डराने लगा है मानसून का बदला मिजाज

Samachar Jagat | Wednesday, 11 Jul 2018 10:41:46 AM
Mood swings of monsoon

जलवायु परिवर्तन के कारण मानूसन को बदला मिजाज अब डराने लगा है। वैसे तो प्रदेश में मानसून आए करीब दो सप्ताह हो गए है। लेकिन उदयपुर, बांसवाड़ा जैसे कुछ शहरों को छोडक़र अधिकतर शहरों में मानसून की बांट जोहते परेशान हो गए हैं। प्रदेश भर में बारिश का इंतजार है। इधर मानसून की गति मंद पड़ते ही गर्मी ने अपना साम्राज्य बना लिया है और इसका विस्तार किया जा रहा है। मानूसन के आगमन के बावजूद रविवार को राजधानी में रविवार का दिन इस सीजन का सबसे गर्म दिन रहा। राजधानी जयपुर में पारे ने अब तक के रिकार्ड तोड़ दिए। 

यहां दिन का तापमान 42.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यही नहीं मानसून सीजन होने के बावजूद प्रदेश के 8 शहरों में पारा 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। बारिश के इंतजार में चुरू तो इतना तप गया कि पारा 45 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया। मानसून की मनमानी के चलते लोग कहने लगे हैं कि यह मौसम बारिश का है या गर्मी का। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ रहा है। राजधानी जयपुर ही नहीं बीते एक सप्ताह से न केवल भारत बल्कि विश्व के कई देशों में गर्मी ने वर्षों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। 

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान के कारण धरती के तापमान में हो रही वृद्धी ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक लेख के अनुसार बीते सप्ताह में गर्मी के सभी रिकार्ड टूट गए हैं। बढ़ते तापमान के आंकड़ों के अनुसार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में धरती का अधिकांश भूभाग आग के गोले में तब्दील हो सकता है। बीते सप्ताह आयरलैंड, कनाडा, स्कॉटलैंड, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन और मध्यपूर्व के कई शहरों में तापमान उच्चतम स्तर पर है। वैश्विक पूर्वानुमानों के मुताबिक पूर्वी कनाडा में लू लगने से पिछले हफ्ते में करीब 54 लोगों की मौत हुई। इनमें से ज्यादातर मॉट्रियल से थे। वहीं अल्जीरिया में यह 51.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है।

अफ्रीका के इतिहास में पिछले सप्ताह गुरुवार सबसे गर्म दिन रहा। जबकि साइबेरिया और आर्कटिका जैसे सर्द इलाकों में भी तापमान लगातार बढ़ रहा है। ठंडे मुल्कों में भी लू लगने से लोगों की मौत होना एक अजूबा है। कनाडा के मॉट्रियल का तापमान 2 जुलाई को 97.9 डिग्री (फारेनहाइट) यानी 36.6 डिग्री सेल्सियस रहा। पिछले 147 साल में यह उच्चतम तापमान रहा। यहां यह उल्लेखनीय है कि कई अध्ययनों के बावजूद मानसूनी हवाओं के कई पहलू आज भी रहस्य बने हुए हैं। इन्हीं रहस्यों पर पर्दा उठाने के लिए अमेरिका और भारत ने मिलकर काम करने का फैसला किया है। भारत का हिंद महासागर शोध पोत ‘सागर निधि’ का नया मिशन इसी की कड़ी है। यह बंगाल की खाड़ी में रहकर भारत में 70 फीसदी बारिश के लिए जिम्मेदार दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करेगा।

 कार्यक्रम के तहत सागर निधि एक महीने तक बंगाल की खाड़ी में तैरकर समुद्र की विभिन्न गहराई और स्थानों से आंकड़ा एकत्र करेगा। इन आंकड़ों का इस्तेमाल समुद्र के ऊपरी सतह और वायुमंडल के संपर्क से उत्पन्न प्रभाव के अध्ययन के लिए किया जाएगा। वहीं सागर निधि से एकत्र आंकड़ों का मिलान अमेरिकी शोध पोत ‘थॉमस जी थॉम्पसन’ से लिए गए आंकड़ों से किया जाएगा, परियोजना 2013 को मानसून मिशन के तहत शुरू की गई थी। भारत की ओर से पृथ्वी मंत्रालय परियोजना के लिए वित्त मुहैया करा रहा है। यहां यह बता दें कि भारत में बारिश के मौसम में मानसून के मनमौजी व्यवहार से अक्सर मुश्किलें पैदा होती है। अगर लगातार मानसून सक्रिय रहा तो कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। 

वहीं कई दिनों तक मानसून क निष्क्रिय रहने से जैसा कि पिछले दो सप्ताह से मानसून हिमालय की तराई वाले क्षेत्र में जाकर निष्क्रिय हो गया है। इस स्थिति के चलते सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है। इसीलिए इस अध्ययन से पूर्वानुमान लगाने और हालात से निपटने के लिए बेहतर तैयारी का मौका मिलेगा। मानसून को लेकर विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट की माने तो अगले तीन दशक में ही मानसूनी बारिश के वितरण में भारी बदलाव आ जाएगा। इसका नतीजा यह होगा कि जहां आज भारी वर्षा होती है, वहां सूखा पड़ेगा और मौजूदा रेगिस्तान में झमाझम बारिश होगी। बीते पांच साल के आंकड़ों पर नजर डाले तो यह होने भी लगा है। पिछले साल राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर जिलों में आई बाढ़ इसकी बानगी भर है। 

विश्व बैंक की रिपोर्ट में भविष्य को लेकर चिंता जताई गई है। इसके मुताबिक ऐतिहासिक रूप से जो स्थान कम बारिश के लिए जाने जाते हैं, उन स्थानों पर बारिश ज्यादा होने लगेगी। वहीं जो स्थान ज्यादा बारिश के लिए जाने जाते हैं, वहां तेजी से बारिश घटेगी। इसका प्रभाव कृषि और क्षेत्र की समस्त जलवायु पर पड़ेगा। मसलन आज रेगिस्तान वाले इलाकों में बारिश कम होती है, लेकिन वहां बारिश बढ़ भी गई तो उसका कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला है, क्योंकि वहां फिलहाल कृषि के अनुकूल परिस्थितियां नहीं है। जबकि यदि कृषि बेल्ट में बारिश घटती है जहां बारिश पर ही खेती निर्भर है, तो वहां लोगों को भारी आर्थिक क्षति होगी। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी हवाओं की गति भी प्रभावित होगी। इसकी वजह से इसके आने के समय में भी अनिश्चिता बढ़ेगी। हाल के वर्षों में इसका संकेत मिला भी है। कभी मानसून बहुत जल्दी आ जाता है तथा कभी बहुत देरी से।

 इस साल मानसून राजस्थान के पश्चिमी इलाके और जम्मू-कश्मीर में निर्धारित समय से दो हफ्ते पहले ही पहुंच गया और अब दो हफ्ते से निष्क्रिय भी है। जबकि रफ्तार होने के बावजूद बिहार और पूर्वांचल में आने में करीब 10 दिन की देरी हुई। इसी प्रकार मानसून की वापसी में भी देरी हो रही है। पहले 15 सितंबर तक लौट जाता था लेकिन अब अक्टूबर के पहले हफ्ते तक यह सक्रिय रहता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि मानसूनी बारिश में यदि पूरे देश में या किसी क्षेत्र विशेष में कमी होती है तो इसका प्रभाव उस क्षेत्र के उत्पादन के साथ-साथ जल उपलब्धता पर भी पड़ेगा। ताजे पानी और भूजल दोनों में यह प्रभाव दिख सकता है। कृषि उपज घटने की भी आशंका है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रियोलोजी पुणे की ओर से किए गए एक अन्य शोध के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के अनुपात में मानसून भी कमजोर होता जाएगा। 

शोधकर्ताओं के मुताबिक हिंद महासागर का तापमान बढ़ने से मानसून के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा नहीं होगी, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप भयंकर सूखे की चपेट में आ सकता है। खैर फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि 10-12 दिन पहले मानसूनी बादल जो कुछ बरस कर चले गए थे, अब कब लौटेंगे। मौसम विभाग की माने तो पूर्वानुमान के अनुसार 10 जुलाई को राजधानी सहित प्रदेश में कुछ स्थानों पर बारिश के आसार है।



 

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