सवाई जयपुर उर्फ ढूंढाढ़ी जैपर दो

Samachar Jagat | Friday, 25 Nov 2016 03:10:12 PM
सवाई जयपुर उर्फ ढूंढाढ़ी जैपर दो

आमेर के कछावा (कुशवाहा) शासकों की पृष्ठ भूमि पर नजर डालें तो महान सवाई के जयपुर की रचना अपने कालखंड की एक निश्चित समय की एक अनोखी घटना सदियों से बखानी जाती रही है। संभवत: आने वाले युग में सवाई के इस अनोखे शहर का जिक्र होता रहेगा।

कालखंड की 18वीं सदी के शुरू में जब आज के 289 वर्ष पूर्व हिन्दुस्तान संघर्ष और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा तब ढूंढाढ़ का क्षेत्र और इसकी राजधानी आमेर भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था।

महान सवाई जयसिंह द्वितीय ने हालात के मद्देनजर अपनी राजधानी के लिए एक सुरिक्षत नए शहर के निर्माण का फैसला लिया। शायद सोच यह था कि वक्त के तकाजे को देखते हुए किसी भी अतिक्रमण से अपने लोगों को महफूज रखने तथा किसी भी जंग के दौरान युद्ध नीति संबंधि व्यूह रचना का एक कारगर स्थान निर्धारित हो। 

इसके बावजूद निश्चल रूप से वक्त जरूरत को देखते हुए इसका संबंध आगरा-दिल्ली और गुजरात के बंदरगाहों से जुड़ा हुआ हो।

सब हालात को ध्यान और मंथन कर राज्य के एक वास्तु शिल्पि और निर्माण कला में उस्ताद आनंदराम मिस्त्री को निर्देश दिए गए कि वह महान सवाई के सोच के अनुसार नए शहर के लिए स्थान तलाश कर सर्वे करें और इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करे। 

इतिहासकारों के अनुसार आनंदराम मिस्त्री ने आमेर घाटी के दक्षिण में एक आदर्श स्थान तलाश किया।
16 जुलाई 1726 वह ऐतिहासिक दिन था जब आनंदराम की सलाह पर वर्तमान जयनिवास बाग के चारों तरफ वृत के इलाके का चयन कर लिया गया। निजी शाही शिकारगाह के लिए सुरक्षित सरहद को शासक के महल के भवन के लिए चुना गया, जो नए शहर पर नियंत्रण के खास इलाकों में से एक स्थान बना।

सलाह के मुताबिक औधी के नजदीक वर्तमान बारादरी को बादल महल के रूप में विकसित किया गया। दूसरी वर्तमान बारादरी को गोविन्ददेवजी के मंदिर के लिए बदलने का तय हुआ।

अश्वमेघ यज्ञ के नाहरगढ़ की तलहटी में बने ब्रह्मपुरी के घरों के बाद आमेर घाटी से दूर यह नए शहर के निर्माण की तरफ दूसरा कदम था। ऐसा बड़ा कदम जिसके घेरे में शासक और उसकी सेना अपने को पूर्ण रूप से सुरक्षित महसूस करे। 

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