कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्

Samachar Jagat | Monday, 03 Sep 2018 11:20:37 AM
Krishna Vande Jagadguru

जयपुर के आराध्यदेव श्री राधा गोविन्ददेव की सुन्दर संलोनी प्रतिष्ठित मूर्ती का ऐतिहासिक महत्व है। सांसारिक कष्टों से निवारण पाने हेतु, भक्ति रस में डूबे, मंजीरों की ध्वनी के बीच, नाचते-गाते, ईश्वर को रिझाते, जयपुर के अनगिनत श्रृद्घालुगण पूर्ण भक्ति एवं श्रद्घा के साथ भगवान गोविन्द देव जी की सांवली सूरत, मोहनि मूरति के सम्मुख अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं। उनके मानस में एक ही अर्थ, एक ही भाव,एक ही विचार होता है- ‘‘जय श्री राधे! जय गोविन्द!’’ 

जनश्रुति है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वृजभान ने यह विग्रह तब बनवाया था जब उनकी दादी ‘‘कालिंदीजी’’ कृष्ण विरह में अत्यन्त दुखी थी। कालिंदीजी ने श्रीकृष्ण को देखा था। वृजभान ने जो प्रथम विग्रह तैयार कराया उसे देखकर कालिंदीजी बोली कि विग्रह में भगवान के पांव और चरण तो बिलकुल उन जैसे बन गये पर अन्य अवयव श्रीकृष्ण से नही मिलते हैं। प्रथम विग्रह/मूर्ति जिसमें भगवान के पांव उन जैसे बने उस स्वरूप को श्रीमदनमोहन के नाम से जाना गया और वे करौली मे विराजमान है। दूसरी मूर्ति जिसमे वक्षस्थल और बाहु सही बने श्रीगोपीनाथ का स्वरूप कहा गया ओर वे पुरानी बस्ती जयपुर में विराजमान है। तीसरे स्वरूप में भगवान कृष्ण की सम्पूर्ण मुखाकृति आ गई। यह गोविन्ददेव की मूर्ति है। इसी कारण से लोगों की धारना बनी कि एक तिथि में तीनों देवों के दर्शन करने से सम्पूर्ण कृष्ण दर्शन का फल प्राप्त होता है।

यह तीनों प्रतिमाएं पहले वृंदावन मे प्रतिष्ठित की गई थी। तत्कालीन शासकों के अमानवीय अत्याचारोंं से भक्त दुखी थे पर अपने गोविन्द को छोडऩा नहीं चाहते थे, अत: श्रीगोविन्ददेव मानो स्वयं ही उनके कष्ट निवारण हेतु वृंदावन से चल कर जयपुर में आकर विराजमान हो गये। श्री गोविन्ददेव को जयपुर का राजा कहा जाता है। जयपुर के राजा भी अपने जमाने में अपने को उनका दीवान ही मानते थे।

गोविन्दजी का रूप जन-मन-रंजन का है, अर्थात भौतिक कष्टों से विचलित व सांसारिक नश्वरता से विरक्त जनों को श्रृंगार, प्रेम, वात्सल्य और मंगलता के रस से सरोबोर कर देता है। वल्लभ सम्प्रदाय श्रीकृष्ण को मनुष्य के रूप में देखता है और इसी भावना के अनुरूप कृष्णजी प्रतिदिन वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा एक आम मनुष्य अपने जीवन में करता है। कोई उन्हें बाल रूप में देखता है, कोई सखा के रूप में, कोई प्रेमी की भांति, तो कोई स्वामी जैसा।

श्री कृष्ण के इसी मानवीयकरण के कारण उनकी दैनिक झांकियां हर रोज की दिनचर्या के समान है। जैसे कोई राजा अपना जीवन व्यतीत करता है, उसी के अनुरूप उनका शयन और उसके बाद प्रात: ‘‘मंगला’’ होती है। पश्चात वे वस्त्राभूषण पहन लेते है फिर ‘‘धूप’’ और ‘‘श्रृंगार’’। उसके पश्चात ‘‘राजभोग’’ और फिर विश्राम। श्रीकृष्ण एक ग्वाले भी हैं, राजपाट से ऊब कर जंगल में गाऐं चराने चले जाते हैं। गोधूली बेला मे मानों वे एक ‘‘ग्वाले’’ के रूप में वापस लौटते हैं। ग्वाल आरती होती है, भजन भी उनके स्वागत में। ‘‘संध्या’’ को वे एक बार फिर अपनी प्रजा को दर्शन देते हैं और उसके बाद शयन। प्रत्येक झांकी मे अवसर की आवश्यकतानुसार भजन और पूजा होती है। वेश-भूषा भी वैसी ही बदलती है। क्रीड़ाओं के साथ पूजाक्रम मन्दिर की एक प्रमुख विशेषता है।

मन्दिर में विभिन्न धर्म-त्यौहार भी श्रीकृष्ण को जीवात्मक रूप में देखने के आधार हर ही है। श्रीकृष्ण कृषि से संबंध रखते है अत: पशुधन, गाय, दूध-दही आदि का उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। बदलती ऋतुओं के साथ, जिस प्रकार वातावरण में अंतर होता था, वैसे ही विभिन्न उत्सव मनाये जाते है। उनका वही आचरण मंन्दिर में दर्शाया जाता है। जन्माष्टमी के ‘‘उछाल’’ पर्व का भी विशेष महत्व है। रक्षाबन्धन के दिन भगवान को राखी चढ़ाई जाती है जिससे संकट के समय वे स्वयं आकर हमारी रक्षा करें। दीपावली के पश्चात नई फसल आने की खुशी में ‘‘अन्नकूट’’ मनाया जाता है जिसमे नए अनाज को कूट कर भोजन बनाया जाता है। रामनवमी भी यहां बहुत घूमधाम से मनाई जाती है। 

मन्दिर की सुन्दर व्यवस्था से श्रीगोविन्ददेव की महिमा दूनी हो जाती है। मन्दिर की सबसे बड़ी विशेषताऐं है-श्रृंगार दर्शन व प्रसाद वितरण की एक व्यवस्थित कार्य शैली। मंदिर में छोटे-बड़े, जाति-पांति का कोई भेदभाव नहीं होना। मंहत मंदिर मे सिर्फ भक्ति भावना को ही बढ़ावा देते है, उसमें व्यावसायिकता की लेश मात्र भी भावना नही है। मंदिर के प्रांगण की सफाई व स्वच्छता, विश्राम करने को खुला मैदान, गोविन्ददेवजी का अच्छा श्रृंगार व एक समयवद्घ कार्यक्रम का होना गोविन्द मन्दिर को  दूसरे धर्मस्थलों से अलग श्रेणी में रखते है। पिछले  बरसों में दर्शनार्थियों की भीड़ कई गुना बढ़ी है मगर अब भी इसे आसानी से नियंत्रित किया जाकर भक्तों के दर्शन की सुचारू व्यवस्था की जा रही है। 

गोविन्ददेवजी मंदिर के एकल ट्रस्टी गोस्वामी श्री अंजनकुमारजी भक्तों के सहयोग एवं अपने अथक प्रयासों से मंदिर की समृद्घि, सुन्दरता, दर्शनार्थियों की सहूलियते बढ़ाने में लगे है। भक्तजनों का पूरा सहयोग लिया जाता है। जन्माष्टमी से पूर्व लगभग 15 दिन सुन्दर व आकर्षक झांकियां सजाई जाती है व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते है। जन्माष्टमी के दूसरे दिन भव्य शोभा यात्रा आयोजित की जाती है जिसमें लाखों भक्तजन सम्मिलित होते है।
(ये लेखक के निजी विचार है) 



 

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