बंगाल में हिंसा के कारण प्रचार पर एक दिन पहले रोक

Samachar Jagat | Saturday, 18 May 2019 02:42:02 PM
Prevention of violence in Bengal one day before blocking

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में हिंसा के मद्देनजर बुधवार की रात बड़ी कार्रवाई करते हुए राज्य में गुरुवार की रात 10 बजे बाद चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी है। नियमानुसार चुनाव प्रसार 17 मई शुक्रवार को सायंकाल 6 बजे बंद होता। देश में ऐसा पहली बार हुआ है, जब आयोग ने अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल करते हुए प्रचार की समय सीमा को कम किया है। आयोग ने राज्य के गृह सचिव अत्रि भट्टाचार्य  को हटा दिया है। उनका कार्यभार राज्य के मुख्य सचिव मलय डे को सौंप दिया है। इसके अलावा कोलकाता पुलिस के पूर्व कमिश्नर और वर्तमान में एडीजी सीआईडी राजीव कुमार को केंद्रीय गृह मंत्रालय में अटैच कर दिया है।

चुनाव आयोग ने यह कार्यवाही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो और चुनाव के हर चरण में होने वाली हिंसा के कारण की है। भाजपा और टीएमसी के कार्यकर्ताओं के बीच प्रसिद्ध समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति चकनाचूर हो गई। इसके लिए भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही है। बंगाल अपनी समृद्ध सामाजिक सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता रहा है। पिछले दो सौ वर्षों में उसने कई बार देश को दिशा दिखाई है। राजनीतिक हिंसा ऐसे सुसंस्कृत राज्य की पहचान बन जाना क्षोभ और आश्चर्य का विषय है। वैसे बंगाली जनमानस में अपने विचारों को लेकर मर-मिटने का भाव शुरू से रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान वहां राष्ट्रवाद की लहर मजबूत हुई तो किशोर वय के कई क्रांतिकारी सामने आए, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में आत्म बलिदान की एक श्रृंखला रच दी। 

यूं तो पश्चिम बंगाल मेें राजनीति हिंसा की पुरानी परंपरा रही है। जब किसी स्थापित दल को नई चुनौती मिलती है तो उसकी प्रतिक्रिया में हिसा उपजती है। भाजपा यूं तो देश के सभी राज्यों में चुनाव लड़ रही है तो फिर हिंसा की खबरें पश्चिम बंगाल से ही क्यों? जाहिर है तृणमूल कांग्रेस आक्रामक मुद्रा में प्रतिकार कर रही है। वह भी उस मुख्यमंत्री के राज्य में जो कभी वामपंथियों की हिंसा के विरोध में देश भर में सुर बुलंद किया करती थी। दरअसल हाल के पंचायती चुनावों में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन और तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दिए जाने के बाद ममता बनर्जी आक्रामक मुद्रा में है।

 माना जा रहा है कि अपने राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जिन बाहुबलियों को वामपंथी इस्तेमाल करते रहे हैं, वहीं कालांतर में तृणमूल कांग्रेस में शिफ्ट हो गए, जो पश्चिम बंगाल में स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। यह जानते हुए भी कि बंगाल में राजनैतिक कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय है और वैचारिक रूप से उत्तेजित रहे हैं। निश्चिय ही पश्चिम बंगाल में बम्पर वोटिंग व चुनावी हिंसा बदलते राजनीतिक परिदृश्य की तरफ इशारा करती है। राजनीतिक दलों को अगर इस राज्य के भविष्य की जरा भी फिक्र है तो चुनाव के दौरान उन्हें अपना आचरण सभ्य रखना चाहिए। 



 

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