नोटबंदी उद्देश्यों की प्राप्ति कम, परेशानियां ज्यादा

Samachar Jagat | Thursday, 06 Sep 2018 02:44:16 PM
Less receipt of note-taking purposes, more troubles

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8 नवम्बर, 2016 की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी की ‘ऐतिहासिक’, ‘क्रांतिकारी’ एवं ‘साहसिक’ घोषणा करके उस समय चल रहे एक हजार एवं पांच सौ के नोटों को चलन से बाहर कर दिया था। उस समय इसके मुख्य उद्देश्य बताये गये थे- तीन-चार लाख करोड़ रुपयों की काली कमाई को रद्दी बना कर उस पर प्रहार करना, देश में आतंकवादियों एवं नक्सलवादियों की कमर तोडऩा। 

बाद के दिनों में धीरे-धीरे इस योजना की असफलता की बढ़ती आशंकाओं के कारण सरकारी पक्ष द्वारा इसके भ्रष्टाचार की समाप्ति, केसलेश प्रवृत्ति को अधिकाधिक प्रोत्साहन, अनोपचारिक से अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाना, जो रकम जन धन योजना वाले खातों में असामान्य रूप से अधिक रूप में जमा हुई है उसके असली जमाकर्ताओं का पता लगा कर उन्हें बेनकाब करना जैसे ‘उद्देश्यों’ को जोड़ दिया गया। अब जब रिजर्व बैंक ने कह दिया है कि 99.30 प्रतिशत राशि बैंकों में जमा हो गई है तो स्वत: सिद्ध हो गया कि योजना के उद्देश्य किसी भी रूप में पूरे नहीं हुये हैं।

वैसे भी यह अद्र्धसत्य ही है कि केवल दस हजार से कुछ अधिक करोड़ रुपये ही वापस नहीं आये। क्योंकि जो राशि आई हुई बताई गई है उसमें देश के सहकारी बैंकों तथा नेपाल व भूटान में जमा राशियों को तो इसमें शामिल ही नहीं किया जो मोटे अनुमान के अनुसार एक लाख करोड़ रुपयों से अधिक राशि है। नेपाल के लिये तो यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि पिछले महिनों में वहां के प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा इसी विषय पर बातचीत करने को की थी। साथ ही इस बात को भी मानना ही पड़ेगा कि जिन सूचनाहीन व असहाय लोगों के पास उनकी जिंदगी भर की मेहनत की कमाई नोटों के रूप में घर में यहां-वहां छिपा कर रखी गई थी वे उसके बड़ी मात्रा मेें जमा करवा ही नहीं सके। यह एक तरह से उनके प्रति अन्याय था। इसी प्रकार जिन बेचारे गरीब लोगों के खातों में दो नम्बरी प्रभावशाली लोगों ने करोड़ों-लाखों रुपये अपनी काली कमाई के जमा करवा दिये वे बिना कारण ही जिंदगी भर के लिये कानूनी झंझट में फंस गये हैं।

 उनके सामने इधर पड़ो तो कुआं, उधर पड़ों तो खाई जैसी स्थिति हो गई है। वे यह कहते हैं कि सारी रकम उनकी है तो स्त्रोत पूछने पर वे दोषी ठहराये जाते हैं और वे असली व्यक्ति का नाम बताते हैं तो समाज में उनकी इज्जत चली जाती है तथा भविष्य में वे एक तरह से अपने समाज में ही अकेले से पड़ जाते हैं। सरकार जिन करोड़ों गरीब लोगों के बैंकों में खाते खुलवाने के काम को अच्छा बता रही है। इन्हीं खातों के कारण उनमें से अधिकांश की जिंदगी नरक बन चुकी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार देश में करीब 36 करोड़ खाते निष्क्रिय जैसे हो गये हैं। न्यूनतम अनिवार्य बैलेंस की अनिवार्यता के कारण इन्हीं खातेधारकों से अकेले स्टेट बैंक ने ही चौदह हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा रकम वसूल ली गई है।

जहां तक 18 लाख खातों के राडार पर होने का सवाल है उससे नोटबंदी का उद्देश्य काले धन को पकडऩे का पूरा होगा इसमें भारत की प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारों की कमजोर इच्छाशक्ति के इतिहास और न्यायिक व्यवस्था की शिथिलता को देखते हुये संभावना नहीं के बराबर ही लगती है। आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या चाहे 6 करोड़ से अधिक हो गई हो लेकिन यह वृद्धि प्रथम तो निरन्तर प्रक्रिया का हिस्सा है एवं दूसरा लोग डर के मारे शून्य या बहुत ही कम आयकर दिये जाने पर भी रिटर्न भर रहे हैं। अगर नोटबंदी नहीं होती तो भी ऐसा कुछ तो होता ही रहता। इसी प्रकार फर्जी कम्पनियां भी हर वर्ष हजारों की संख्या मेें बंद होती है। सरकार की यह सोच और प्रचार की भूख वास्तविकता से मेल नहीं खाती कि पिछले दो वर्षों में जो भी कुछ अर्थव्यवस्था में अच्छा हुआ है वह नोटबंदी के कारण ही हुआ है। सरकारें तो हर दिन कुछ ना कुछ करती ही रहती हैं।

जहां तक दूसरे महत्वपूर्ण उद्देश्य-आतंकवाद की कमर तोडऩा तो व्यवहार में परिणाम तो विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं। काश्मीर में पिछले दो वर्षों में तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक सैनिकों को शहीद होना पड़ा, नागरिकों को अपनी जान गवानी पड़ी, आतंकवादी घटनाएं बढ़ी तथा वहां के नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा परेशानियां हो रही हैं। इन समस्याओं को दूर करने के असफलत प्रयासों में ही अरबों रुपये सरकारों को प्रति वर्ष परोक्ष रूप से अनुत्पादक कार्यो पर खर्च करने पड़ रहे हैं, वहां की अर्थव्यवस्था व्यापार व पर्यटन चौपट होने की स्थिति में पहुंच गया है। नक्सलवाद भी घटने का नाम नहीं ले रहा है। दुर्घटनाएं व इनमें होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। हां विरोधी दलों के सामने तरलता की समस्या अधिक हो गई है। उनकी खस्ता हालात की मजबूरी तो यह हो गई है कि उनसे न खाते बन रहा है व न निगलतो। देश में जो-जो व्यापार दो नम्बर में होता था अब बड़ी समस्या पैदा हो गई है। फ्लेट और प्लाट्स के दाम तीन से चालीस प्रतिशत गिर जाने के बावजूद भी वास्तविक सौदे बहुत कम हो गये हैं। 

करीब एक हजार बड़े बिल्डर्स दिवालिया होने की स्थिति में पहुँच गये हैं, जवाहरात के व्यापार पर बड़ा झटका लगा है, ब्राण्डेड वस्तुओं की मांग घट गई है, निर्यात लगातार कम होते जा रहे हैं। बैंकों में जमा करवाने व ऋण लेने वाले रिकार्ड मात्रा में कम हो गये हैं। डिफाल्टर होने का रोग अब छोटे ऋणियों में भी लग गया है व वह महामारी बनने की प्रक्रिया में है। नोटबंदी के कारण छोटे व्यापारी, उद्योगपति, व्यवसायी, रोज मजदूरी करने वाले, पार्ट टाइम जोब करने वाले, एनजीओ के माध्यम से रोजगार प्राप्त करने वाले, शिक्षित युवा, महिलाएं, शोरूम मालिक कितने बरबाद हुये हैं उनकी स्थिति आंकड़ेबाज न समझ रहे हैं व न समझ सकते हैं। प्राय: सभी सरकारें तरलता की कमी से जूझ रही हैं।

अब केवल प्रश्र यह रह जाता है कि आगे अर्थव्यवस्था का क्या होगा? वर्तमान के यथार्थ और भविष्य की आशंकाओं से तो लगता है यह नोटबंदी कम से कम आगामी पांच वर्ष तो परेशान करेगी ही। क्योंकि उत्पादन के पांच तत्वों- भूमि, श्रम, पूँजी, प्रबंध एवं साहस के योगदान से जो जीडीपी बनती है वे तो सभी विकास की ऋणात्मक दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। तो मानना पड़ेगा की जो जीडीपी, आधार वर्ष में परिवर्तन और लागत के स्थान पर अंतिम वल्यू एडिशन के आधार पर निकाली जा रही है वह तो पहले से ही बताई गई से कम से कम दो प्रतिशत कम होती है। 

जो वृद्धि हो भी रही है। वास्तविक वृद्धि तो तब हो जब छोटे उद्योग धंधे पहले की ही तरह स्वत: विकास प्रक्रिया को प्राप्त कर सके, बैंकों में ऋण लेने वालों की संख्या बढ़े, नयी नौकरियां सृजित हो, 25 लाख खाली पड़े पद सरकारों द्वारा भरे जायें। ऐसा निकट भविष्य में हो सकेगा। इसकी संभावना बहुत ही कम है। बात एक आशा इसी बात की है कि आगामी महिनों में चुनाव के कारण सरकारी व दलों द्वारा खर्चा असामान्य रूप से अधिक होगा, इससे सामान्य जन की क्रयशक्ति बढ़ेगी, मांग बढ़ेगी और विकास का चक्र कुछ तेजी से घुम सकेगा।
(ये लेखक के निजी विचार है) 

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