जातीय आधार पर सत्ता व सरकार में भागीदारी

Samachar Jagat | Wednesday, 09 Jan 2019 04:13:36 PM
Participation in power and government on ethnic basis

संविधान लागू होने के पश्चात् जसवंत कौर बनाम बंबई तथा मद्रास राज्य बनाम चम्पकम दौराय राजन फैसले के कारण 1951 में संविधान में पहला संशोधन अनुच्छेद 15 खण्ड 4 व अनुच्छेद 16 (4) द्वारा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष व्यवस्था कर लोक नियोजन में हितकर भेदभाव करने की सरकार को शक्ति प्रदान की गयी जिससे पिछड़ा वर्ग समूहों की सामाजिक असमानता को समाप्त किया जा सके। प्रबल भावना यह थी कि पिछड़ा वर्ग एवं समुदायों की सामाजिक असमानता के उपचार के लिए विशेष उपाय किये जाये। 

मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण लागू होने के पश्चात् इन्द्रा साहनी बनाम भारत सरकार केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 16(4) के अन्तर्गत साधारणतया 50 प्रतिशत से ज्यादा कोटा नहीं बढ़ाया जा सकता जब तक कि अति विपरित परिस्थितियां नहीं हो। भारत सरकार द्वारा 10 प्रतिशत आर्थिक आधार पर दिये गये आरक्षण को अवैध घोषित किया गया कि ऐसा आरक्षण संविधान की मंशा के अनुरूप नहीं है एवं कहा गया कि संपत्ति एवं आय यानि आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। 

सुप्रिम कोर्ट ने एम. नागराज केस में कहा है कि सरकार पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। पिछड़े वर्ग के जो लोग सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं रहे हैं उनको सूची से हटाया जाये, संख्यात्मक आंकड़ों से पिछड़ापन व अपर्याप्त प्रतिनिधित्व देखा जाये जिससे प्रशासनिक दक्षता पर कोई विपरित आंच नहीं आये। आर.के. सबरवाल बनाम पंजाब राज्य में भी इसे दोहराया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 9वीं सूची में डाल दिये जाने पर भी जो कानून अवैध है वह असंवैधानिक ही रहेगा। यह भी कहा गया है कि पिछड़ा वर्ग सूची का समय-समय पर रिविजन किया जाये और अपवर्जन के सिद्घांत के अनुसार आरक्षण का लाभ दिया जाये। पिछड़ा वर्ग, एससी, एसटी का पृथक आरक्षण यथावत रखा जाये। 

परन्तु महाराष्ट्र सरकार ने 50 प्रतिशत से आगे मराठों को शिक्षा व नौकरी में 16 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है और 32.4 प्रतिशत आबादी के मराठा समाज को 16 प्रतिशत आरक्षण कर वर्तमान में कुल आरक्षण 52 प्रतिशत से बढ़ाकर 68 प्रतिशत करने का फैसला किया है। महाराष्ट्र में विभिन्न मुस्लिम वर्ग भी आरक्षण की मांग कर रहे है जो सरकार के विचाराधीन है। 

दूसरी ओर तेलंगाना विधानसभा में एसटी आरक्षण 6-10 प्रतिशत, मुस्लिम 4-12 प्रतिशत करने का बिल पास किया गया है और राष्ट्रपति को 9वीं सूची में जोडऩे के लिए भेजा है। संविधान में संशोधन कर एससी में वर्गीकरण करने की मांग भी की जा रही है। कांग्रेस ने भी एससी आरक्षण को 6-10 प्रतिशत करने की मांग का समर्थन किया है।  केन्द्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने गत 5 वर्षो की अवधि में ओबीसी कोटे से पूरे देश में केन्द्रीय सेवाओं में कुल 1.3 लाख नौकरियां और केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में पिछले 3 वर्षों में दाखिले के आंकड़ों का अध्ययन किया है। आयोग ने पाया कि देश में केवल 10 राज्यें में ओबीसी सहित बड़ी जातियों का वर्गीकरण है, शेष राज्यों ने इस संबंध में कोई पहल नहीं की है। 

आयोग ने रेलवे, डाक एवं तार विभाग, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों एवं सिविल सेवा से जुड़े विभिन्न विभागों से सूचनाएं प्राप्त की है। आयोग ने बहुत स्पष्ट किया है कि देश में कई राज्यों में ओबीसी कोटा उनकी जनसंख्या के अनुपात से ज्यादा है परन्तु अनेक जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात से कही कम फायदा मिला है। पिछड़ा वर्ग में शामिल 994 जातियों को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले में मात्र 2.68 प्रतिशत ही प्रतिनिधित्व मिल पाया है। आयोग ने राज्य के मुख्य सचिवों एवं राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को सुझाव दिया है कि ओबीसी का वर्गीकरण आवश्यक है और लिखा है कि ओबीसी आरक्षण कोटे का वर्गीकरण विभिन्न जातियों की अखिल भारतीय स्तर पर जनसंख्या के आधार पर किया जाये। 

इस प्रकार आयोग ने 5 साल में 1.3 लाख नौकरियों के अध्ययन आधार पर खुलासा किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 97 प्रतिशत ओबीसी कोटे का लाभ नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में दाखिले में केवल 25 प्रतिशत जातियों को मिल रहा है और अपनी रिपोर्ट में उन प्रमुख जातियों के नाम भी अंकित किये है। देश की आबादी में वर्तमान में 44 प्रतिशत हिस्सेदारी पिछड़ा वर्ग की है और केन्द्रीय सूची में 2479 जातियां सम्मिलित है। 

केन्द्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने केन्द्रीय सूची में शामिल अन्य पिछड़ा वर्ग को शिक्षा व नौकरियों में अब तक हुए फायदे के संबंध में खुलासा किया है। उक्त रिपोर्ट के अनुसार नौकरियों व शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश का फायदा पिछड़ा वर्ग की एक चौथाई जातियां ही उठा रही है, 994 जातियों में से 37 प्रतिशत को नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में दाखिले का कोई लाभ नहीं मिल पाया हैं। पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित जातियों में से 10 प्रतिशत जातियां ही 24.95 प्रतिशत नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का फायदा उठाया है।

बिहार में कुर्मी, यादव जातियों का बाहुल्य है। ओबीसी फेक्टर में उत्तरी भारत और खासकर के उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदल दिया है। इसमें से 19.40 प्रतिशत यादव,  7.46 प्रतिशत कुर्मी, 4.90 प्रतिशत लोदा, 4.43 प्रतिशत पाल, 4.33 प्रतिशत निषाद, 4.15 प्रतिशत मोमीन, 3.25 प्रतिशत कुशवाह शाक्य, 2 प्रतिशत मुराव मौर्य, 3.60 प्रतिशत जाट, 4.03 प्रतिशत तेली, 3.42 प्रतिशत प्रजापति, 3.31 प्रतिशत कृषक, 3.1 प्रतिशत नाई आदि मिलाकर इन जातियों की जनसंख्या 48.60 प्रतिशत है।

राजस्थान में 47.3 प्रतिशत आबादी केन्द्रीय पिछड़ा वर्ग सूची में है। फिर भी प्रदेश में सत्ता गत 70 सालों से 16 उन्नत व सम्पन्न जातियों के हाथों में रही है। प्रदेश की आधी आबादी वाली करीब 200 जातियां ऐसी है जिनकों कभी राजनैतिक एवं सरकारी सेवाओं में उच्चतम स्तर पर पहुंचने का अवसर नहीं मिला। सत्ता व सरकार में भागीदारी में छोटी-छोटी जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। विधानसभा के लिए टिकट देने में भी पार्टियां जातीय संख्या, जनाधार और दबाब को तबज्जो देती रही है परन्तु प्रदेश में 80 फीसदी जातियां ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, राजपुरोहित आदि 16 जातियों में बंटी है। जिन जातियों के पास पावर, पैसा व प्रतिष्ठा है वे हर प्रकार से राजनैतिक दलों से टिकट पाने व अमीर बनने में सफल हो जाते हैं। गिनी चुनी एग्रेसीव जातियां ही सत्ता पर काबिज रहती है। एससीव ओबीसी की सैकड़ों जातियां ऐसी है जिनको आरक्षण लागू होने के पश्चात टिकट छोड़ मामूली सरकारी नौकरी भी नहीं मिली। इन जातियों में राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक किसी प्रकार की जाग्रति नहीं आयी। 

कुछ एग्रेसीव जातियां ही राज्य सेवा, राजनीति में आगे आ रही हैं। इन चुनावों में भी केवल कुछ जातियों को ही टिकट मिला है, 74 अनुसूचित जातियों व जनजातियों के तो विधायक ही नहीं बने।
ओबीसी में भी 52 जातियों को आज तक लाभ नहीं मिला। अनुसूचित जनजाति की 23 जातियों में से केवल 5 जातियों को लाभ मिला है, शेष को नहीं। छोटी-छोटी जातियों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला। 16 जातियों के हाथों में हर सरकार की चाबी रही है। शैक्षणिक व सरकारी सेवाओ ंके मामलों में भी ऐसी ही स्थिति है।  

90 के दशक के बाद संघ एवं भाजपा का ओबीसी व दलित जातियों में प्रभाव एवं पैठ बढ़ी है। श्री गोविन्दाचार्य इस सोसियल इंजीनियरिंग के सूत्रधार है। मोदी ने भी वर्ष 2014 के चुनाव में इसी आधार पर दावा ठोका। भाजपा को अति पिछड़े वोटों का लाभ मिला। राजस्थान में ओबीसी का कोई संगठन एवं राजनैतिक शक्ति नहीं है। पृथक-पृथक जाति/वर्ग लाभ प्राप्त कर रहे हैं, इनकी आपसी समस्याएं है, आरक्षण के मुद्दे पर ओबीसी जातियां बंट जाती है। स्थिति यह बन रही है कि जिस पार्टी के पास ओबीसी की विभिन्न जातियों का अधिक समर्थन प्राप्त है वह चुनावों को प्रभावित करती है। 

उच्चतम न्यायालय ने जातीय वर्गीकरण को वैध, उपयुक्त एवं आवश्यक बताया है और लिखा है कि यदि एक लिस्ट में सुनार व लोहार को रख दिया तो सारा लाभ सुनार को ही मिलेगा। वर्गीकरण के संबंध में स्पष्ट लिखा है कि तुलनात्मक सामाजिक पिछड़ापन एवं जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए वर्गीकरण होना चाहिए परन्तु अति पिछड़ों के नाम पर पिछड़ा वर्ग का आरक्षण कम नहीं किया जा सकता। वर्गीकरण से अधिक कारगर होगा कि क्रीमिलेयर का उपयुक्त निर्धारण व उसकी पालना सुनिश्चित करना क्योंकि प्रत्येक जाति/वर्ग में अत्यधिक पिछड़े लोग है जिन्हें अवसर नहीं मिला। इन पिछड़े वर्गों में एक तबका लगातार लाभ ले रहा है, अधिकांश अत्यधिक पिछड़ों को अवसर नहीं मिला।

एग्रेसीव जातियां शक्ति प्रदर्शन व आन्दोलनात्मक तरीकों से अधिकाधिक लाभ व विशेष लाभ प्राप्त प्राप्त कर रही है और राजनेताओं को चेतावनियां देने के साथ खुला प्रदर्शन कर रही है। सामाजिक रूप से समृद्घ जाति/वर्ग आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं और राजनैतिक पार्टियों पर दबाब डाल रहे है।
(ये लेखक के निजी विचार है)



 

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