किसी भी कम्प्यूटर निगरानी के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी

Samachar Jagat | Tuesday, 08 Jan 2019 01:45:12 PM
Pre-approval for any computer monitoring required

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कम्प्यूटर की निगरानी के बारे में हालिया प्रावधानों को लेकर मचे सियासी बखेला के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस बारे में सफाई दी है। गृह मंत्रालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने किसी भी जांच एवं प्रवर्तन एजेंसी को इस बारे में ‘पूर्ण शक्ति’ नहीं दी है। अपनी कार्रवाई में जांच एजेंसियों को मौजूदा नियमों का ही पालन करना होगा। इसके लिए उन्हें हर बार पूर्व मंजूरी लेनी होगी। गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक ‘‘आईटी एक्ट 2000 में पर्याप्त कदम उठाए गए हैं और टेलीग्राफ एक्ट में भी मिलते-जुलते प्रावधान है। हर मामले में गृह मंत्रालय एवं राज्य सरकार से पूर्व मंजूरी की जरूरत होगी। गृह मंत्रालय ने किसी भी कानून एवं प्रवर्तन एजेंसी को विशेष अधिकार नहीं दिए हैं।’’ सरकार ने इस बारे में जो स्पष्टीकरण दिए हैं, उनसे आशांकाओं के बादल छंटेगे, ऐसी उम्मीद है। 
यहां यह बता दें कि गृह मंत्रालय ने 20 दिसंबर को एक आदेश जारी कर देश की 10 खुफिया और जांच एजेंसियों को यह अधिकार दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर देशभर में किसी भी कम्प्यूटर पर निगरानी रख सकती है, उसमें मौजूद जानकारी को देख सकती है और उसमें छिपी सूचनाओं को पढ़ सकती है। सरकार के इस आदेश से पहला और दो टूक संदेश यही गया कि सरकार अब देश के हर नागरिक की निगरानी करेगी और जांच के नाम पर सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां चाहे जिसका कम्प्यूटर खंगाल सकेगी। इसे सीधे-सीधे पुलसिया राज का आगाज माना गया। और यह सही भी है कि अगर जांच एजेंसियों को ऐसे असीमित और दमनकारी अधिकार मिल जाएंगे जो वे कितनी निरंकुश हो जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 


हालांकि सरकारें ऐसे कानूनों और शक्तियों का इस्तेमाल कैसे और किसके लिए करती है, यह किसी से छिपा नहीं है। गृह मंत्रालय ने हालांकि अपने बयान में कहा कि कम्प्यूटर से जानकारी निकालने (इंटरसेप्ट) को लेकर कोई नया नियम कानून, नई प्रक्रिया, नई एजेंसी, पूर्ण शक्ति या पूर्ण अधिकार जैसा कुछ भी नहीं है। सब चीजें पुरानी ही है। जांच एवं प्रवर्तन एजेंसियों के लिए नियमों में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। लेकिन सरकार ने इस बारे में अब सफाई दी है ताकि लोगों में बैठा खौफ दूर किया जा सके। पहली बात तो यही है कि जांच और खुफिया एजेंसियों को जिस कम्प्यूटर को जांच के दायरे में लाना होगा, उसके लिए पहले गृह मंत्रालय और संबंधित राज्य सरकारों से मंजूरी लेनी होगी। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी जांच या खुफिया एजेंसी को इस तरह की जांच के लिए ‘पूर्ण शक्ति’ या विशेष अधिकार नहीं दिए गए हैं। और सभी जांच एजेंसियों को मौजूदा नियमों का ही पालन करना होगा। दरअसल यह कोई नई बात नहीं है, कम्प्यूटर संबंधी जांच के लिए आईटी एक्ट 2000 में पहले ही पर्याप्त प्रावधान है। जिनके मुताबिक ऐसी जांच के लिए पूर्व मंजूरी को अनिवार्य बनाया हुआ है। 

अब यह बताया जा रहा है कि इन सभी जांच और खुफिया एजेंसियों को इलेक्ट्रॉनिक संचार बीच में रोक कर जानकारी हासिल करने का अधिकार तो 2011 से ही मिला हुआ है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस तरह की निगरानी के लिए कानून 2009 में बना था। जाहिर है कि इसके लिए मुख्य आधार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसे कठोर कानून बनते हैं और ईमानदारी से लागू होते हैं तो इसे स्वागत योग्य कदम माना जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल यह कि जब कानून बन चुका था तो क्या अब तक जांच और खुफिया एजेेंसियों को निहत्था रखा गया था? पिछले कई साल के दौरान देश ने कई बड़े आतंकी हमले झेले हैं और कई बार ऐसे हमलों को रोक पाने में सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी पाई गई।

 11 दिन पहले इस कानून के प्रावधानों को जिस तरह लागू किया, उससे तो साफ था कि हर नागरिक जांच के दायरे में है, किसी के भी कम्प्यूटर की जांच हो सकती है। पहली नजर में तो यही लगा कि ऐसा करने के पीछे मकसद खास लोगों को निशाना बनाना ही होगा। इसीलिए इस पर इतना हंगामा भी मचा। लेकिन सरकार ने जनता के गुस्से को भांप लिया और सख्त प्रावधानों के पीछे हटी है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अगर ऐसा कानून काम करता है तो और कारगर होता है तो यह अच्छी बात है। लेकिन अगर यह दमन का हथियार बन जाए, जैसा कि अंदेशा रहा है, लोगों की पुलिसिया राज में जीने को मजबूर कर दे तो इसकी उपादेयता पर उंगलिया तो उठेगी ही।

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