सोशल मीडिया पर भी कांटे की टक्कर

Samachar Jagat | Saturday, 16 Mar 2019 02:49:30 PM
On the social media, the thorns collide

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लोकसभा के आम चुनाव की तारीख की घोषणाओं के साथ राजनीतिक दल जहां एक लड़ाई जमीन पर लड़ने के लिए तैयार हो गए हैं, वहीं एक लड़ाई का आगाज सोशल मीडिया पर भी हो जाएगा। हालांकि इस बार सोशल मीडिया में होने वाली टक्कर पिछले आम चुनाव से कहीं अलग रहने की उम्मीद है। तब भाजपा ने सोशल मीडिया की लड़ाई में एक तरफा जीत दर्ज की थी। वहीं अब कांग्रेस भी भाजपा को बराबर की टक्कर देने की स्थिति में पहुंच चुकी है। 2014 में हुए आम चुनाव में अपने मतदाता तक पहुंचने और विपक्ष पर हमला करने के लिए पहली बार सोशल मीडिया खासकर फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल हुआ था।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने इसे सबसे पहले सोशल मीडिया की ताकत को पहचाना था और वह कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों पर छवि युद्ध की इस लड़ाई में भारी पड़ी थी। युवा मतदाताओं को रिझाने में वह रणनीति खासतौर पर कारगर रही थी। 2014 के चुनाव के बाद सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने वाले दलों एवं राजनेताओं ने सोशल मीडिया द्वारा मतदाताओं से सीधे मुखातिब होने की ताकत को पहचान लिया। 

अब कांग्रेस की सोशल मीडिया सेल भाजपा को सोशल मीडिया सेल की बराबर की टक्कर दे रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने ट्विटर अकाउंट को आफिस ऑफ आरजी से बदलकर सीधा राहुल गांधी कर चुके हैं। सोशल मीडिया से दूर रहने मायावती और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता भी ट्विटर पर आ चुके है। हालांकि, इन सबके बावजूद सोशल मीडिया पर भाजपा ने अन्य दलों से बढ़त ली हुई है। ऐसी स्थिति में राजनीति एवं सोशल मीडिया के जानकार मान रहे हैं कि इस बार सोशल मीडिया पर चुनावी टक्कर कांटे की रहेगी। इसके चलते संभव है कि आने वाले दो महीने फेसबुक और ट्विटर के साथ इंस्टाग्राम पर कडवाहट भरे गुजरे। सोशल मीडिया को लेकर केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने खुफिया ब्यूरो और राज्य पुलिस बलों को स्पेशल यूनिट्स बनाई है। सोशल मीडिया पर झूठी खबरों और नफरत फैलाने वाले संदेशों की निगरानी, सोशल मीडिया इंटरनेट पर आपराधिक गतिविधियों से निबटने के लिए राज्य और जिला स्तर पर सेल गठित किए हैं। 

वाट्सएप ने ऐसे मैसेज पर ‘फॉरवर्ड’ टैग लगाना शुरू किया है, जो कई लोगों से गुजरते है। इसके अलावा ‘फास्ट फारवर्ड’ बटन हटाया। ‘फारवर्डेड मेसेज’ को एक बार में 5 सदस्यों या गु्रप में भेजने की सीमा बांध दी है। अखबारों में विज्ञापन देकर ‘फेक न्यूज’ पहचानने के उपाय बताए है। आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले खाते बंद करने की मुहिम चला रखी है। 

इसी प्रकार ट्विटर ने खास ‘एलोरिझ’ बनाया जो आपत्तिजनक शब्दों वाले ट्वीट की पहचान ब्लाक कर देगा। चुनावों में सोशल मीडिया का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। इस चुनाव में भी सोशल मीडिया से प्रभावित होने वाले मतदाताओं के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। हाल ही में एक आंकड़ा आया था कि इस बार 9 करोड़ युवा महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगी। चुनाव आयोग ने बताया कि डेढ़ करोड़ युवा पहली बार वोट डालने जा रहे हैं। ये वह वर्ग है जो हमेशा सोशल मीडिया पर रहता है। ये वोट निर्णायक वोट साबित हो सकते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रचलन के चलते इस बार लोकसभा चुनाव के कार्यक्रमों का ऐलान करते समय चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया को लेकर नए प्रावधान घोषित किए हैं।

चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को सोशल मीडिया पर खर्च की गई रकम का पूरा हिसाब देना होगा। इससे पहले सिर्फ अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिए जाने वाले विज्ञापनों का ब्योरा देना पड़ता था। चुनाव आयोग के मुताबिक सोशल मीडिया पर खर्च की गई रकम को भी उम्मीदवारों  को अपने सोशल मीडिया एकाउंट की जानकारी भी देनी होगी। सोशल मीडिया का प्रचार करने से पहले भी राजनीतिक पार्टियों को इजाजत लेनी होगी। सोशल मीडिया पर प्रचार का खर्च भी चुनाव खर्च में जुड़ेगा। सोशल मीडिया पर जारी सामग्री पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग एक कमेटी का गठन करने जा रहा है। चुनाव आयोग फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब पर राजनीतिक विज्ञापन की जानकारी रखेगा। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के मुताबिक सभी उम्मीदवारों को अपना नामांकन दाखिल करते समय अपने सोशल मीडिया अकाउंट का ब्यौरा चुनाव आयोग को सौंपना होगा। 

चुनाव आयोग ने हाल ही में सुरक्षा कर्मियों की तस्वीरों को प्रचार सामग्री में इस्तेमाल न करने की हिदायत दी। यदि किसी प्रत्याशी से जुड़े समाचार विभिन्न समाचार पत्रों चैनलों में एक से प्रकाशित होते हैं तो उसे पेड न्यूज माना जाएगा। पेड न्यूज पाए जाने पर उसकी राशि उम्मीदवार के चुनाव खर्च में जोड़ दी जाएगी। भारतीय जनता पार्टी अगले हफ्ते एंड्रॉयड, गूगल प्ले स्टोर और ब्लैकबेरी पर करीब 10 मोबाइल ऐप लेकर आ रही है। यही नहीं भाजपा की ओर से उम्मीदवारों को सोशल मीडिया पर रोजाना कम से कम एक घंटा बिताने की सलाह भी दी गई है। सोशल मीडिया के बढ़ते असर से कांग्रेस भी अछूती नहीं है। राहुल गांधी के बाद जल्द ही सोनिया गांधी और जयराम रमेश जैसे नेता गूगल पर ‘हैगआउट’ करते नजर आएंगे। साथ ही पार्टी फेसबुक और यूट्यूब पर भी अपना एजेंडा प्रचारित कर रही है।

आमतौर पर एक मोबाइल ऐप को डेवलप करने में 20 हजार से 20 लाख रुपए तक का खर्चा आता है। सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक पार्टियों की नजर खासतौर पर 18 से 23 साल के ढ़ाई करोड़ से ज्यादा नौजवानों पर है, जो लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट डालेंगे। फेसबुक के आंकड़ों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ फरवरी में ‘भारत के मन की बात’ नाम के पेज के जरिए अपने प्रचार के लिए सोशल मीडिया साइट को 1.1 करोड़ रुपए का भुगतान किया।

इसके अलावा ‘नेशन विद नमो’ पेज ने भी 60 लाख रुपए से ज्यादा रकम विज्ञापनों पर खर्च की। फरवरी महीने में फेसबुक विज्ञापनों पर भाजपा के सहयोगी दलों का खर्चा मिला दिया जाए तो आंकड़ा 2.37 करोड़ रुपए पहुंच गया। इसके बाद सबसे ज्यादा खर्च करने वालों में ओडीशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक सबसे ऊपर है। उन्होंने 32 विज्ञापनों पर फरवरी महीने में 8 लाख 62 हजार 981 रुपए खर्च किए। 

कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस दौरान विज्ञापनों पर लगभग 30 लाख रुपए खर्च किए। यहां यह बता दें कि गूगल सभी राजनीतिक दलों और चुनाव प्रत्याशियों के ऑनलाइन प्रचार का लेखा-जोखा रखेगा और इन प्रचारों पर होने वाले खर्च समेत पूरा ब्योरा चुनाव आयोग को उपलब्ध कराएगा। गूगल के प्रतिनिधि ने कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग के अधिकारियों से मुलाकात की। यह तय हुआ कि गूगल इसके लिए प्री-सर्टिफिकेशन की व्यवस्था करेगा।

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