नाबालिग शासक और माजियों का दबदबा

Samachar Jagat | Friday, 03 Aug 2018 10:08:12 AM
Minor rulers and men's oppression

जयपुर एक मनोहर शहर जो देश ही नहीं दुनिया भर के खासों-आम का पसंदीदा स्थान या मुकाम रहा है और जिसने अपने रचना काल से ही महान ऊंचाई को पा लिया था के सामने कई बार ऐसे भी मौके आए जब इसे प्रतिकूल परिस्थितियों से रूबरू होना पड़ा। कहें तो सवाई जयसिंह द्वितीय का शहर जैपर (जयपुर) जो शुरू के कई दशकों तक सफलता के शिखर या चरम बिन्दु तक पहुंच चुका था के सामने एक समय गिरावट का दौर भी आया। शिखर का यह ठिकाणा शहर निर्माण के बाद के 76 वर्षों (1727-1803 ई.) तक कायम रहा। यह वो दौर था जब इसके सितारे बुलंद थे।

 वह समय था जब सवाई ईश्वरी सिंह ने ईसरलाट (सरगासूली), सवाई माधोसिंह, प्रथम ने माधो विलास और सवाई प्रताप सिंह ने जाली झरोकों से अंलकृत हवामहल जैसी शानदार इमारते बनवाई। यह सब निर्माण तब हुए जब भारतीय इतिहास के उस अंधकार पूर्ण युग में एक दिन के लिए भी खुद के जीवन और राज्य को महफूज मानकर चैन की सांस लेना भी मुश्किल माना जाता था। उस युग में जयपुर ने स्थापत्य और कला के विकास की महत्वाकांक्षाओं को मूर्त रूप दिया जिसकी पूर्ति स्थिरता और शांति व्यवस्था के काल में भी शायद ही हो पाती।

सवाई प्रताप सिंह के बाद के शासक सवाई जगत सिंह और सवाई जयसिंह तृतीय अपने पुरखों के अच्छे कार्योंे या थाती को माकूल तरह से संजोने या संवारने में नाकाम साबित हुए और नागरिकों को प्रति अपने कर्तव्योंको भी निभाने की अनदेखी करते रहे। इतिहासकार इसे समय का अभाव मानते हैं। वक्त के हालात के मुताबिक यह भी माना जाता है आपसी झगड़ों और सवाई माधोसिंह प्रथम के समय से चले आ रहे मराठों और अन्य के आक्रमणों के कारण यहां के हालात काफी खराब चल रहे थे। हालांकि 1818 ई. में सवाई जगत सिंह ने इनसे निजात पाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की लेकिन यकायक हालात में सुधार नहीं हुआ। तब करीब चार दशक तक जयपुर में अव्यस्क (नाबालिग) राजा भी शासक रहे, रियासत में राज्य प्रतिनिधि के रूप में माजियों साहिब और उनके कृपा पात्र मुंह लगे लोग सलाहकार बने। 

उनका दखल हद से ज्यादा शासन के कामकाजों में बढ़ गया। यह सब हालात ऐसे बने जिनकी वजह से रियासत का शासन प्रबंधन यकायक चरमरा गया, परिणाम स्वरूप रास्तों और गलियों का चरित्र बिगड़ने लगा, यहां तक कि इमारतों के बाजारों तरफ के मुखोटों की एक रूपता तक भी गड़बड़ाने लगी। चालीस वर्ष का वो काल खंड ऐसा था, जब जयपुर को अव्यस्क, निर्वक्त और अयोग्य शासक मिले। नतीजन माजी साहिबों और उनके गहरे मुंहबोले कामदारों एवं सलाहकारों की मनमानी तथा निरकुंशता काफी बढ़ गई।

काल चक्र घूमता गया सवाई रामसिंह द्वितीय बालिग हुए। उन्होंने महसूस किया कि लड़खड़ाते शहर को बचाना तो इसे एक मजबूत और दमदार शासन प्रबंधन देना होगा। इस सोच को मूर्त रूप देने के लिए सवाई रामसिंह ने महकता इमारत (सार्वजनिक निर्माण विभाग) के साथ ही म्युनिस्थिल कमेटी जैसे विभाग बनाए। इन दोनों को ही फूर्ति और सही अर्थो  में कामों को अंजाम देने के निर्देश दिए गए ताकि शहर के गिरते स्वरूप को तेजी से संवारा जा सके। साथ ही इसके लिए कठोर नियम और कानून बनाकर लागू किए गए।
- रामस्वरूप सोनी
वरिष्ठ पत्रकार



 

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