अविश्वास प्रस्ताव और उपसभापति चुनाव में पक्ष-विपक्ष की मोर्चा बंदी

Samachar Jagat | Tuesday, 14 Aug 2018 01:41:02 PM
Opposition's opposition to the motion of no confidence and sub-election

भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में जदयू सांसद हरिवंश पर दांव लगाकर लोकसभा चुनाव से पहले के राजनीतिक समीकरण भी साधे हैं। राज्यसभा में उपसभापति चुनाव में कांग्रेस से सिधी लड़ाई में जीत हासिल कर भाजपा ने भविष्य की रणनीति के भी संदेश दिए हैं। पाटी्र ने एनडीए के अपने कुनबे को एकजुट रखने के साथ भविष्य के दोस्त भी तलाशे हैं, जो लोकसभा चुनाव में और उसके बाद की स्थिति में मददगार होंगे।

इधर कांग्रेस के लिए भी केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष के लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बाद अब राज्यसभा के उपसभापति पद के चुनाव में भी विपक्षी एकता की झकल दिखी है। यह अलग बात है कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर भी हार गया था और उपसभापति के चुनाव में भी हार गया। पर इन दोनों घटनाओं से पक्ष और विपक्ष के बीच लड़ाई की रेखा खींच गई है। साथ ही पार्टियों की पहचान भी हो गई है कि रेखा के किस ओर कौन खड़ा है। जिनको अंतत: भाजपा के साथ जाना है उनकी पहचान हो गई है। यह तय हो गया है कि तेलंगाना में सरकार चला रही तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को भाजपा के साथ जाना है। वाईएसआर कांग्रेस अंतत: भाजपा के साथ जाएगी। शिवसेना को भी अंत पंत भाजपा के साथ ही रहना है। 

बीजू जनता दल ने भी साफ संकेत कर दिया है कि वह भाजपा से दूर नहीं है, भले ही राज्य में कैसी भी लड़ाई चल रही हो। हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन लोगों ने अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति के चुनाव में भाजपा का विरोध किया है, वे सब सेकुलर राजनीति के खिलाड़ी है और बाद में किसी मुकाम पर भाजपा से नहीं जुड़ेंगे। पर कम से कम लोकसभा चुनाव से पहले उनका मोर्चा स्पष्ट है। वे भाजपा से लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में विपक्ष के साथ रहेंगे। इधर भाजपा ने उप सभापति के चुनाव में बिहार का संदेश देने के साथ जदयू के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। पिछड़े, दलित व आदिवासी समुदाय के लिए जहां संवैधानिक व कानूनी मजबूती देने के साथ अगड़े वर्ग को भी इससे एक संदेश जाएगा। उप सभापति चुने गए वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश की पहचान ऐसे व्यक्ति की रही है, जो किसी से समझौता नहीं करते हैं। हालांकि, राजनीति में आने से पहले भी वे राजनेताओं के करीबी रहे हैं और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ भी रह हैं। नीतीश के साथ जदयू में आकर राजनीति शुरू करने के बाद भी वे किसी के करीब या दूर नहीं दिखे। 

अपनी छवि के कारण ही भाजपा व जदयू ने उनका नाम तय किया। हरिवंश के अन्य दलों के नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं और सदन के संचालन में उनका लाभ भी मिलेगा। यहां यह बता दें कि राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश के बाद बिहार ज्यादा महत्वपूर्ण है, जहां उसे विपक्षी गठबंधन से चुनौती मिल सकती है। बिहार में जदयू के साथ आने के बाद भाजपा रिश्तों में मजबूती व राज्य के समीकरणों के लिए उप सभापति पद जदयू को देने का फैसला किया है। उच्च सदन के अंकगणित में बीजद की भूमिका अहम थी। इसलिए उसको साधने की रणनीति पर काम किया गया, जिसमें जदयू ही सबसे सही पसंद थी। दूसरी ओर आमतौर पर यह कहा जा रहा है कि अगर विपक्ष एकजुट होता तो राज्यसभा के उप सभापति का चुनाव विपक्षी उम्मीदवार जीतता पर यह एक मिथक है। विपक्ष की कई पार्टियां ऐसी है, जिनका रुझान शुरू में भाजपा के प्रति रहा है और अहम मौकों पर वे भाजपा का साथ देते रहे हैं। इनमें ज्यादातर ऐसी पार्टियां है, जो पहले भाजपा के साथ रहे चुकी है और कुछ ऐसी भी पार्टियां है, जो भविष्य में भाजपा के साथ जाना चाहती है। 

जो पार्टियां अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति चुनाव में विपक्ष के साथ नहीं आई, असल में विपक्षी खेमा पहले से उनको अपने साथ नहीं मान रहा था। जिनके साथ रहने का पहले से भरोसा था वे साथ रहे। इधर भाजपा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपनी सहयोगी शिवसेना व विपक्ष की बीजद का रवैया देख चुकी थी, जिन्होंने सदन से ही दूरी बना ली थी। ऐसे में एनडीए और विपक्ष के कांग्रेस विरोधी किसी भी दल के मतदान से दूर रहने से भी समीकरण सत्तापक्ष के विपरीत जाते। सूत्रों के अनुसार रणनीति के तहत ही भाजपा नेतृत्व में जदयू के साथ बात की और उसके उम्मीदवार को उतारने का फैसला किया गया। उम्मीदवार कौन हो, इसे मसले पर भी ऐसा चेहरा लाया गया जो निर्विवाद हो। राज्य सभा के अंकगणित में सरकार अल्पमत में है और उसके लिए विपक्ष के साझा उम्मीदवार के मुकाबले जीत बेहद कठिन है। लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए हैं। कई दल भाजपा व कांग्रेस से समान दूरी बनाकर चल रहे हैं।

 ऐसे में भाजपा ने गैर कांग्रेसी यूपीए दलों को साधने के लिए अपने उम्मीदवार के बजाए ऐसे उम्मीदवार पर दांव लगाया जिसे बाहर से भी समर्थन मिल सके। सूत्रों के अनुसार नीतीश ने तो हरिवंश के लिए बीजद नेता नवीन पटनायक को तैयार किया है। हरिवंश के भी नवीन पटनायक से निजी रिश्ते इसमें काम आए। दूसरी ओर कांग्रेस के साथ वामपंथी पार्टियां खड़ी रही तो तृणमूल कांग्रेस भी खड़ी रही। सपा, बसपा राजद यानी उत्तर भारत में 120 लोकसभा सीटों वाले दो राज्यों के मजबूत क्षत्रप विपक्ष के साथ रहे। दक्षिण के तीन सबसे बड़े क्षत्रप चन्द्रबाबू नायडू, एम के स्टालिन और एचडी देवगोडा की पार्टी विपक्षी खेमे के साथ जुड़ी रही। जो अलग रहे वे अगले लोकसभा चुनाव की विपक्षी रणनीति में बहुत अहम नहीं दिख रहे हैं। अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति का चुनाव जीतने से भाजपा और एनडीए का मूड बम बम है। भाजपा लगातार जीत पर खुश है कि विपक्ष एकजुट नहीं हो सका। पर असल में इन दोनों मामलों में जो पार्टियां विपक्ष के साथ नहीं आई, उनका रुख विपक्ष के सामने पहले से स्पष्ट था। विपक्षी खेमा उनको अपने साथ मानकर नहीं चल रहा है। दूसरी तरफ उच्च सदन में अपनी ताकत से सरकार को डराने वाली विपक्ष की एकजुटता को भी भाजपा ने ध्वस्त कर दिया है।

भाजपा ने साफ कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह उच्च सदन में भी वह जीत का समीकरण बना सकती है। राज्यसभा में उप सभापति पद को भाजपा व कांग्रेस में वर्चस्व व प्रतिष्ठा की जंग में अंकगणित पर राजनीतिक गणित भारी पड़ा है। विपक्षी रणनीतिकारों को लग रहा है कि अगर इन पार्टियों ने भाजपा का विरोध किया है तो ठीक है और नहीं किया तब भी ठीक है। इसीलिए कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे नेताओं ने इनके ऊपर ज्यादा भरोसा नहीं किया और न इनसे बात की। संसद के मानसून सत्र में हुई दोनों घटनाओं ने विपक्षी एकता को मजबूत किया है तो साथ ही विपक्षी एकता की फाल्ट लाइन भी जाहिर कर दी है। अब विपक्षी नेता मान रहे हैं कि उनको अगले लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने में इससे आसानी होगी। दूसरी तरफ भाजपा ने एनडीए को एक रखने के साथ भविष्ठ के दोस्त भी तलाशे हैं। लोकसभा चुनाव के लिए तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ तालमेल की संभावना बढ़ी है।



 

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