पापा, मुझे अंधी दौड़ में मत दौड़ाओ

Samachar Jagat | Wednesday, 09 Jan 2019 03:42:41 PM
Papa, do not run me in the dark race

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शक्ति तेजी से करवटें बदल रहा है। जहां कभी वक्त कभी फुर्सत में हुआ करता था, वहीं आज तेज चलने ही नहीं लगा दौड़ने लगा है। व्यक्ति के पास सब कुछ है लेकिन समय नहीं है। उसके चौबीस घण्टे भी कम पड़ने लगे हैं। उसके पास सोचने, समझने, फैसले लेने, सही तरीके से कुछ करने, भोजन करने, रिश्तों को निभाने, अपनों से बतियाने सुख-दुख में शामिल होने, आराम करने, अपने बच्चों को समय देने सहित किसी काम के लिए समय ही नहीं है। वह तो केवल और केवल धनार्जन में ही पागल होता जा रहा है।

कैसे भी धन की प्राप्ति अधिक हो बेशक इसके लिए कुछ भी छोड़ना पड़े और करना भी पड़े। जीवन के मूल मकसद से वह भटक सा गया है। कहा जाता है कि संतान माता-पिता के लिए सबसे बड़ा होता है। यदि संतान अच्छी तो कई पीढि़यां अच्छी होने के आसार बढ़ जाते हैं। यदि संतान संस्कारवान है तो उसके माता-पिता भी भाग्यवान हो जाते हैं। लेकिन यहां एक बात बहुत जरूरी है कि संतान तभी अच्छी होगी जब उसके माता-पिता अच्छे होंगे संतान तभी संस्कारवान होगी जब उसके माता-पिता संस्कारवान होंगे।


लेकिन आज बड़ी विचित्र स्थिति हो रही है कि बबूल के पेड़ बोये जा रहे हैं और उन पर आम लगने की उम्मीद की जा रही है। यह कैसे संभव है। आज अधिकांश माता-पिता चाहता है कि मेरी बेटी-मेरा बेटा, मेरे परिचितों के बच्चों से, परिवार के बच्चों से, जानकार के बच्चों से कभी किसी परीक्षा में कम अंक नहीं लाये। वह सबसे अव्वल रहे। उसके अंक सबसे ज्यादा आये। परसन्टेज सबसे अधिक हो। ऐसे में माता-पिता यह भूल जाते हैं कि सभी बच्चों को बौद्धिक स्तर एक जैसा नहीं होता, यदि ऐसा होता तो दुनिया में आई क्यू को लेकर कभी इतनी असमानता नहीं होती सभी समान पदों पर होते। दूसरा सबसे बड़ा कारण है कि सभी की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक-मानसिक स्थितियां-वातावरण एक जैसा नहीं होता है और इन सभी स्थितियों में अंतर का प्रभाव संतान पर पड़ता है। होना तो यह चाहिए कि माता-पिता आज के युग के अनुसार नई टेक्नोलॉजी में, दुनिया में होने वाले बदलावों में जागरुक बने, एक्सपर्ट बने और सहज बने।

ऐसा इसलिए जरूरी है किआज मोबाइल, लैपटॉप, कम्प्यूटर, टी.वी. और इन्टरनेट सोशल मीडिया का समय है, इसलिए बच्चे क्या कर रहे है, उनकी संगत कैसी है, वे क्या सीख रहे हैं क्या कर गला काट प्रतियोगिता में धकेलने की। आइए, हम अपने बच्चों को तहेदिल से प्यार दें संस्कार दें। उन्हें कार तो दिखायें लेकिन कार दिखाने से पहले संस्कार सिखायें जो उसके जीवन के आधार बनेंगे और जीवन के सार बनेंगे। अपने बच्चों को प्रोत्साहित करें उन्हें शाबाश बोले, उनसे सहज रहें, अपने मन-वचन-कर्म में आदर्श रहें, संकल्पित रहें और उन्हें अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते रहें तो जरूर से बच्चे अच्छे ही नहीं बहुत अच्छे बनेंगे और अच्छे काम करेंगे।

प्रेरणा बिन्दु:- 
अंधी दौड़ हर किसी को तोड़ देती है, पीछे धकेल देती है, कमजोर कर देती है और यहां तक कि बहुत नीचे गिरा भी देती है।
 

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