चुनाव बाद की तैयारी में जुटे पक्ष-विपक्ष के नेता

Samachar Jagat | Monday, 20 May 2019 03:16:57 PM
Opposition Leaders in the post-election preparation

17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के सातों चरण का मतदान रविवार को समाप्त हो गया। इस प्रकार लोकसभा के मतदान का कार्य पूरा हो गया है और अब 23 मई को मतगणना के बाद चुनाव नतीजे घोषित किए जाएंगे। चुनाव की कमी या खासियत यह है कि इस बार किसी की लहर नहीं है। जनता का रुझान भी स्पष्ट नहीं है। किसी दल या गठबंधन की जीत को लेकर कोई दावा करना मुश्किल है। इसलिए कई नेता किसी चुनाव पूर्व मोर्चे को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति के लिए अभी से तैयारी करने लगे हैं। उन्हें लगता है कि नतीजों से पहले कुछ अंडर स्टैडिंग, बनाली जाए ताकि बाद आसानी हो।

 ऐसा सोचने वालों में वे क्षेत्रीय नेता सबसे आगे हैं, जो किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैै। चुनाव की तारीखों का हिस्सा नहीं है। चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले से ही वे एक तीसरा विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे हैं। जैसे, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने बीते सप्ताह सोमवार को डीएमके प्रमुख एम के स्टालिन से मुलाकात की। कुछ समय पहले वे केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन से भी मिले थे। कोलकाता में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से राव ने पिछले साल बात की थी। उनकी पूरी कोशिश है कि एक गैर भाजपा, गैर कांग्रेस मोर्चा बने और वही केंद्र में सत्ता संभाले। लेकिन उन्हें भी इस बात का पूरा अंदाजा है कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती। 

अब तक तीसरे मोर्चे की जो भी सरकारें बनी है। उन्हें कांग्रेस का और उससे पहले भाजपा और वामपंथी दलों का समर्थन हासिल रहा है। हालांकि वे अल्पजीवी ही सिद्ध हुई है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो उसने खुद को भाजपा के विकल्प के रूप में पेश किया है और कई क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता किया है। इस अलिखित शर्त के साथ की बहुमत मिलने पर राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री बनेंगे इन दलों के नेताओं जैसे डीएमके स्टालिन और आरजेडी के तेजस्वी यादव ने समय-समय पर इसकी पुष्टि भी की है। ऐसे में कांग्रेस से तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की अपेक्षा करना ठीक नहीं है। 

पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कह दिया है कि जो पार्टियां कांग्रेस के साथ नहीं है। वे उसके समर्थन की अपेक्षा न करे। कांग्रेस को यह उम्मीद है कि यूपीए के बहुमत से थोड़ी दूर रह जाने पर क्षेत्रीय दल उसे अपना समर्थन दे देंगे। उधर भाजपा ने भी संकेत दिया है कि अगर सीटें कम पड़ी तो वह साथियों के सहयोग से सरकार बना लेंगी। साथियों से उनका मतलब ऐसे दलों से है, जो एनडीए में नहीं है। यानी क्षेत्रीय दलों का समर्थन दोनों गठबंधनों के राडार पर है। शायद इसीलिए केंद्र सरकार ने इधर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से संबंध सुधारने की कोशिश की है। 

भाजपा को लगता है कि जरूरत पड़ने पर नवीन पटनायक, के. चंद्रशेखर राव और जगमोहन रेड्डी उसका साथ दे सकते है। सच यह है कि ये तीनों नेता संख्या बल देखकर ही कोई निर्णय करेंगे क्योंकि केंद्र से नजदीकी इन्हें क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत बनाएगी। इधर लोकसभा के चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की संभावना के मद्देनजर यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गैर भाजपा पार्टियों का गठबंधन बनाने की दिशा में सक्रिय हो गई है। उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, गुलाब नबी आजाद और अहमद पटेल को विपक्ष के नेताओं से वार्ता करने को कहा है।



 

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