लोस-विस चुनाव साथ कराने पर विचार

Samachar Jagat | Friday, 25 Nov 2016 02:01:00 PM
लोस-विस चुनाव साथ कराने पर विचार

लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विचार दिए जाने के बाद विधि मंत्रालय ने इस मुद्दे पर कानूनी और अन्य कोणों से अलग-अलग विचार किए जाने का सुझाव दिया है। लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराए जाने के विचार को अमली जामा पहनाए जाने से पहले जब हम कानूनी पहलू पर विचार करेंगे तो उसमें संविधान संशोधन भी शामिल होगा और इस संशोधन को संसद में पारित कराना अनिवार्य होगा। 

विधि मंत्रालय ने सरकार के उच्च स्तर पर भेजे गए एक नोट में इस मुद्दे को विचार के लिए दो हिस्सों में बांट दिया है। कानून मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने पिछले साल दिसंबर में अपनी रिपोर्ट में लोकसभा और राज्यसभा चुनाव साथ-साथ कराए जाने की सिफारिश की थी। 

इसके बाद कानून मंत्रालय ने चुनाव आयोग से उसके विचार मांगे थे। आयोग ने इस विचार का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि इस पर खर्च अधिक आएगा और कुछ राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाने या घटाने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। बहरहाल, स्थायी समिति की रिपोर्ट और चुनाव आयोग के पक्ष का विश्लेषण करने के बाद मंत्रालय ने इस मुद्दे को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक तहत कानूनी पहलू को रखा गया है और दूसरे में अवसंरचना, वित्तीय और अन्य पक्ष शामिल है। 

लोकसभा के कार्यकाल के अनुरूप लाने के लिए राज्य विधानसभाओं की अवधि या तो अवधि बढ़ाई जा सकती है, या घटाई जा सकती है और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद तीन और चार में संशोधन की जरूरत होगी। ऐसी भी स्थिति आ सकती है, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो या सरकार के खिलाफ अविश्वास पारित किया जाए। इस बारे में सरकार को यह देखना होगा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने के लिए ऐसी स्थिति से कैसे निपटा जाए। ईवीएम का निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों बीईएल और ईसीआईएल द्वारा किया जाता है। 

इस बारे में भी विचार करना होगा कि क्योंकि उन्हें नई मशीने बनाने के लिए कितने समय की जरूरत होगी। इधर नीति आयोग ने लोकसभा और विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ लाने के बजाए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के खिलाफ लाने का सुझाव दिया है। चुनाव आयोग ने भी इसी तरह का सुझाव दिया है। आयोग का कहना है कि सरकार गिरने की स्थिति में नया नेता सरकार चलाए और वैकल्पिक सरकार पर सहमति न बनने की स्थिति में राष्ट्रपति देश के प्रशासक के तौर पर राज करे। 

देश में बार-बार चुनाव होने से देश के किसी न किसी हिस्से में आदर्श चुनाव आचार संहिता लगी रहती है, जिसके कारण नीतिगत निर्णय लेने में दिक्कते सामने आती है। 2014 के आम चुनाव से लेकर 2016 तक 15 राज्यों के चुनाव हो चुके हैं। चुनाव कालाधन और भ्रष्टाचार की जननी है। चुनाव की घोषणा के बाद आचार संहिता लगने से सरकारी मशीनरी ठप हो जाती हैं और विकास कार्य बाधित होते हैं।

 अगर दोनों चुनाव एक साथ हो तो भारी धनराशि की बचत हो सकती है। ऐसा नहीं है कि आजाद भारत में दोनों चुनाव साथ-साथ नहीं हुए है। पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। तब से 1967 तक लगातार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हुए। यह निरंतरता 1968 और 1969 में बाधित हुई। जब विधानसभाएं अपना कार्यकाल पूरा कराने से पहले ही भंग कर दी गई। 1969 की चौथी लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। तब से दोनों चुनाव अलग-अलग होने लगे।

 संसद की स्थायी समितियों, लोक शिकायत, कार्मिक और कानून तथा न्याय ने भी दोनों चुनावों को एक साथ कराने से संबंधित अपनी 79वीं रिपोर्ट संसद में पेश की है। विधि आयोग ने भी 1999 में अपनी रिपोर्ट में सरकारों के स्थायित्व के लिए दोनों चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया था। चुनाव आयोग भी इस बात पर सहमत है। उसका मानना है कि लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल की तिथि निर्धारित हो।

 यदि किसी कारण इन्हें समय से पहले भंग करने की नौबत आती है तो लोकसभा में किसी सरकार के विरुद्ध लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव के साथ ही विश्वास मत का प्रस्ताव लाया जाना आवश्यक होगा ताकि सरकार गिरने की स्थिति में दूसरी सरकार चुन ली जाए। यह नियम विधानसभाओं पर भी लागू होना चाहिए। इसके बावजूद कोई सरकार नहीं बनती है और चुनाव कराना आवश्यक हो जाता है तो सदन का कार्यकाल अपने मूल कार्यकाल तक ही रहना चाहिए। जहां तक चुनाव में खर्चे का सवाल है, चुनाव आयोग ने सरकार तथा समिति को बताया है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) तथा वोटर वेरिफयेबल पेपर आडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) मशीने खरीदनी होगी। 

आयोग ने कहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने के लिए ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनें खरीदने के वास्ते 9,284.15 करोड़ रुपए की जरूरत होगी। संसदीय समिति ने चुनाव आयोग के हवाले से कहा कि मशीनों को हर 15 साल में बदलने की जरूरत होगी, जिस पर फिर बड़ा खर्चा आएगा। 

इसके अलावा इन मशीनों के रखरखाव पर भी भारी भरकम राशि खर्च होगी। निर्वाचन संबंधी कानून के अनुसार सदन का कार्यकाल समाप्त होने से छह माह पूर्व चुनाव कराए जा सकते हैं और सदन का कार्यकाल आपातकाल की अधिसूचना को छोडक़र अन्य मामलों में नहीं बढ़ाया जा सकता। लोकसभा के कार्यकाल के अनुरूप लाने के लिए, राज्य विधानसभाओं के सदनों में अवधि या तो बढ़ाई जा सकती है या घटाई जा सकती है और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद तीन और चार में संशोधन की जरूरत होगी।

 विधि आयोग ने 1999 में अपनी 170वीं रिपोर्ट में चुनाव सुधार की सिफारिश की थी, तब से एक ही दिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की चर्चा चल रही है। संसद की स्थायी समिति ने भी सरकार, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों से रायमशविरा किया था। लेकिन कोई पक्की बात उभरकर सामने नहीं आई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 3 नवंबर को पत्रकारों के सामने इस विषय पर चर्चा करने की अपील की थी। यहां यह भी बता दें कि पूर्व में उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए स्व. भैरोसिंह शेखावत ने भी लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराने की वकालत की थी। अब यदि प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर दोनों चुनाव साथ कराए जाने पर राष्ट्रीय सहमति बन जाती है तो यह ऐतिहासिक चुनाव सुधार होगा।

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