नोटबंदी से जीडीपी की रफ्तार पर ब्रेक

Samachar Jagat | Monday, 28 Nov 2016 03:54:13 PM
नोटबंदी से जीडीपी की रफ्तार पर ब्रेक

दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री, पूर्व प्रधानमंत्री पी.बी. नरसिंहराव के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहे भारत में आर्थिक उदारीकरण नीति के जनक, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर और प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछले सप्ताह गुरुवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि विमुद्रीकरण का उनका तरीका आम आदमी के पैसे की ‘‘सुनियोजित लूट और कानूनी नोंच खसोट है।’’ इसके क्रियान्वयन में हुई ‘‘भारी बदइंजामी’’ के कारण सामान्य नागरिकों को महान कष्ट और पीड़ा झेलनी पड़ी है। 

डॉ. सिंह ने सरकार को आड़े हाथों लिया और नोटबंदी को इतिहास का सबसे बड़ा कुप्रबंधन करार दिया। विपक्ष द्वारा विमुद्रीकरण की कड़ी निंदा के साथ स्वर मिलाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने दस मिनट के संक्षिप्त भाषण में कहा है कि नोटबंदी का जो तरीका अपनाया गया है, उससे जनता का सरकार की मुद्रा व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा। डॉ. सिंह ने यह भी कहा कि मोदी ने 50 दिन का समय मांगा है, नोटबंदी का नतीजा दिखाने के लिए पर गरीब और दलित के लिए 50 दिन असहनीय यातना के दिन है। 

डॉ. सिंह ने कहा यद्यपि वे प्रधानमंत्री मोदी के कालेधन, जाली नोटों के खात्मे तथा आतंकवाद को मिल रही आर्थिक मदद को खत्म करने के उद्देश्यों से असहमति नहीं है, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि इसके लिए नोटबंदी के क्रियान्वयन में भारी असफलता का क्या परिणाम होने वाला है? मोदी के इस दावे पर कि दीर्घकाल में इससे देश को फायदा होगा, इस पर डॉ. सिंह ने प्रसिद्ध ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन कीन्स के उद्धरण को प्रस्तुत करते हुए कहा ‘‘दीर्घावधि में हम सभी मर जाते हैं।’’ डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि वे ऐसे किसी भी देश का नाम बताए जहां जनता अपने पैसे बैंक में जमा तो करा सकती है, पर उसे अपने ही पैसे निकालने की अनुमति नहीं है। डॉ. सिंह ने कहा कि 60-65 लोगों की मौत से बैंकिंग और मुद्रा व्यवस्था से भरोसा उठा सकता है। 

उनका यह भी कहना था कि नोटबंदी से जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में 2 फीसदी की कमी होगी। कृषि, लघु उद्योग सहित अन्य क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री व्यावहारिक तौर तरीके खोजें और ऐसे कदम उठाएं जिससे लोगों को राहत मिले। हालांकि डॉ. सिंह के आरोपों का जवाब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिया और कहा कि ज्यादा कालाधन आपके राज में हुआ। उन्होंने तंज कसा कि घोटालों की सरकार के मुखिया को चूक लग रही है। उन्होंने जीडीपी घटने को बेबुनियाद बताया। हालांकि डॉ. सिंह के कथन की पुष्टि अन्तरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ‘फिच’ ने भी की है। उसने संकेत दिया है कि अंतिम तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के अनुमान में कमी की जाएगी। नोटबंदी ने देश के आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने की आशंका बढ़ा दी है। 

रेटिंग एजेंसी ने वर्ष 2016-17 में 7.4 जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान जाहिर किया था। हालांकि पिछले वित्त वर्ष में देश की जीडीपी विकास दर 7.6 रही थी। रिपोर्ट में कहा गया है यह समस्या जितनी ज्यादा चलेगी, अर्थव्यवस्था पर उतना ही ज्यादा असर पड़ेगा। यह तय हो गया है कि चौथी तिमाही कमजोर रहने वाली है। इसलिए हमने अनुमानित दर को घटाने का फैसला लिया है। ‘फिच’ ने रिपोर्ट में कहा है कि 500 और 1000 के नोट बंद करने के फैसले से भारत में नकदी की समस्या पैदा हो गई है।

 इससे आर्थिक गतिविधियों के धीमें पड़ने की आशंका पैदा हो गई क्योंकि लोग खरीदारी नहीं कर पा रहे हैं, किसानों को बीज खरीदने में दिक्कतें हो रही है। बयान के मुताबिक बैंकों में लगी लंबी लाइनों से उत्पादन क्षमता भी प्रभावित हो रही है। जापानी वित्तीय सेवा कंपनी नोमूरा का अनुमान है कि खाद्यों की कीमत में नरमी से नवंबर में खुदरा मुद्रास्फीति घटकर 4 प्रतिशत के आसपास आ जाएगी।

 खुदरा मूल्य सूचकांक सीपीआई पर अधारित मुद्रास्फीति अक्टूबर में 4.2 प्रतिशत थी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यद्यपि डॉ. सिंह की बात को एक राजनीतिज्ञ के रूप में लिया और उनसे जो जवाब बन पड़ा दिया, लेकिन उनके भाषण से राजनीति निकालकर एक अर्थशास्त्री की सलाह के रूप में लिया जाए तो ज्यादा अच्छा रहेगा। डॉ. सिंह सिर्फ दो बार के कार्यकाल वाले पूर्व प्रधानमंत्री ही नहीं है, बल्कि जैसा कि शुरू में ही लिखा जा चुका है कि वे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे हैं, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी रहे है। वे विश्व विख्यात अर्थशास्त्री है, जो जिनेवा में स्थित ग्लोबल थिंक टैंक के प्रमुख भी रहे हैं।

 वे देश के ऐसे वित्तमंत्री रहे है जिन्होंने देश में आर्थिक उदारीकरण के नए युग की शुरुआत की थी वे इसके जनक रहे हैं। पी.वी. नरसिंहराव के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था में आई इस नई क्रांति ने ही भारत में आर्थिक सुधार की जो वर्तमान सरकार का ग्रोथ एजेंडा है और अभी भी शुरू नहीं हुआ है। देश में नोटबंदी के बाद आर्थिक अव्यवस्था के इस दौर में अगर एक विशेषज्ञ आलोचना करता है तो देश हित में उसे गंभीरता से लेना ही होगा। उनकी सलाह को गंभीरता से तोलना ठीक रहेगा। देश में लंबी कतारों में खड़े गरीब और दलित लोग वास्तव में संकट में है।

 दिहाड़ी की मजदूरी छोडक़र कतार में लगने के बाद खाली हाथ लौटना कितना दुखदायी है, यह उनकी जगह जाकर देखने से ही पता चलता है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों के पास 58.4 फीसदी संपत्ति है और यह लगातार बढ़ रही है। रेटिंग एजेंसी क्रेडिट स्विस ग्रुप एजी के अनुसार 2014 में सबसे अमीर एक फीसदी लोगों के पास 49 प्रतिशत था, जबकि पिछले साल यानी 2015 में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत था। देश के सबसे अमीर दस फीसदी भारतीयों की बात करें तो उनकी संपत्ति का दायरा 2010 के 68.8 प्रतिशत के मुकाबले 2016 में 80.7 फीसदी तक पहुंच गया है। 

जबकि देश की गरीब 50 फीसदी आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का महज 2.1 प्रतिशत हिस्सा ही है। एजेंसी का कहना है कि सरकार कोई भी रही हो, अमीर लोगों की संपत्ति लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2000 में सबसे अमीर एक फीसदी की संपत्ति, देश की कुल संपत्ति में महज 36.8 फीसदी थी। पिछले 16 साल में एक तिहाई से ज्यादा बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर अमीरों और गरीबों की संपत्ति की तुलना करें तो भारत सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता वाले देशों में है। चीन में सबसे अमीर एक फीसदी लोगों की दौलत 43.8 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 49.3 प्रतिशत, ब्राजील में 47.9 और दक्षिण अफ्रीका में यह आंकड़ा 41.0 फीसदी है।

 भारत में जिस प्रकार से गरीब-अमीर के बीच आर्थिक विशमता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है, उसको नहीं पाटा गया तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है। नोटबंदी के बाद गरीबों और दलितों की स्थिति और भी दयनीय हो गई है। इसलिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अनुभवों के अनुसार जो सलाह दी है कि प्रधानमंत्री व्यावहारिक तौर तरीके खोजें और ऐसे कदम उठाएं जिससे लोगों को राहत मिले।


 

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