पाक को अमेरिकी फटकार चीन को गुजरी नागवार

Samachar Jagat | Sunday, 14 Jan 2018 11:53:32 AM
Pak bombshell to China

पाक को अमेरिकी लताड़ जहां चीन को नागवार गुजरी वहीं गत डेढ़ दशक से आतंकवाद के खिलाफ जंग में अमेरिका का सहयोगी होने का दंभ भरा रहा पाकिस्तान अमेरिकी मदद रोकने से बौखला गया है। पाकिस्तान ने दावा किया है कि अमेरिका के साथ उसका कोई गठबंधन है ही नहीं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक अमेरिकी अखबार को साक्षात्कार में कहा अमेरिका के साथ हमारा कोई गठबंधन नहीं है। उन्होंने ट्रंप प्रशासन की ओर से आर्थिक मदद रोकने के संदर्भ में कहा कि सहयोगी देश ऐसा व्यवहार नहीं करता है।

 आरिफ ने कहा कि 9/11 को अमेरिका पर आतंकी हमले के जवाब में अफगास्तिान में की गई कार्रवाई में पाकिस्तान की हिस्सेदारी बड़ी गलती थी। इसका खामियाजा पाकिस्तान को भुगतना पड़ा और अफगानिस्तान के आतंकी पाकिस्तान के दुश्मन बन गए। आसिफ ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी नाकामी छिपाने के लिए उनके देश की छवि एक रोने वाले बच्चे की तरह बनाई है। अमेरिकी लताड़ के बाद पाक के समर्थन में आए चीन ने कहा है कि अमेरिका की ओर से पाकिस्तान पर उंगली उठाने और उसे आतंकवाद के साथ जोड़ने का वह विरोध करता है। बीजिंग ने इस पर जोर दिया है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी किसी देश विशेष पर नहीं डाली जा सकती है।

 पाकिस्तान पर अपने देश में मौजूद आतंकवादियों के सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करने को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। चीन के समर्थन के बावजूद अमेरिकी मदद रूक जाने से घबराए पाकिस्तान को कुछ सख्त कदम उठाने पड़े हैं। पाकिस्तान सरकार ने मुंबई हमलों के सरगना हाफिज सईद के संगठनों को चंदा देने पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत में सबसे ज्यादा आतंकी हमले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद ने किए है। हाफिज लश्कर का संस्थापक तो है ही वह जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन जैसे धर्मादा संगठन भी चलाता है और इन संगठनों के सहारे उसने पूरे पाकिस्तान में पैर पसार रखे है। इसलिए दूसरे आतंकी सरगनाओं की तुलना में हाफिज के खिलाफ कार्रवाई करना पाकिस्तान के लिए ज्यादा मुश्किल काम रहा है। अगर अमेरिका का दबाव नहीं होता, तो पाकिस्तान की ताजा कार्रवाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

 नए साल की शुरुआत पर किए अपने एक ट्वीट में ट्रंप ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान ने अमेरिका को झूठ और फरेब के सिवा कुछ नहीं दिया और उसने पिछले पंद्रह वर्षों में तैंतीस अरब डालर की मदद लेने के बावजूद आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराया है। ट्रंप के यह कहने के कोई हफ्ते भर बाद अमेरिका ने सुरक्षा सहायता के तौर पर 1.15 अरब डालर से अधिक की रकम और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति रोक दी। आतंकी संगठनों की अनदेखी करने के पाकिस्तान के रवैए पर अमेरिका चेतावनी देता रहता था, पर अब उसे लगा कि केवल चेतावनी देते रहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यहां यह भी बता दें कि अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्क और अफगान-तालिबान का नकेल न कसने का दोष तो पाकिस्तान पर मढ़ा ही है, उन आतंकी संगठनों पर शिकंजा न कसने के लिए भी पाकिस्तान को धिक्कारा है, जो खासकर भारत को निशाना बनाते रहे हैं। 

लिहाजा ट्रंप प्रशासन की ताजा कार्रवाई भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि भी है। जानकार इस पर सहमत है कि अमेरिका से आने वाली सैन्य मदद रूकने का असर लंबे समय तक सेना की तैयारियों पर भी दिख सकता है। बड़ा सवाल यही है कि आखिर चीन पाकिस्तान की कितनी मदद कर सकता है? लेकिन यह मुमकिन नहीं है कि उससे अमेरिका आर्थिक मदद की पूर्ति हो जाए। पाकिस्तान ने फिलहाल कड़ा रुख अपना रखा है। तो क्या वह अमेरिका से बदला लेने की कोशिश करेगा? क्या वह अफगानिस्तान में अमेरिका को नुकसान पहुंचाएगा? 2011-12 में कई महीनों तक पाकिस्तान ने अफगानिस्तान जाने वाले रास्ते को रोक दिया था, जिससे अमेरिकी सैन्य टूकडि़यों को परेशानी झेलनी पड़ी थी।

ये कदम तब उठाया गया, जब अमरिकी मरीन्स ने अपने गुप्त अभियान में ओसामा बिन लादेन को मार डाला था और पाकिस्तान की चौकियों पर बमबारी की थी, जिसमें 20 पाक सैनिक मारे गए थे। लेकिन अब उस जैसा कदम उठाना पाकिस्तान के लिए आत्मघाती हो सकता है। ट्रंप के दौर में ऐसा करना बेहद जोखिम भरा होगा। फिलहाल अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को असैन्य सहायता जारी है। हालात ज्यादा खराब होने पर अमेरिका इसमें भी कटौती कर सकता है। अब पाकिस्तान को तय करना है कि क्या वह इसके लिए तैयार है?



 

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