खालिस्तान समर्थक रैली से ब्रिटेन सरकार ने पल्ला झाड़ा

Samachar Jagat | Saturday, 25 Aug 2018 03:52:11 PM
Khalistan supporters rally overturned by UK government

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लंदन के ट्राफ्लगार चौक में 12 अगस्त को हुई सिख अलगाववादी समूह की खालिस्तान की सार्थक रैली के मुद्दे से ब्रिटेन सरकार ने खुद को अलग कर लिया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सिख फॉर जस्टिस समूह ने तथाकथित लंदन डिक्लेशन ऑन रेफ्ररेंडम 2020 रैली यानी ‘2020 में खालिस्तान देश बनाने के लिए जनमत संग्रह रैली’ 12 अगस्त को आयोजित की थी। इससे भारत और ब्रिटेन के बीच राजनयिक गतिरोध पैदा हो गया था क्योंकि भारत ने ब्रिटेन को चेतावनी दी थी कि इस समूह को रैली आयोजित करने के अनुमति देने से पहले वह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध के बारे में सोचे। भारत का कहना था कि यह रैली हिंसा और अलगाववाद का प्रचार करती है। ब्रिटेन सरकार के एक सूत्र के अनुसार हालांकि हमने रैली को आयोजित करने की मंजूरी दी लेकिन इसे इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए कि हम इसके समर्थन या विरोध में है। हम इस बात को लेकर स्पष्ट है कि यह भारत के लोगों और भारत सरकार का प्रश्न है।

 ब्रिटेन सरकार की यह टिप्पणी सिख फॉर जस्टिस समूह और ब्रिटेन के विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय (एफसीओ) के बीच हुए पत्रों के आदान-प्रदान की खबर के बाद आया है। ऐसा बताया जा रहा है कि यह पत्र ‘सिख आत्म निर्भरता के लिए अभियान’ के बारे में लिखा गया था। सिख फॉर जस्टिस ने ब्रिटेन सरकार के प्रतिनिधियों के साथ एक छोटी बैठक की अपील की थी। इसमें सिख समुदाय के मुद्दे उठाने वाले थे। एफसीओ ने इस बैठक से इनकार करते हुए कहा कि वह सिख मुद्दे में शामिल सभी पक्षों को बातचीत के जरिए मतभेद को सुलझाने को बढ़ावा देते हैं। 17 अगस्त को एक अज्ञात पत्र मिला, इसमें ‘डेस्क आफिसर फॉर इंडिया’ लिखा हुआ था। इसमें कहा गया है कि ब्रिटेन अपने देश में पुराने समय से चल रही इस परंपरा पर गर्व है कि लोग स्वतंत्रतापूर्वक जमा हो सकते हैं और अपने विचारों का प्रदर्शन कर सकते हैं। पत्र में यह भी कहा गया है।

 ब्रिटेन सरकार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई घटनाओं के साथ ही 1984 में हुए घटनाक्रम के संबंध में सिख समुदाय की भावनाओं से भलीभांति परिचित है। हम सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करने को कहते हैं कि उनका घरेलू कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के मुताबिक हो। ब्रिटेन में हुई रैली के विरोध में यहां नई दिल्ली में ब्रितानी उच्चायोग के बाहर अखिल भारतीय आतंकवाद विरोधी मोर्चा ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया। यहां यह बता दें कि पिछले कई सालों से यह लग रहा था कि खालिस्तान के नाम लेवा शायद अब नहीं बचे हैं और गिने-चुने जो स्वयंभू नेता विदेशों में रह रहे हैं वे भी अब शांत हो चुके है।

 लेकिन ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारत के स्वाधीनता दिवस से तीन दिन पहले यानी 12 अगस्त को खालिस्तान समर्थक संगठन सिख फॉर जस्टिस ने जो रैली निकाली वह भारत के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। इस रैली से तथाकथित खालिस्तान समर्थक नेताओं ने अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की कोशिश की है। इस रैली के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि अलग राष्ट्र की मांग को लेकर खालिस्तान समर्थकों की लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

 सिख फॉर जस्टिस नाम के इस संगठन ने लंदन में ट्रॉफ्लगर स्क्वायर पर अलग खालिस्तान राष्ट्र के लिए 2020 में जनमत संग्रह कराने का एलान कर डाला। इसमें कोई शक नहीं कि खालिस्तान की मांग को लेकर भारत को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले बचे खुचे नेता ऐसा करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। लेकिन सबसे गंभीर बात यह है कि ढ़ाई दशक बाद फिर से खालिस्तान की मांग को लेकर जो आवाज उठाई जा रही है उसके पीछे आखिर कौन है? इस बारे में जो खबरें आ रही है, वे चौंकाने वाली है। लंदन में 12 अगस्त को खालिस्तान की मांग करने वाले ऐसे ही नहीं उतरे। वहां सिख फॉर जस्टिस को योजनाबद्ध तरीके से पाला-पोसा जा रहा है। 

मानवाधिकार संगठन होने का दावा करने वाले इस संगठन के साथ ब्रिटेन की वामपंथी ग्रीन पार्टी खड़ी है। ग्रीन पार्टी ने इस संगठन के उस घोषणा पत्र का खुलकर समर्थन किया है, जिसमें खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह 2020 की बात कही गई है। हाउस ऑफ कॉमन्स में इस पार्टी की एकमात्र निर्वाचित नेता कैरोलीन लुकास ने खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में यहां तक कह डाला कि सिख लोगों को यह निर्धारित करने का हक है कि वे अपने लिए स्वतंत्र पंजाब चाहते हैं। जाहिर है ब्र्रिटेन की धरती पर खालिस्तान नेताओं की पौध तैयार करने का काम चल रहा है। 2020 आने में अभी दो साल बाकी है और जनमत संग्रह का खुलेआम एलान है। यानी योजना लंबी है कि कब क्या करना है। इससे लोगों के मन में फिर से यह बात बैठेगी कि सिखों का अलग देश खालिस्तान होना चाहिए। भारत ने करीब डेढ़ दशक तक पंजाब के आतंकवाद को झेला है और इसकी भारी कीमत चुकाई है। 

हजारों निर्दोष भारतीय नागरिक आतंकवादियों की हिंसा का शिकार हुए हैं। अब इस दौर में खालिस्तान की मांग करने वालों की आवाज उस देश से आई है जो आतंकवाद के खात्मे में हर तरह से भारत के साथ होने का दावा करता रहा है और खुद भी इसके खतरों से दो-चार रहा है। सिख फॉर जस्टिस यूरोप के कई देशों में सक्रिय है। अमेरिका और कनाडा में इसके तार है। इस साल फरवरी में कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ खालिस्तान समर्थक जसपाल अटवाल के संपर्कों का खुलासा भी कम चौंकाने वाला नहीं था। अटवाल 1986 में पंजाब के एक मंत्री की हत्या में दोषी करार दिया गया था और अब कनाडा का नागरिक है।

 इस तरह की गतिविधियां जिस तेजी से सिर उठा रही है, उसे लेकर भारत सरकार को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। भारत को उन देशों की सरकारों पर भी दबाव बनाना होगा जहां खालिस्तान के नाम पर आज भी गतिविधियां जारी है। लंदन में खालिस्तान समर्थकों की रैली को लेकर सवाल तो उठता ही है कि ब्रिटेन की सरकार ने यह जानते हुए भी खालिस्तान की मांग भारत की एकता-अखंडता पर हमला है। इस रैली के लिए आखिर क्या सोचकर इजाजत दी।
 

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