नेताओं की कमाई पता करना कठिन

Samachar Jagat | Tuesday, 23 Apr 2019 04:36:00 PM
It's hard to know the earning of politicians

केंद्र सरकार ने बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट मेें स्वीकार किया कि नेताओं की बढ़ती आय का पता लगाना मुश्किल है। इसके लिए स्थायी तंत्र विकसित करने में समय लगेगा इसलिए कुछ और मोहलत दी जाए। अवमानना नोटिस के जवाब में दिए गए हलफनामे में सरकार ने यह बात कही है। शीर्ष अदालत ने ‘लोक प्रहरी’ के अध्यक्ष एसएन शुक्ला द्वारा नेताओं की आय में बेतहाशा बढ़ोतरी को लेकर दायर अवमानना याचिका पर पिछले माह केंद्र को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने पूछा था कि दो सप्ताह में बताया जाए कि सरकार ने नेताओं की संपत्ति की जांच का तंत्र विकसित करने के लिए क्या कदम उठाए है। 

कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने शपथ पत्र में कहा है कि पिछले वर्ष नवंबर में कहा है कि पिछले वर्ष नवंबर माह में राज्यसभा के सभापति की अध्यक्षता में बैठक की गई थी। इसमें राज्यों और विधायी निकायों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। लेकिन इसमें दो भिन्न मत निकलकर आए कि क्या यह संस्थागत जांच तंत्र राज्यों के विधायी विभागों के अधीन हो या यह अलग मॉडल पर हो जिसमें ज्यादा स्वायतता और निष्पक्षता हो। सरकार ने कहा कि उसने राज्यसभा के महासचिव से दोबारा बैठक बुलाने को कहा है। लेकिन उन्होंने कहा कि यह मंत्रालय को देखना चाहिए क्योंकि उसके पास सभी जानकारियां उपलब्ध है। ऊपरी सदन केइस जवाब के बाद इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। इसलिए सरकार को ओर समय दिया जाए। यहां यह बता दें कि दोबारा निर्वाचन होकर आए 153 सांसदों की औसत संपत्ति 5.5 फीसदी से बढक़र 13.8 करोड़ रुपए हुई। मौजूदा 479 लोकसभा सांसदों की 30.9 लाख रुपए औसत सालाना आय रही। 

2009 में 15 करोड़ के मालिक शत्रुध्न सिन्हा की संपत्ति 2014 में 131.7 करोड़ रुपए हुई। इसी प्रकार 2014 में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुवे की संपत्ति 115 करोड़ रुपए रही, जबकि 2009 में यह 51 करोड़ रुपए थी। यहां यह भी बता दें कि लोकसभा के 430 सांसद, जिनका 479 में से विश्लेषण किया गया करोड़पति है। कृषि क्षेत्र से जुड़े 19 फीसदी सांसद भी सालाना 12.64 लाख रुपए किसानी से कमाते हैंं। 2009 के मुकाबले 2014 में दोबारा निर्वाचित सांसदों की 142 फीसदी संपत्ति बढ़ी। एक ओर जहां जनता द्वारा निर्वाचित सांसदों की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी के आंकड़े हैं, वहीं इन सांसदों को चुनने वाले 26.3 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं और इनमें से आधे कृषि मजदूर है। जबकि देश में 7.06 करोड़ लोग बेहद गरीब है, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल है। यहां यह भी बता दें कि 2009 में आय भारतीयों की औसत आय में 6.95 विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2014 में 6.14 फीसदी की दर से आय में बढ़ोतरी हुई। 

जहां तक इस बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे नेताओं संपत्ति में बेहिसाब वृद्धि की जांच की बात है, केंद्र के जवाब से यह तय है कि कोई तंत्र जांच के लिए उपलब्ध नहीं होगा। कई नेताओं ने जो शपथ पत्र दिए हैं, उसमें उनकी संपत्ति में कई गुना वृद्धि सामने आई है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सीबीडीटी ने कोर्ट को बताया था कि 98 विधायक व सात लोकसभा सांसद प्रथमतया जांच के दायरे में है। उनकी घोषित संपत्ति में अनियमितता पाई गई है। वहीं 24 विधायकों और राज्यसभा के दो सांसदों पर जांच लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2018 में सरकार से पूछा था कि कानून मंत्रालय नेताओं की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि की वजह जानने वाली प्रणाली तैयार क्यों नहीं कर पाई। सरकार इसकी जांच के लिए स्थायी तंत्र बनाए। कोर्ट ने कहा था कि नेताओं की संपत्ति में कई गुना इजाफा उन्हें अयोग्य ठहराने का अच्छा आधार बन जाता है।
 



 

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