हथियार आयात का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

Samachar Jagat | Thursday, 11 Oct 2018 04:13:16 PM
Influence of weapons imports on the economy

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रूस के खरबपति राष्ट्रपति पुतिन के साथ भारत के प्रधानमंत्री एस-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीद पर समझौते को बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इसके पूर्व फ्रांसीसी लड़ाकु विमान रफान और उससे पहले अमेरिका के साथ हुये इस तरह के रक्षा सौदों को भी मीडिया में इसी रूप में प्रचारित किया गया था। जबकि ऐसे हर सौदे में बड़ी खामियों एवं बहुत कुछ भ्रष्टाचार के समाचार भी मीडिया के एक भाग के द्वारा जोर शोर से उठाये जाते रहे हैं।

ऐसे हर मामले में सबसे बड़ा आरोप ऐसे कुछ अपात्रों को नाजायज लाभ पहुँचाने की बातें कही जा रही हैं जिनको संबंधित क्षेत्र में करीब शून्य अनुभव है। एक बार के लिये मान लिया जाता है कि ये व्यापक जांच से ही सिद्ध हो सकता है कि वास्तविकता क्या है। फिर भी बहुत सारी बातें ऊपरी तौर पर हर एक को कुछ अटपटी लगती है उनका विश्लेषण करना तो जरूरी है।

वर्तमान सरकार के प्रमुख ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में मेक इन इंडिया का आह्वान किया था। इसके लिये उसने विदेशी दौरों की भरमार लगा दी थी तथा भारत में सब कुछ सुविधाजनक है का विश्वास दिलवाया था। जो विदेशी निवेश अधिकांश मात्रा में शेयर बाजार में खेलने के लिये लाया गया था तथा जो अब तेजी से वापस ले जाया जा रहा है को सफलता के रूप में दर्शाये जाने का प्रयास भी किया गया था। फिर भी इस क्षेत्र में नहीं के बराबर ही निवेश आ सका। कोई भी हथियार निर्माण का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका। 

चारों तरफ यह हवा फैल गई कि भारत की फौज के पास अति आवश्यक से भी कम जरूरी हथियार नहीं हैं जो हैं भी वे भी पुराने पड़ चुके हैं। इस तथ्य को सीएजी तक ने अपनी विभिन्न रिपोटर््स में पुष्ट किया। इससे वर्तमान सरकार को थोक के भाव हथियार आत्मरक्षा के नाम पर विदेशों से खरीदने का बहाना मिला गया। इसी का परिणाम हुआ है कि भारत संसार का सबसे बड़ा हथ्ज्ञियार आयातक देश बना ही नहीं हुआ है बल्कि हथियारों की संख्या विविधता एवं चुकाई जाने वाली राशि भी बहुत तेजी से बढ़ी है। हमारी इस कमजोरी के कारण अमेरिका, रूस व फ्रांस जैसे महाहथियार निर्माताओं को बड़ा बाजार मिल गया। यहां तक की इजरायल जैसे ‘डाट टाइप’ देश की भी चांदी हो गई। हथियार आयात की राशि लाखों करोड़ रुपयों तक पहुँच गई। अनुमान है कि भारत आगामी दस वर्षों में एक सौ बिलियन डालर के हथियार खरीदने की योजना रखता है।

इस संदर्भ में कटु यथार्थ यह ही है कि जहां से भी हम हथियार खरीद रहे हैं उसमें ऐसे हथियार हमारे यहां ही बन सके अन्तत: ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो रही है। जो कि मेक इन इंडिया का मूल उद्देश्य है। इसका सीधा सा मतलब है कि ऐसे समझौतों से न तो हमारी तत्कालीन आवश्यकता की पूर्ति होती है न दीर्घकाल में हम आत्मनिर्भरता की और बढ़ पाते हैं। क्योंकि हथियार खरीद का समझौता होने के बाद भी हथियारों की वास्तविक प्राप्ति लम्बे समय के बाद ही होती है। हमारे लिये यह वास्तव में असुविधाजनक ही है कि जब देश में विदेशी मुद्रा भंडार बढऩा बंद हो गये हैं विदेशी व्यापार घाटा असामान्य स्तर तक पहुँच गया है, रुपये की विनिमय दर तेजी से गिरती जा रही है, वैश्विक बाजार में खनिज तेल की कीमतें अस्सी डालर प्रति बैरल तो पहुँच ही गई हैं।

इसके निकट भविष्य में ही एक सौ डालर तक पहुँचने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही है जो वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुये सत्य के करीब ही लगता है। हमें खाद्य तेल एवं स्टील जैसी वस्तुओं पर प्रति वर्ष एक लाख करोड़ रुपयों से अधिक खर्च करना पड़ता है। स्वर्ण का बड़ा आयात तो पहले से ही मुसीबत बना हुआ है। एक खास तथ्य यह है कि अब प्रति वर्षों भारत में अरबों रुपयों की विदेशी मुद्रा भेजने वाले प्रवासी भारतीय विभिन्न राजनैतिक, कूटनीतिक, सामरिक एवं आर्थिक कारणों से लाखों की संख्या में वापस स्वदेश आने को मजबूर हो रहे हैं।

मतलब साफ है हमारे पास इतनी बड़ी रकम को विदेशी मुद्रा में भुगतान करने के न साधन हैं व न ही हमारी आर्थिक हैसियत है कि भविष्य में कमाई कर उसका भुगतान करते रह सकें। क्योंकि हमारी निर्यात कर पाने की क्षमता कम होने के साथ ही भविष्य के लिये भी शुभ नहीं लग रही है। तकनिकी रूप से वैसे भी हथियारों पर व्यय अनुत्पादक ही माना जाता है। क्योंकि इससे पुन: उत्पादन याने आगम की संभावना शून्य ही होती है। वैसे देश की रक्षा के लिये ऐसा करने से वंचित नहीं रहा जा सकता है। 

इस संदर्भ में एक समस्या यह भी है कि इन पर खर्च की कोई अंतिम सीमा नहीं हो सकती है। साथ ही जिस तरह से वैश्विक स्तर पर हथियार निर्माण में नवीनतम तकनीक और उपयोग की भयानकता आगे बढ़ती जा रही है उससे कुछ ही समय के बाद आज के आधुनिकतम हथियार पुराने पड़ जाते हैं। जिनका मूल्य कुछ भी नहीं रहता है। प्रतियोगिता में ठहरे रहने व राष्ट्र की सुरक्षा के नाम में फिर और अधिक परिष्कृत हथियार खरीदने ही पड़ते हैं। ऐसा नहीं करने पर मिग लड़ाकू विमानों जैसी हालत होती है। जो कभी भी क्रेस हो जाते हैं तथा साथ में उच्च श्रेणी प्राप्त प्रशिक्षित लड़ाकुओं की भी संख्या कम करते चले जाते हैं। इस प्रकार विदेश से हथियार खरीदने की नीति राष्ट्र हित में तो कहीं जा सकती है लेकिन अर्थव्यवस्था पर भारी भार डालती है।

ऐसे में निष्कर्ष यह ही निकलता है कि भारत विदेशों से हथियार खरीदते रह कर ‘महाशक्ति’ नहीं बन सकता है। इसके लिये यथाशीघ्र इस मामले में अधिकतम सीमा तक आत्मनिर्भर हो जाने की जरूरत है। ऐसा तब ही हो सकता है जब हथियार निर्यातक देश के साथ साझा उत्पादन की शर्त को आवश्यक रूप से लगाया जाये। तब ही व्याप्त बेरोजगारी की समस्या का एक सीमा तक आंशिक निदान भी निकाला जा सकता है। सरकार केवल कहती रहे कि भारत में सर्वाधिक बिजनिश फ्रेंडली परिस्थितियां हैं और बुलट ट्रेन के समझौते से जापान सरकार इसीलिये हाथ खींच लेने की बात कहे क्योंकि किसी तरह का काम सरकारी बाधाओं के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहा है। तो विदेशी संभावित निवेशकों का धैर्य जवाब दे ही जाता है।

रक्षा उत्पादन जिसमें संक्रमणकाल याने परियोजना के प्रारंभ किये जाने व पूर्ण हो जाने में बहुत लम्बा समय होता है मैं तो विदेशी निवेशक निश्चय ही आने का साहस आसानी से नहीं जुटा सकते हैं। इसलिये सरकार द्वारा कुछ ‘अनुकरणीय’ करके दिखाने की जरूरत है। वादों व प्रतिबद्धताओं के सार्वजनिकरण से ही परिणाम निकलना असंभव सा है।
(ये लेखक के निजी विचार है) 

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