जयपुर की कलाकृतियों-आभूषणों की पहली प्रदर्शनी

Samachar Jagat | Friday, 31 Aug 2018 11:06:02 AM
Jaipur's first exhibition of artifacts and ornaments

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कला -उद्योगों और जवाहरात के लिए देश और दुनिया में पहचान रखने वाले जयपुर में पहली विशाल प्रदर्शनी वर्ष 1883 में नया महल (सवाई मानसिंह टाऊन हॉल) में आयोजित की गई। इसके पूर्व 26 अगस्त 1881 को रामनिवास बाग में एक संग्राहलय (अल्बर्ट हॉल) स्थापित कर यहां स्थानीय हस्त शिल्पियों की कला को प्रदर्शित किया गया। आर्थिक और उद्योगिक संग्राहलय ने खुलने के साथ ही भारी सफलता हासिल की। दस्तावेजों के मुताबिक स्थापना के पहले वर्ष 1881 ई. में दो लाख तीन हजार 451 लोग इसे देखने को पहुंचे। दूसरे वर्ष 1882 में यह संख्या बढक़र दो लाख 70 हजार 235 हो गई। इससे जयपुर और आसपास के अलावा अन्य दस्तकारों और कारीगरों का उन पर निर्भर रहने वाले परिवारों केा बहुत बड़ा सहारा मिला, जिनकी वस्तुएं खरीद कर संग्राहलय में प्रदर्शित किया गया।

इसकी सफलता को देखते हुए महाराजा (सवाई माधोसिंह द्वितीय 1880-1922 ई.) ने तय किया कि चारदीवारी के अंदर एक व्यापक (बड़ी) प्रदर्शनी का आयोजन किया जाए। इस काम की जिम्मेदारी जयपुर आवासी शल्य चिकित्सक डॉक्टर टी.एच. हैडले को सौंपी गई। डॉक्टर के सहयोग के लिए जयपुर और बाहर के कला एवं जवाहरात पारखी (विशेषज्ञ) जुटे। बताया जाता है कि नया महल (अब टाऊन हॉल) में प्रदर्शनी आयोजन का मुख्य उद्देश्य स्थानीय कला-उद्योगों और शिल्पियों की उत्कृष्ट कला कृतियों को प्रोत्साहित करना तथा जयपुर की पारम्परिक कला को संरक्षण देना तथा सुरक्षित करना था। इस प्रदर्शनी के लिए नया महल के विशाल महफिल हाल के काम को नए सिरे से पूरा करने के साथ ही, पहली मंजिल पर स्थित कई दीर्घा (गलियारों) और कमरों को सही किया गया।

 पुराने दस्तावेजों के मुताबिक यहां पर जयपुर ही नहीं देश विदेशों की खास तौर से उपमहाद्वीप की करीब सात हजार कलात्मक वस्तुओं को प्रदर्शन के लिए रखा गया। प्रदर्शनी के लिए 212 गुणा 135 गज के सम्पूर्ण नया महल को उपयोग में लिया गया। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि जयपुर में कला उद्योगों और जवाहरात की पहली प्रदर्शनी कितनी विशाल और आकर्षक रही होगी। प्रदर्शनी में  भाग लेने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए सुपात्र (योग्य) दस्तकारों और जवाहरात में माहिर कारीगरों को पदक देने की घोषणा भी महाराजा ने की। प्रदर्शनी और भवनों की मरम्मत पर करीब 33 हजार रुपए का खर्च आया बताया। जयपुर सरकार द्वारा इसके बारे में चार खंडों वाली पुस्तक भी प्रकाशित की गई। मेमोरियल्स ऑफ जयपुर एगजीवीसन (जयपुर प्रदर्शनी की यादगारे) नामक पुस्तक का प्रकाशन अप्रैल 1883 को हुआ। सुनहरी जिल्द वाली यह पुस्तक लंदन में डब्लू गिग्स द्वारा प्रकाशित की गई। बताया जाता है कि उस समय जर्मनी में पुस्तक का एक सेट 60 पॉण्ड में बिका था।

पुस्तक और पुराने लेखों के मुताबिक प्रदर्शनी में अत्यधिक वेशकीमती वस्तुओं का प्रदर्शन महफिल हाल या सेंट्रल हॉल में किया गया, जो हाल में लटके दीपधारों (मोमबत्तियों) वाले झाडों की रोशनी से आलोकित किया गया था। प्राप्त विवरण के मुताबिक यह झाड फानूस सवाई रामसिंह द्वितीय ने शाही खजाने की राशि से चेकोस्कोवाकिया से खरीदी थी। महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूजियम हेस्ट के तत्कालिन निदेशक स्वर्गीय यदुऐन्द्र सहाय ने भी सिटी पैलेस के पुराने दस्तावेजों और पुस्तक के आधार पर इस प्रदर्शनी के बारे में अपने एक लेख में निहायत खूबसूरती से उल्लेख किया है। ‘कोली नामक व्यक्ति द्वारा तैयार प्रारूप के मुताबिक बने लकड़ी के दो गुम्बदों को जरी तथा अन्य सुनहरे वस्त्रों से सजाया गया।

 आमेर और जयपुर के शाही संग्रह के और जयपुर जेल की उद्योग शाला में बने कई शानदार गलीचों को पुरानी पेंटिंग, चित्रों, हथियारों तथा अन्य सजावटी वस्तुओं को दीवारों के अलावा शोकेशों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया था। हाल के मध्य में सोने का बेशकीमती सिंहासन रख उसे शानदार गद्दों, मसन्द, बगली तकियों से सजाने के साथ ही इसके बगल में लंबी नली वाला चांदी का हुक्का, पीकदान आदि वस्तुएं रखी गई। एमरल्ड, मणिक, नीलम के जीवराती संग्रह के अलावा ताज, निजी वस्तुएं तथा सुनहरी कशीदाकारी और पिच्चीकारी की वस्तुओं को भी हाल के मध्य में प्रदर्शन के लिए रखा गया। एक बड़ा वाद्य मण्डल संगीत लडरी के साथ दर्शकों का मनोरंजन करता रहता था।
- रामस्वरूप सोनी
वरिष्ठ पत्रकार

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