पाक सेना के नए प्रमुख जनरल बाजवा से सतर्क रहने की सीख

Samachar Jagat | Wednesday, 30 Nov 2016 04:22:25 PM
पाक सेना के नए प्रमुख जनरल बाजवा से सतर्क रहने की सीख

भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने कहा है कि पाकिस्तानी सेना के नए सेना प्रमुख लेफ्टिनेट जनरल कमर जावेद बाजवा से सतर्क रहने के जरूरत है। बिक्रम सिंह संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन में बाजवा के साथ काम कर चुके हैं। सिंह का कहना है कि हमें बाजवा और उनके दृष्टिकोण के प्रति सतर्क रहने की जरूरत है। बाजवा बेहद प्रफेशनल व्यक्ति है। उनका यह भी कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में तैनाती के दौरान सभी अधिकारी मिलनसार होते हैं। 

वहां विश्व शांति का लक्ष्य रहता है, लेकिन किसी अधिकारी के लिए स्वदेश वापसी के बाद स्थितियां बदल जाती है क्योंकि तब आपके लिए अपने देश का हित सर्वोपरि होता है। उन्होंने कहा है कि भारत को देखो और इंतजार करो की नीति अपनाते हुए बाजवा के प्रति सतर्कता बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं नहीं मानता कि पाक सेना की नीति में कोई बदलाव आएगा। यहां यह बता दें कि पाक लेफ्टिनेट जनरल बाजवा जिन्होंने मंगलवार को पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ की सेवानिवृति के बाद नए पाक सेना प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाला है। 

राहील शरीफ के कार्यकाल के बारे काफी समय से अटकलें थी। उनका कार्यकाल बढ़ाया जाएगा या नहीं, यह चर्चा का विषय था। अब जबकि पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लेफ्टिनेट जनरल कमर जावेद बाजवा को नए सेना प्रमुख के रूप में चुन लिया है और उन्होंने अपना पदभार भी ग्रहण कर लिया है, सभी तरह की चर्चाओं पर विराम लग गया है। यहां यह भी बता दें कि जनरल बाजवा लंबे समय तक भारत की सीमा से जुड़े इलाकों में काम करते रहे हैं और उन्हें सीमा के हालातों के बारे में खास अनुभव है। इसलिए उनसे अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। 

संभवत: इसीलिए हमारे पूर्व सेना प्रमुख बिक्रम सिंह ने उनसे सतर्क रहने की बात कही है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में हालांकि चुनी हुई असैनिक सरकार है, लेकिन देश की नीतियां खासकर विदेश और रक्षा नीति तय करने में सेना की अहम भूमिका मानी जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के इतिहास में देश पर ज्यादातर समय सेना का ही राज रहा है। राहील शरीफ के कार्याकाल के आखिरी महीनों में सेना और सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए। भारत के मामले में राहील शरीफ ने कड़ा रूख अख्तियार किया।

 इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी। पाकिस्तानी मीडिया में उनकी नायक जैसी छवि बनाई गई। यहां तक कि ट्रकों पर राहील शरीफ के फोटो लगे दिखने लगे। कुछ हलकों से ‘राहील शरीफ अब तो आ जाओ’ के नारे लगाए गए। यानी उनसे गुजारिश की गई कि देश की सत्ता वे अपने हाथ में ले लें। ये घटनाएं पाकिस्तान में सेना की अहमियत और वहां की आम मानसिकता को बताती है। वहां इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि देश की रक्षा और विदेश नीति से जुड़े सभी फैसले सेना मुख्यालय में लिए जाते हैं। ऐसा हमेशा से होता आया है। 

जब सत्ता सीधे तौर पर सेना के हाथ में नहीं होती, तब भी बड़े फैसले उनकी मर्जी के बिना नहीं होते। देश के संसाधनों पर पहला हक सेना का माना जाता है। इन सबके पीछे भारत से डर का मनोविज्ञान काम करता है। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि असली बात भय नहीं, बल्कि पाकिस्तान की स्थापना के समय से वहां जारी सोच है कि 1947 में हुआ विभाजन अधूरा था, जो भारत पर पाकिस्तान की निर्णायक जीत के साथ पूरा होगा।

इसलिए राहील शरीफ का रिटायर होना भारत के लिए कोई राहत की बात नहीं है। इसलिए जो भी नया सेनाध्यक्ष बनता है, पाकिस्तान की पुरानी नीति के तहत चलना उसकी फितरत होती है। इसलिए हमारे पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने ठीक ही कहा है ‘मैं नहीं मानता कि पाक सेना की नीति में कोई बदलाव होगा।’ संभवत: इसीलिए नवाज शरीफ अथवा किसी अन्य असैनिक प्रधानमंत्री की हैसियत में बदलाव नहीं आएगा। आशा है, भारत के नीति-निर्माता इस तथ्य के प्रति जागरूक होंगे। इसीलिए हमारे पूर्व सेना प्रमुख बिक्रम सिंह ने भी पाक के नए सेना प्रमुख बाजवा से सतर्क रहने की जरूरत बताई है।


 

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