमत बढ़ने से दूसरी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ती है जिन्हें आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करता है। पेट्रोलियम पदार्थांे की खुदरा कीमतों में यह बढ़ोतरी पूरे दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा है। इसका मूल कारण है कि भारत सरकार उत्पाद शुल्क लगाकर राजस्व इकट्ठा करने का काम कर रही है। पिछले चार वर्षों में पहली अप्रैल 2014 से पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपए प्रतिलीटर से पहली अप्रैल 2018 को 19.48 रुपए प्रतिलीटर हो गई है। यह बढ़ोतरी 105 प्रतिशत है। पेट्रोल की कीमत में से 47.4 फीसदी हिस्सा टैक्स रेवेन्यु में जा रहा है।

 इसी तरह डीजल की एक्साइज ड्यूटी पहली अप्रैल 2014 में 3.56 रुपया प्रतिलीटर थी जो चार वर्षों में 15.33 रुपए प्रतिलीटर पहली अप्रैल 2018 को हो गई। यह वृद्धि 338 फीसदी है। डीजल के खुदरा भाव का 38.9 फीसदी हिस्सा टैक्स के रूप में जा रहा है। यहां यह बता दें कि तेल के दाम बढ़ते हैं तो दूसरी डालर मजबूत होता है। कच्चे तेल के दाम 75 डालर प्रति बैरल होते देख तेल कंपनियों ने डालर इकट्ठे करने शुरू कर दिए और इससे डालर की मांग बढ़ती जा रही है। कच्चे तेल के दामों में यह बढ़ोतरी तकरीबन चार साल बाद हो रही है।

 जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है इसकी वजह ईरान पर लगने वाली पाबंदी के साथ ही वेनेजुएला के तेल उत्पादन में आई कमी भी है। भाजपानीत केंद्र की राजग सरकार ने वादा किया था कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में कमी आएगी तो ड्यूटी भी तेल पर कम की जाएगी, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। तेल कंपनियों ने भी तेल की कीमतें कम होने पर उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं दी। अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ रही है, लेकिन सरकार ने एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की है। वैसे पिछले दो हफ्ते से तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दामों में कोई परिवर्तन नहीं किया है। इसे राजनीति से जोडक़र देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक ऐसे ही चलेगा।

 लोग यह मानकर चल रहे हैं कि चुनाव खत्म होते ही तेल कंपनियां दाम बढ़ा देगी और पेट्रोल-डीजल के दाम 75 रुपए प्रति लीटर से बढक़र 80 रुपए प्रतिलीटर तक उछल सकते हैं। सरकार ने पेट्रोल-डीजल के मूल्यों को नियंत्रण से बाहर किया हुआ है तो फिर अंतरराष्ट्रीय मूल्य के मुकाबले दाम क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे हैं। सरकारें अक्सर वोट की खातिर ऐसे फैसले करती रही है। 1998 में भी केंद्र सरकार ने चुनाव के चक्कर में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को काफी दिनों तक टाले रखा था, लेकिन चुनाव के बाद तेल की कीमतों में 40 फीसदी बढ़ोतरी कर दी थी।

 केंद्र ने राज्यों को तेल की महंगाई रोकने के लिए वैट घटाने का कहा है किन्तु उनके अब तक के रुख से ऐसा संभव होता नजर नहीं आ रहा है। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की उम्मीद भी अब खत्म हो गई है। कीमतें बढ़ रही है और राजस्व में गिरावट रूकने की उम्मीद नहीं है। खजाना भरने के लिए जनता से धन वसूलना उचित नहीं है। केंद्र को राहत देनी चाहिए। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए कोई रास्ता निकालना ही चाहिए। सरकार को जनहित निर्णय लेकर राहत देने का सिस्टम तय करना होगा।

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