पेट्रोल-डीजल पर उपकर का भार-महंगाई की मार

Samachar Jagat | Saturday, 13 Jul 2019 03:56:15 PM
Petrol-diesel burden of cess-inflation

पांच राज्य विधानसभाओं और उसके बाद लोकसभा चुनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी के बावजूद पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई वृद्धि नहीं की गई, किन्तु इसके बाद कच्चे तेल के भावों में गिरावट के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि हैरान करने वाली है। अब केंद्र ने बजट में पेट्रोल-डीजल पर उपकर लगाकर महंगाई बढ़ने का रास्ता खोल दिया है। इस बार बजट से आम लोगों को उम्मीद तो यह थी कि सरकार मध्यम वर्ग और गरीब तबके का खयाल रखेगी और ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे लोगों पर महंगाई का बोझ पड़े। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटें लोगों को बजट ने निराश ही किया है। किसी तरह की राहत देना तो दूर, सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर जिस तरह से उपकर लगाया है, वह हैरत में डालने वाली बात है। 

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यहां यह बता दें कि सरकार जब-जब पेट्रोल और डीजल महंगा करती है तो उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने का तर्क दिया जाता है। लेकिन अभी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम काफी नीचे है। ऐसे में यह एक तरह से सरकार का जनविरोधी कदम कहा जाएगा। गरीब के लिए तो महंगाई से बड़ी कोई मार नहीं होती। ऐसे में पेट्रोल और डीजल महंगा होने का मतलब है हर चीज महंगा होना। दूध, फल-सब्जी से लेकर रोजमर्रा के काम आने वाली सारी चीजों के दाम बढ़ जाएंगे। सार्वजनिक परिवहन सेवाएं महंगी हो जाती है। ऑटो, टैम्पो तक का भाड़ा बढ़ जाता है। ढुलाई महंगी होने का असर साफ दिखने लगता है। हालांकि वित्तमंत्री ने यह भरोसा दिया है कि पेट्रोल और डीजल महंगा होने का लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने दिया जाएगा और महंगाई काबू में रहेगी। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि व्यवहार में ऐसा होना संभव नहीं होता।

 हकीकत तो यह है कि लोग हारकर महंगाई की मार झेलने को मजबूर होते हैं। पेट्रोल और डीजल पर उपकर लगाना आमजन की जेब से पैसा निकालने की दिशा में उठा कदम है। इस बार बजट में सडक़ और ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं का खासा जोर है और इसके लिए सरकार को अगले पांच साल में 100 लाख करोड़ रुपए चाहिए। इसके लिए पैसे जुटाने का एक उपाय पेट्रोल और डीजल पर उपकर लगाना भी है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री ने तो कहा भी है कि देश में सडक़, बिजली, पानी, रेलवे, गरीबों को एलपीजी मुहैया कराने, गरीबी दूर करने से जुड़े कार्यक्रम शुरू करने और ढांचागत क्षेत्र की अनेक परियोजनाओं को पूरा करने के लिए भारी रकम की जरूरत है और कर के रूप में मिलने वाले इस पैसे का उपयोग इन्हीं कार्यों में होगा। समस्या यह है कि कर संग्रह, खास तौर से जीएसटी संग्रह के मामले में सरकार निर्धारित लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाई है। भारत में आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा कर नहीं दे रहा है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल पर उपकर लगाना एक तरह से जनता पर सीध कर थोपना है। सरकार इस बात को भलीभांति समझती है कि आमजन खाना-पीना बंद नहीं करेगा, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग भी करेगा ही। भारत में वाहनों का उपयोग करने वालों की तादाद करोड़ों में है। 

ऐसे में पेट्रोल खरीदना तो कोई बंद करेगा नहीं। इसलिए जनता की जेब से पैसे खींचने का सबसे बढि़या रास्ता पेट्रोल और डीजल महंगा करना है। पिछले साल जब पेट्रोल 80 रुपए के पार चला गया था तब नीति आयोग ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण सुझाव दिया था। आयोग का कहना था कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपना खजाना भरने का लालच छोड़ दे तो पेट्रोल-डीजल के दाम नीचे लाए जा सकते है। पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क जैसे कर थोपने का जो अधिकार राज्यों और केंद्र के पास है, उसमें सरकारों को उदारता दिखानी चाहिए। जाहिर है सरकारे अपनी कमाई के लिए आम जनता पर बोझ डाल रही है।



 

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