निजी क्षेत्र में बढ़ी पेंशन की खुली राह

Samachar Jagat | Tuesday, 09 Apr 2019 04:39:57 PM
Open pensions of private sector increased

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संगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद राहत की सांस ली है, जिसमें उसने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन केरल हाईकोर्ट के फैसले के विरुद्ध दी याचिका को खारिज किया है। दरअसल, केरल हाईकोर्ट ने सेवानिवृत कर्मचारियों को पूरे वेतन के हिसाब से पेंशन देने के आदेश दिए थे, जबकि भविष्य निधि संगठन द्वारा 15 हजार रुपए के मूल वेतन की सीमा के आधार पर पेंशन का निर्धारण किया जाता रहा है। दरअसल ईपीएफओ की नीतियों में पारदर्शिता का अभाव नजर आता रहा है, जो कर्मचारियों के अंतिम वेतन के हिसाब से पेंशन देने की राह में अवरोध पैदा करती रही है। 

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बार-बार उसने नियमों में बदलाव करके आंकड़ों की बाजीगरी से राहत को बाधित किया। पूर्व में भी सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक क्षेत्र के सेवानिवृत कर्मचारियों के बढ़ी पेंशन देने के आदेश दे चुका है जिसकी ईपीएफओ ने अनदेखी की। दरअसल, निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की पेंशन इतनी कम है कि कर्मचारियों को लोगों को इसके बारे में बताने में शर्म महसूस होती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद करोड़ों कर्मचारियों में बुढ़ापे में सुरक्षा की आस जगी है। एक बात यह भी है कि कहीं न कहीं सरकारों की तरफ से भी इस दिशा में ईमानदार कोशिश नहीं हुई, जिससे करोड़ों कर्मचारी सेवानिवृत के बाद चिंता में डूब जाते हैं। 

देश में नई आर्थिक नीतियों ने कर्मचारियों के भविष्य को लेकर ज्यादा आशंकित किया। सरकारों ने भी सामाजिक सुरक्षा और लोक कल्याण दायित्वों की अनदेखी की है। सरकार वर्ष 1995 में संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए कर्मचारी पेंशन योजना शुरू की थी, जिसमें कर्मचारी के मूल वेतन का 8.33 फीसदी भाग जमा होता था। 

कालांतर में इसे 6500 का 8.33 फीसदी किया। फिर विकल्प दिया गया कि कर्मचारी इच्छानुकूल अधिक अंश पेंशन कोष में जमा कर सकता है। इसमें फिर ईपीएफओ ने बदलाव करते हुए 15 हजार का 8.33 फीसदी डालने का नियम बनाया। फिर विकल्प दिया गया कि जो कर्मचारी अपने पूरे वेतन के अनुरूप पेंशन चाहते हैं, उनके 5 साल के वेतन के औसत के बराबर पेंशन निर्धारित की जाए। 

जिसे खारिज कर केरल हाईकोर्ट ने एक साल के वेतन को पेंशन निर्धारण का आधार बनाने के निर्देश दिए, जिसके खिलाफ ईपीएफओ सुप्रीम कोर्ट गया था, मगर शीर्ष अदालत ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। निसंदेह अब यदि इस मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर करने की पहल सरकार करे तो सरकारी कर्मचारियों व निजी कर्मचारियों की पेंशन का जमीन आसमान का फर्क दूर हो सकता है। 

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