सांसद निधि योजना का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है

Samachar Jagat | Saturday, 09 Feb 2019 05:28:42 PM
MP funds are not being used properly

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केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार साल 2014 से अब तक 543 में से केवल 35 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों मेें ही सांसद निधि का इस्तेमाल कर स्वीकृत प्रोजेक्ट पूरे किए गए है। परियोजनाओं में विलंब को देखकर केंद्र सरकार इसकी फंडिंग के तरीके में बदलाव पर विचार कर रही है। अभी तक इसके तहत राशि दो किस्तों में दी जाती है। सरकार एक किस्त में ही राशि आवंटित करने के बारे में सोच रही है। सांसद निधि योजना (एमपी लैड स्कीम) की शुरुआत 1993 में हुई थी, जब पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। इसके तहत सभी एमपी को, चाहे वे लोकसभा के हों या राज्यसभा के, अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास कराने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। 


इसका मकसद विकास कार्यों का विकेन्द्रीकरण करना था। सोचा गया कि जनहित के वे छोटे-छोटे कार्य जो बड़ी परियोजनाओं में समाहित नहीं हो पाते। इसके जरिए आसानी से कम समय में हो सकेंगे। पर सच्चाई यह है  कि इस योजना की राशि जरूर बढ़ती गई, लेकिन इससे जनता को खास लाभ नहीं हो पाया है। इसमें भ्रष्टाचार के भी आरोप लगते रहे हैं। इसलिए एक तबका इसे समाप्त करने की सलाह देता है। कुछ सांसद इसके सफल न होने के पीछे नौकरशाही को जिम्मेदार ठहराते हैं। इस योजना की राशि सांसद खाते में नहीं बल्कि संबंधित जिले के जिलाधिकारी या किसी अन्य नोडल अधिकारी के खाते में जाती है। इस योजना के तहत वित्त वर्ष शुरू होने से पहले यह राशि 2.5 करोड़ रुपए की दो किस्तों में भेजी जाती है। सांसद जिला अधिकारी को बताता है कि उसे जिले में कहां-कहां इस राशि का उपयोग करना है। ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई कि कोई सांसद मनमाने ढंग से इसे खर्च न कर सके। लेकिन सांसदों को कहना है कि जिला प्रशासन के रवैए के कारण परियोजना लटकती रहती है।

एक किस्त मिलने के बाद जब तक उसका यूटिलाइनेशन प्रमाण पत्र नहीं जमा किया जाता। तब तक दूसरी किस्त जारी नहीं होती। कई कारणों से जिला प्रशासन द्वारा यह सर्टिफिकेट जमा करने में देरी होती है। तमिलनाडु से पट्टाली मक्कल कट्चि (पीएमके) के सांसद अबुमणि रामदास का आरोप है कि पिछले चार साल में वह अपने क्षेत्र के कलेक्टर के रवैए के कारण किसी भी योजना को ठीक से लागू नहीं कर पाए। शहरी इलाकों में जमीन न मिलने के कारण भी विकास कार्य अटका रहता है। इस कारण पैसे जारी नहीं हो पाते। कई सांसद मानते हैं कि एक किस्त में पैसे देने से भी समस्या नहीं सुलझेगी। एक सलाह यह भी है कि इसका सोशल आडिट हो। सरकार इसके सारे पहलुओं पर विस्तार से विचार करे और जरूरत हो तो इसमें आमूल परिवर्तन करें।
 

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