हर घर को नल से पीने का पानी मुहैया कराने का संकल्प

Samachar Jagat | Monday, 10 Jun 2019 02:49:40 PM
Pledge to provide drinking water to each household

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आजादी के 72 साल बाद केंद्र की भाजपानीत मोदी सरकार ने हर घर को नल से पीने का पानी मुहैया कराने का बीड़ा उठाया है। मोदी सरकार का यह बड़ा काम आसान नहीं है। नई सरकार के सामने सामाजिक स्वास्थ्य क्षेत्र की यह सबसे बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार ने अपनी पहली पारी में हर गांव को बिजली मुहैया कराने का संकल्प लिया था। उसे पूरा करने का पूरा प्रयास किया गया है। मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में हर घर को नल से पेयजल उपलब्ध कराने की बात कही है। 

यह काम बहुत कठिन तो है, लेकिन यह सबसे जरूरी भी है। 16 करोड़ से अधिक भारतीयों के लिए सुरक्षित पेयजल की आस बहुत ही जरूरी है। किन्तु अभी यह बहुत दूर है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 में भले ही यह दर्ज हो कि प्रत्येक देशवासी को साफ पानी मुहैया कराना राज्य का दायित्व है, लेकिन आज भी देश की करीब 17 लाख ग्रामीण बसावटों में से लगभग 78 फीसदी में पानी की आवश्यकता के न्यूनतम स्तर पर पहुंच है। विडंबना यह है कि अब तक परियोजना पर 89 हजार 956 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जाने के बावजदू सरकार परियोजना के लाभ प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45 हजार 53 गांवों को नल-जल और हैडपंप की सुविधा मिली है। 

जबकि करीब 19 हजार गांव ऐसे भी है, जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है। हजारों बस्तियां ऐसी हैं, जहां लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाते हैं। ये आंकड़े भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के हैं। केंद्र सरकार ने प्रत्येक ग्रामीण को पीने, खाना पकाने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए स्थाई आधार पर गुणवता मानक के साथ पानी की न्यूनतम मात्रा उपलब्ध कराने के इरादे से 2009 में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम शुरू किया था। इसमें हर घर को परिशोधित जल घर पर ही या सार्वजनिक स्थानों पर नल द्वारा मुहैया कराने की योजना थी। इसमें सन् 2022 तक देश में शत प्रतिशत शुद्ध पेयजल आपूर्ति का संकल्प था। 

पिछले साल सरकार की आडिट रिपोर्ट में कहा गया था कि योजनाएं प्रतिदिन प्रति व्यक्ति पेयजल की दो बाल्टी प्रदान करने में विफल रही है। जो कि नियमित लक्ष्य था। मोदी सरकार को इस परियोजना को पूरी करने के लिए विशेष निगरानी की व्यवस्था करनी होगी, ताकि लक्ष्य को पूरा किया जा सके। ग्रामीण भारत में पेयजल मुहैया करवाने के लिए 10वीं पांच साला योजना तक 1105 अरब रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इसकी शुरुआत 1949 में हुई, जब 40 वर्षों के भीतर 90 प्रतिशत जनसंख्या को साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया। इसके ठीक दो दशक बाद 1969 में यूनिसेफ की तकनीकी मदद से करीब 255 करोड़ रुपए खर्च कर 12 लाख बोरवेल खोदे गए और पाइप से पानी की आपूर्ति की 17 हजार योजनाएं शुरू की गई।

 इसके अगले दो दशक में सरकार ने एक्सीलेरेटेड वाटर सप्लाई प्रोग्राम, अंतरराष्ट्रीय पेयजल और स्वच्छता दशक के तहत सभी गांवों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए एक शीर्ष समिति का गठन किया गया और राष्ट्रीय पेयजल मिशन व 1987 को राष्ट्रीय जलनीति जैसी योजनाएं बनाई गई। उसके बाद 2009 में दूसरी योजना प्रारंभ हो गई। हजारों करोड़ रुपए दसियों योजनाओं के बावजूद आज भी करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत के शिकार होते हैं। अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य दिवस बर्बाद होते है। इनसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रुपए का नुकसान होता है। ग्रामीण भारत 85 फीसदी आबादी पानी की अपनी जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है।

 एक तो भूजल का स्तर वर्षाभाव के कारण लगातार गहराई में जा रहा है। दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है, जो दूषित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। गांवों में शौचालय, मल व कूडा निस्तारण की कोई व्यवस्था न होने, खेती में अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल और बहुत सी जगह पारंपरिक रूप से कतिपय रसायनों की मात्रा की अधिकता के चलते ग्रामीण भारत को पानी बीमार बना रहा है। देश में करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं। करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार है। लोगों को साफ पीने लायक पानी उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन इससेे कहीं बड़ी चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है कि जल अपने प्राकृतिक रूप में न सिर्फ सुरक्षित रहे, बल्कि दूषित भी न हो।



 

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