राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम लक्ष्य से पिछड़ा

Samachar Jagat | Monday, 20 Aug 2018 09:42:56 AM
National Rural Drinking Water Program

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केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार ने गांवों में पीने का साफ पानी पहुंचाने के लिए लागू की गई राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम को लेकर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी सीएजी (कैग) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। संसद के मानसून सत्र में पेश रिपोर्ट में कैग ने कहा है कि प्लानिंग और पैसों के प्रबंधन की खामियां पूरी योजना पर भारी पड़ रही है। यानी सरकार की लापरवाही के चलते ये योजना अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई है और ज्यादातर काम पूरे नहीं हो पाए हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक 2012-17 के बीच सभी गांवों, स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों तक स्वच्छ पेयजल पहुुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन केंद्र सरकार केवल 44 फीसदी गांवों और 85 फीसदी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों तक ही स्वच्छ पेयजल पहुंचा पाई है। इतना ही नहीं केंद्र सरकार प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर की दर से पाइप लाइनों के जरिए केवल 18 फीसदी ग्रामीण आबादी तक स्वच्छ पेयजल पहुंचा पाई है, जबकि लक्ष्य 50 फीसदी आबादी तक पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य था। इतना ही नहीं 2012-17 के बीच सरकार ने 81 हजार 168 करोड़ रुपए खर्च किए लेकिन प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 40 लीटर की दर से पेयजल की आपूर्ति में इजाफा सिर्फ 8 फीसदी ही हुआ।

 जबकि 55 लीटर की दर से आपूर्ति महज 5.5 फीसदी बढ़ पाई। स्वच्छ पेयजल योजना के तहत 35 फीसदी घरों तक पानी का कनेक्शन पहुंचाने का लक्ष्य था, लेकिन 17 फीसदी घरों को ही कनेक्शन मिल पाया। सीएजी ने लक्ष्य पूरा ना हो पाने के पीछे आधे-अधूरे और अनुत्पादक खर्चों को जिम्मेदार बताया है। इतना ही नहीं केंद्र सरकार इस योजना के लिए आवंटित 89 हजार 956 करोड़ रुपए में से 8 हजार 788 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं कर पाई। केंद्र सरकार ने जन कल्याण की अनेक योजनाएं शुरू की। इनको लेकर प्रचार भी खूब किया और धारणा यह बनी कि सरकार जमीन पर अपनी योजनाओं को लागू करने में काफी हद तक कामयाब हो रही है। 

लेकिन वास्तविक स्थिति पर नजर डालें तो अक्सर निराशा हाथ लगती है। इससे लगता है कि केंद्र सरकार का दावा जमीनी कम, कागजी ज्यादा है। कैग ने देश के अलग-अलग राज्यों से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि कई राज्यों ने तो योजना पर व्यय भी कर दिया है, लेकिन जमीन पर कोई काम दिखाई नहीं दे रहा है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक सैंपल सर्वे करके राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जहां इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों की कुछ बस्तियों में पानी की गुणवता मापी गई तो कई बस्तियों में खराब पानी पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के 87 गांवों में से 62 में पीने योग्य पानी है। 

वहीं मध्य प्रदेश में 176 में से 166 और छत्तीसगढ़ में 113 में 106 बस्तियों में पीने योग्य पानी है। रिपोर्ट के बताया गया है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में पानी शुद्ध करने के लिए डी-फ्लोराइड इकाइयों शुरू हुई पर समय से पहले ही बंद हो गई। यहां यह उल्लेखनीय है कि नीति आयोग ने भी अपनी कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स-2018 जारी करते हुए पीने के पानी के संकट को लेकर गहरी चिंता प्रकट कर चुका है। नीति आयोग के सूचकांक के अनुसार देश में 60 करोड़ भारतीय यानी देश की आधी आबादी पानी की कमी से जूझ रहा है। नीति आयोग के अनुसार 2 लाख लोगों की स्वच्छ पानी की कमी से हर वर्ष मौत हो जाती है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक 40 फीसदी भारतीयों को पेयजल नहीं मिलेगा। 

यही नहीं दो साल बाद यानी 2020 तक देश के 21 शहरों में पीने का पानी खत्म हो जाएगा। यहां यह बता दें कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में राज्यों की ओर से गलत जानकारी देने का भी मुद्दा उठाया है। कैग ने कहा है कि राज्यों की ओर से जो रिपोर्ट सौंपी गई है उसमें कई विसंगतियां है और आंकड़ों में भी खेल किया गया है। उदाहरण के तौर पर राज्यों ने जिन इकाइयों के सुचारू रूप से चलने की बात कही है, मौके पर वे इकाइयां काम नहीं कर रही है।

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