पद्मश्री संत नारायणदास जी महाराज ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिए मानव सेवा में समर्पित थे

Samachar Jagat | Monday, 11 Feb 2019 05:45:44 PM
Padmashree Sant Narayan Das Ji Maharaj was devoted to human service to keep God happy.

मैं नहीं कह सकता कि पद्मश्री संत प्रवर नारायण दासजी महाराज (त्रिवेणी धाम) की भगवान सीतारामजी से क्या बातचीत होती थी?
किन्तु, उन्होंने मानव जीवन की हर समस्या का समाधान ‘‘सीताराम’’ में बतलाया था। हमने उनसे बार-बार पूछा था कि ‘‘क्या आपका भगवान से साक्षात्कार हुआ है’’ उन्होंने कभी भी ‘‘हां’’  नहीं कहा, अपितु यही अनुभूति प्रगट की ‘‘सीताराम को अपने में उतार लो और पुरुषार्थ (निज कर्म) करते चलो, सब ठीक हो जाएगा।’’

उन्होंने कहा मुझे तो ‘‘सीताराम’’ बहुत प्यारे लगते हैं, क्योंकि वो मेरी हर इच्छा पूरी कर देते हैं। उसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ‘‘सीताराम’’ का प्राकट्य भारत भूमि पर हुआ, राधेश्याम का प्राकट्य भी भारत भूमि पर हुआ, अर्थात् जो भी 24 अवतार हुए वे सब भारत भू पर ही प्रकट हुए। देखिए! यह कैसा संयोग व विधि विधान है कि मेरे को त्रिवेणी (भारत) में ही गुरुवर ने अपने चरणों में शरण दे दी और गुरु दीक्षा (सीताराम) प्रदान कर दी। बस! मैं तो गुरुवर की वाणी (दीक्षा) को धारण करके ही मनुष्यों से मिलता हूं, गौमाताओं से मिलता हूं, संत महात्माओं से मिलता हूं, पक्षियों से मिलता हूं, वनस्पतियों का रसपान करता हूं। मैं तो मानव जीवन का सत्संग यही मानता हूं। मेरे मित्रों एवं पे्रमियों ने ‘सत्संग मण्डल’ ही स्थापित कर लिए। मुझे भी खुशी हुई कि गुरु दीक्षा वाणी (मंत्र) ‘‘सीताराम’’ बहुजन समुदाय के कंठों में गूंजने लगा।

महाराजश्री ने अपनी भावना अमृत का रसपान कराने के लिए दिन रात के 24 घंटे खुले ही रखे। जब भी कोई आशार्थी और आज्ञार्थी उनसे मिलने पहुंचता वे उससे अवश्य मिल पाते थे और उसे सान्त्वना दे पाते थे, उसकी पीड़ा में हम दर्द बन पाते थे।

महाराजश्री ने एक बार कहा था और बतलाया था ‘‘मनुष्य को ही मनुष्य काम आएगा।’’ ईश्वर ने जिन महानुभावों को उनके पूर्वजन्म का पुण्य इस जन्म में प्रदान कर सम्पन्न बनाया है, उन्हें चाहिए कि वे अपने पीडि़त व दु:खी भाइयों को देकर उनकी सहायता करें। महाराजश्री का तथाकथित धनपतियों के सिर पर हाथ इसलिए होता था कि वे हजारों विपन्न व्यक्तियों को पीड़ाओं से मुक्त करें, भूखे को भोजन मिले, प्यासे को पानी मिले, निर्वासित को आश्रय मिले, विरक्त को मंदिर या संत आश्रम मिले, विद्यार्थी को पढ़ने के लिए पाठशाला मिले, गौ माताओं को चारा मिले, खेतों को वर्षा मिले, यात्रियों को वाहन मिले, सत्संगियों को भजनावली मिले, बेकार हाथों को काम मिले, बालकों को दुग्ध मिले, पक्षियों को चुग्गा मिले, ग्रामवासियों को शुद्ध हवा मिले, शहरवासियों को दवाइयां मिले, विदेशी पर्यटकों को छप्पन भोग के दर्शन मिले।

महाराजश्री का कथ्य था कि जब किसी मंदिर या देवालय में मूर्ति स्थापित कर दी जाती है तो वह मूर्ति शिल्प नहीं रहती अपितु प्राण-प्रतिष्ठा प्राप्त भगवत रूप बन जाती है। उसमें प्राण सृजित हो जाते है। वह दर्शकों को लुभाती ही नहीं है अपितु बातचीत भी करती है। यदि साधक का पक्का भरोसा हो तो वही भगवत स्वरूप मूर्ति साधक की ईच्छानुसार पोशाक धारण कर लेती है, बाल भोग ग्रहण कर लेती है, श्रृंगार धारण कर रासरंग भी करने लग जाती है। महाराजश्री ने बतलाया कि भगवान तो भक्त के अधीन हैं क्योंकि भगवान ने स्वयं कहा है ‘‘भगत मेरा मुकुट मणि।’’ यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान नेत्रों से छप्पन भोग ग्रहण करते हैं। स्वाद का प्रकटीकरण भक्तों की जिव्हा से करते हैं। यह परम विज्ञान (ईश्वरीय ज्ञान) है। वर्तमान में तो विज्ञान व टेक्नोलॉजी ने यह सिद्ध कर दिया है अमेरिका में मरीज का ऑपरेशन (थियेटर में) किया जाता है और भारत में टी.वी. स्क्रीन पर देखकर भारत का डॉक्टर भी तदानुकूल ऑपरेशन कर सफल हो जाता है।

महाराजश्री ने कहा कि इसका पक्का प्रमाण देखने को तब मिला जब संत तुलसीदासजी ने वृंदावन में बिहारीजी के दर्शन में आराध्य सीताराम को धनुष बाण धारण करने पर मस्तक नवाया। भरोसा अटूट रहने पर भक्त को भगवान दर्शन दे ही दिया करते हैं। महाराजश्री के चेहरे पर मुस्कान बिखरती थी और ललाट पर चन्द्रमा समान चमक दमकती थी। महाराजश्री में संवेदनशीलता और दयाभाव कूट कूटकर भरा हुआ था। एक बार वैद्य मदन गोपाल जी शर्मा के यहां सत्संग महोत्सव में महाराजश्री पधारे थे। नीचे तम्बू लगाया गया था एवं भगवान सीताराम की झांकी सजायी गई थी। मैं वहां पहुंचा तो मुझे उनके चरण छूने के  लिए उनके शिष्यों ने वहां तक मुझे पहुंचने नहीं दिया। सत्संग पूर्ण होने पर महाराजश्री छत पर प्रसादी के लिए चले गए। मेरी पुष्प माला मेरे हाथ में ही बनी रही। मुझे काफी उत्कंठा थी कि मैं महाराजश्री को पुष्प माला धारण करा सकूं। 

फलत: मैं भी जीने से छत पर चला गया, वहां पर महाराज जी की पंगत लग गई थी और प्रसादी पुरसगारी चालू हो रही थी। जब मैं छत पर बैठे महाराजश्री की ओर बढ़ने लगा तो सेवकों ने ऊंची आवाज में टोकना शुरू कर दिया, महाराजश्री ने मुझे देखकर अपने पास आने की इजाजत दे दी और मैं उनके नजदीक पहुंचकर उन्हें पुष्प माला धारण करा दी। महाराजश्री ने अपने सेवकों से कहा कि भाई इनका भाव इतना ऊंचा था कि जब इन्हें नीचे नहीं मौका मिला तो ये ऊपर तक पहुंच पाए। इनको भला बूरा न कहकर धन्यवाद देना चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि महाराजश्री में कितनी दयालुता, नमनीयता, समानता, समदर्शिता, पूर्वानुमान व पुष्पों व पुष्प बंगलो के प्रति अतुल प्यार था। जो भी व्यक्ति परोपकार की ओर मुडता था, महाराजश्री उसे हृदय से आशीष देते थे और उसका कारज सिद्ध करते थे। एक बार ‘‘बह्मपीठ संदेश’’ पत्रिका के मानद सम्पादक श्रीरामस्वरूप जी मिश्रा बुखार से पीडि़त हो गए और दस-पन्द्रह दिन के लिए त्रिवेणी धाम से आकर जयपुर में घर पर ही रहे। जब वापस धाम गए तो महाराजश्री ने कहा ‘मिश्राजी आप त्रिवेणी छोडक़र गए ही क्यों, यहां रहते तो इतने दिन ठीक होने में नहीं लगते?’ इस तरह महाराज की जिन निष्काम शिष्यों पर कृपा दृष्टि होती थी, वे खुशहाल ही रह पाते थे। महाराजश्री उनका योगक्षेम करते थे। वस्तुत: महाराजश्री को यह अच्छी तरह पहचान थी कि कौन शिष्य निर्मल है और कौन शिष्य मलिन है। किन्तु वे व्यवहार में अंतर नहीं आने देते थे। जैसे सुदामा को बिना आभास कराए मित्रवत कृष्ण ने सखा सुदामा की सुदामापुरी को स्वर्णमयी बना दिया और सुदामाजी को सपत्नी धनाढ्य व सम्पन्न बना दिया।

महाराजश्री की पहली पसंद जहां ‘भगवान सीताराम’ थी, वहीं समानान्तर पसंद मनुष्य की त्याग भावना और गौ-सेवा भावना थी। महाराजश्री की श्वेत धोती, गुलाबी रंग की सुहाफी, मोर पंख की वायु करधनी में कोई जेब (पाकिट) नहीं थी, किन्तु करोड़ों रुपयों का दान धर्मादा कराने में अद्भुत सफलता प्राप्त थी। जब इन्कम टैक्स वालों ने त्रिवेणीधाम पर पहुंचकर उनकी पूछताछ की तो महाराजश्री ने कहा कि मेरे पास सब कुछ है और वह है ‘सीताराम’ और कुछ नहीं है और वह है ‘द्र्रव्य’ अत: न तो मेरा कोई बैंक अकाउंट है और न कोई केश बॉक्स यहां पर है। वस्तुत: ऐसा ही प्रमाणित हुआ। 

इन्कम टैक्स अधिकारियों की महाराजश्री के पास एक जेब भी नहीं मिली। कारण यह है कि जो कुछ परोपकार में धन व्यय होता था वह भक्तजनों व दानदाताओं द्वारा स्वयं किया जाता था। महाराजश्री का तो आदेश व स्वीकृति होती थी। यही वजह है कि महाराजश्री ने आजीवन ‘सादा जीवन व त्यागपूर्ण कर्म’ का ही आदर्श उपस्थित किया तथा मानव सेवा और गौसेवा में ही स्वयं को समर्पित कर दिखलाया। भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार ने एक विशेषताओं के फलस्वरूप संत शिरोमणि नारायण दास जी महाराज को 2018 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया।
(ये लेखक के निजी विचार है) 
 



 

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