ईवीएम पर विपक्ष फिर हमलावर

Samachar Jagat | Friday, 19 Apr 2019 04:39:20 PM
Opposition again on the EVM

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद विपक्ष एक बार फिर ईवीएम को लेकर हमलावर हो गया है। बीते रविवार को 21 पार्टियों ने नई दिल्ली में लोकतंत्र बचाओं बैनर के तले प्रेस कांफे्रंस कर ईवीएम को लेकर गंभीर आरोप लगाए और मामले को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की घोषणा की। टीडीपी अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने कहा कि 21 राजनीतिक दल 50 फीसदी वीवीपैट पर्चियों का मिलान ईवीएम से कराए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना था कि शनिवार वह मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मिले थे और ईवीएम में गड़बड़ी का मामला उठाया था। कांगे्रस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि ईवीएम से निकली पर्ची को देखने का समय बहुत कम है। इसे बढ़ाया जाना चाहिए। 

उनका यह भी कहना था चुनाव आयोग का कहना है कि अगर वीवीपैट से निकली पर्चियां गिनते हैं तो इसमें 5 दिन से अधिक का समय लग सकता है। सिंघवी का यह भी कहना था कि हमने आयोग से कहा है कि वह अपनी टीम बढ़ाए क्योंकि इस काम में इतना समय नहीं लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि ईवीएम में गड़बड़ी के मुद्दे के निपटने के लिए आयोग पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है। प्रेस कांफे्रंस में मौजूद ‘आप’ के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इन मशीनों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वोट सिर्फ भाजपा को जाए। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा क्यों होता है कि जिन मशीनों में खराबी की शिकायत आती है, उसमें वोट भाजपा को ही क्यों जाते है। केजरीवाल का कहना था कि वह खुद इंजीनियर है। इन मशीनों में कुछ गड़बड़ जरूर है। चंद्रबाबू नायडू ने तेलंगाना में 25 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। 

आयोग को इस पर ध्यान देना चाहिए। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि हमें मतदाताओं पर पूरा भरोसा है पर ईवीएम पर नहीं है। उनका कहना था कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेंगे। यहां यह बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही दिए अपने फैसले में माना कि 50 फीसदी वीवीपैट पर्चियों का मिलान करना मुश्किल है। लेकिन प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के 5 बूथों के मतों का पार्चियों का मिलान हो। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 1984 में सुप्रीम कोर्ट ने कानून में तकनीकी खामी के कारण ईवीएम के खिलाफ फैसला दिया। 1988 में जनप्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन कर इस खामी को दूर किया गया। भारत संसार का सबसे बड़ा संसदीय प्रजातंत्र है और इसमें चुनाव की निष्पक्षता व नियमितता सर्वोच्च रहना चाहिए।

बिना इसके इसे प्रजातंत्र कहा ही नहीं जा सकता और चुनी हुई संस्थाओं के गठन से लोगों का विश्वास ही उठ जाएगा। किसी भी प्रजातंत्र के लिए इससे ज्यादा घातक और कोई बात ही नहीं हो सकती कि चुनाव ही सही साबित न हो। ऐसे माहौल में तो प्रजातंत्र का ही खात्मा हो जाएगा। इन दिनों भारत में पिछले 2014 के लोकसभा चुनावों में हार गए राजनैतिक दलों ने उनकी हार को जनादेश न मानते हुए यह बहाना कर उनकी शर्मिंदगी छिपाई की ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करके उन्हें हराया गया है। भारत के चुनावों में ईवीएम मशीनों का चलन भारत के ख्याति प्राप्त मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने लागू किया था। शेषन से पहले भारत के चुनावों पर धनबल और बाहुबल पूरी तरह छा गया था। यह व्यवस्था थी कि उम्मीदवार के दोस्त उसके चुनाव पर कितना भी खर्च कर सकते थे उसे उम्मीदवार का खर्च करना नहीं माना जाता। इसके साथ ही भारत के चुनावों पर रुपया हावी और निर्णायक हो गया। इसके अलावा पोलिंग बूथ पर कब्जा करना एक प्रचलित अपराध माना जाने लगा। 

शेषन ने दोस्तों द्वारा खर्च की सीमा मात्र 10 रुपए कर दी और यह प्रथा अपने आप में खत्म हो गई। जहां भी बूथों पर कब्जे हुए उस चुनाव क्षेत्र का रिजल्ट ही घोषित नहीं किया गया जब तक वहां फिर से मतदान नहीं हुआ। कई वर्षों पूर्व भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पहली बार यह मामला उठाया था कि ईवीएम, विश्वसनीय नहीं है। इन्हें चुनाव प्रक्रिया से हटाकर फिर से पेपर बेलेट सिस्टम ही बना रहना चाहिए। उस वक्त आडवाणी की यह बात आमी गई हो गई, लेकिन 2014 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाजवादी पार्टी 80 सीटों में सभी सीटों पर जीरो पर आउट हो गई। उन्होंने अपनी पार्टी की हार को इस तरह छिपाया कि लोगों ने तो जिताया था पर मशीनों की छेड़छाड़ से उन्हें हटा दिया गया। मशीनों का मामला पूरी तौर पर तकनीकी और चुनाव आयोग का मामला है। इसमें केंद्र या किसी राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है। सभी चुनाव आयुक्तों ने हमेशा से यह कहा कि मशीनों में छेड़छाड़ संभव ही नहीं है और चुनाव निष्पक्ष और ठीक हुए है। लेकिन 2014 से यह तरीका बन गया है जो भी पार्टी या उम्मीदवार हारेगा वह यही कहेगा कि वह जीता हुआ था, पर मशीनों में गड़बड़ी ने हरा दिया। 

हाल में मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में विधानसभाओं के चुनावों में केंद्र में मौजूद और राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हार गई और कांग्रेस सत्ता में आ गई। इन चुनावों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा था कि यदि मशीनों में गड़बड़ी संभव होती तो वहां भारतीय जनता पार्टी हारती ही नहीं। एक बार चुनाव आयोग ने मशीनों को पार्टियों के निरीक्षण व प्रमाण करने के लिए रख दिया कि वे यह प्रमाणित करके बताए कि मशीनों में गड़बड़ी कैसे की जा सकती है? यह चुनाव आयोग की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक सही तरीका था, जिसमें मशीनों के बारे में सब चीज साफ हो सके। लेकिन आरोप लगाने वाली पार्टियों ने बहुत ही गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाया और प्रमाणित करने आगे नहीं आए। अब जब लोकसभा चुनाव चल रहे हैं और पहले चरण का मतदान हो गया है, तब फिर 21 विपक्षी दलों ने यह मुद्दा उठाया है और प्रेस कांफे्रंस करके कहा कि मशीनों में गड़बड़ी होती है और इस सिस्टम को खत्म किया जाए। 

इन दलों ने यह कहा कि वे फिर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। इस बार यह बहुत ही उचित होगा कि यदि सुप्रीम कोर्ट यह तय करे कि आरोप लगाने वाली पार्टी सुप्रीम कोर्ट के सामने यह करके बताए कि ईवीएम मशीनों में कैसे गड़बड़ी की जा सकती है। इस मामले को राजनैतिक स्तर पर पार्टियों, सरकार और चुनाव आयोग के बीच नहीं सुलझाया जा सकता। इसे तकनीकी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ही हमेशा के लिए तय कर सकता है। अन्यथा यह स्थाई बहाना हो जाएगा कि जो भी हारेगा वह यही कहेगा कि मशीन में गड़बड़ी करके उसे हराया गया।



 

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