स्वयं सेवक से भारत के प्रधानमंत्री अटल जी

Samachar Jagat | Saturday, 18 Aug 2018 04:05:46 PM
Prime Minister Atal ji of Indian

Rajasthan Tourism App - Welcomes to the land of Sun, Sand and adventures

अटल बिहारी वाजपेयी निज में कवि बने रहकर भी राजनेता होते है। साधारण स्वयं सेवक से भारत जैसे विशाल देश का प्रधानमंत्री होना विरल घटना है, अपूर्व है। सत्तात्मकता की कोई भी कठोरता उनमें आती नहीं है। अपने में सबके लिए होकर समन्वित व लचीलापन लिए रहकर लक्ष्य के प्रति निष्ठावान हुए रहते हैं। अपने अंतर में प्रकाशमान होकर आज भारत रत्न है।


अटल जी का निजत्व इतना गहरा है कि हर समय उपहार दिए रहता है। मेरे लिए वह समय अनुपम उपहार लेकर आया, जब लोकसभा के चुनाव के दौरान मैं भी लखनऊ के गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था, जहां प्रत्याशी के कारण अटल जी भी वहां थे। मुझे देखने के साथ सहज भाव से कह पड़े- लखनऊ में जयपुर यहां कैसे। मैंने अपने चि. मनोज का परिचय दिया और बताया कि वह टाइम्स ऑफ इंडिया में छायाकार है और वह अब आपकी कुछ फोटो लेना चाहता है। चि. मनोज ने अपने स्नेप्स लिए। इसके बाद मेरी तरफ मुखातिब होकर कहा- हमारे साथ फोटो होने में कोई एतराज है? यह ऐसा आमंत्रण था कि मैं तत्काल तैयार हो गया। फोटो लेनेे के साथ उन्होंने कहा कि यह यादगार फोटो होनी चाहिए। उनके लिए तो नहीं, मेरे लिए यादगार ही है। इसी दिन शाम को अटल जी की चुनाव सभा में चला गया था। उनके मंच पर जाने से पहले उन तक पहुंचकर मैंने कहा- आप एमपी हो गए? उन्होंने तत्काल कहा- तो पीएम भी हो गया और ऐसा ही हुआ।

 ‘अटल जी के साथ कोट से छबड़ा के चार घंटे की रेलयात्रा ऐसा सुखद संयोग था, जो मेरे लिए यादगार बन गया। अटल जी छबड़ा में भैरोसिंह शेखावत के चुनाव प्रचार के लिए जा रहे थे। वे उस समय विदेश मंत्री थे। यात्रा में उनके साथ हो जाने के लिए गिरिराज किशोर आचार्य ने स्वीकृति ले ली थी। अटल जी कितने सामान्य होकर सामान्य के लिए हो सकते हैं, यह मैंने देखा और समझा। यात्रा में कहीं नहीं लगा कि मैं भारत के सर्वमान्य नेता और विदेश मंत्री के साथ हूं।

अटल बिहारी वाजपेयी, विधि स्नातक होकर कुशल वकील होते या नहीं होते, पर जो आज है, वह किसी भी विधिवेत्ता से कहीं अधिक विधि विधान के सफल व्याख्याता है। 1945 में अटल जी अपने पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी के साथ कानपुर में विधि स्नातक होने आए थे। उन्होंने विधि के विधान में कुछ ओर ही लिखा था। कठिन संघर्ष, परिस्थितियां, अनपेक्षित अवसर, आकस्मिकताएं या सांयोगिक तत्वों का मेल, जो भी हो, वह कार्य-कारण बन कुछ से कुछ बना देता है। अटल जी विधि स्नातक होने से पूर्व ही स्वयं सेवक बनकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए पूर्ण कालिक प्रचारक बन गए। 1946 में सरसंघ चालक गुरु गोलवकार से हुई पहली मुलाकात ऐसी सिद्ध हुई कि उसी समय भाल पर तिलक हो गया। कानपुर में डी.ए.वी. कॉलेज के छात्रावास के कक्ष में ही जयपुर के प्रवीण चन्द्र जैन एडवाकेट (ढूंढिया) के साथ ही अटल जी के अग्रज प्रेमबिहारी भी 1944 से विधि स्नातक होने की तैयार कर रहे थे। 

पिता-पुत्र भी इन्हीं के साथ उसी कक्ष मेें आकर रहने लगे। अटल जी आगरा कॉलेज में स्नातक होकर आए थे। उन पर साम्यवादी विचार-धारा का इतना प्रभाव था कि ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन को मित्र राष्ट्रों के लिए परेशानी करने वाला मानते थे। कानपुर में उनकी स्थिति असमंजसपूर्ण बन गई। अपने अग्रज के मित्र और उसके साथ कक्ष में रहते हुए प्रवीण चन्द्र जैन की अवहेलना करना कठिन था। जैन उस समय तक मेरठ में हुए संघ के अधिकारी प्रशिक्षण शिविर में भाग ले चुके थे। जयपुर में 1943 में अपने मित्र विश्वलेश्वर नाथ भार्गव, स्वरूप चन्द मेहता आदि के साथ मिलकर संघ की पहली शाखा लगा चुके थे। कानपुर में भी प्रेमबिहारी वाजपेयी के साथ शाखा लगाना शुरू कर दिया था। अटल जी ने जैन को कानपुर के साम्यवादी नेता कामरेड युसुफ से मिलाया। साम्यवाद को लेकर वे बहस भी करते रहते थे। जैन का कहना है कि उनके प्रयास से अटल जी तटस्थ भाव से शाखा में आने लगे। उन पर धीरे-धीरे राष्ट्रवाद का रंग चढ़ने लगा। बर्लिन का पतन हो चुका था। 

भीषण विनाशकारी क्षमता वाले एटम बम जैसे आयुधों के कारण नए संकट के आसार पैदा हो रहे थे। कांग्रेस के नेता लंबे कारावास के बाद जेल से रिहा होकर बाहर आ रहे थे। भारत की स्वतंत्रता की तैयारी के साथ देश-विभाजन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इसके साथ साम्प्रदायिक दंगों की खोफनाक सूचनाएं भी आतंक पैदा कर रही थी। साम्यवाद, भारत की राजनीतिक कार्यसूची में नहीं रह गया था। ऐसे संक्रमण काल में स्वाधीन चेत्ता नौजवान अत्यन्त विरोधात्मक स्थितियों में थे। अटल जी आरएसएस में जाने लग गए थे। भारत विभाजन की भूमिका में संघ शक्ति बनता जा रहा था। उन्हें अपनी मान्यता में आरएसएस में जुझारूपन लगने लगा। नागरिकों के लिए ‘समान संभावनाओं’ के समाजवादी आदर्श को भी आरएसएस के माध्यम से उपलब्ध होना मानने लगे हो तो आश्चर्य की बात नहीं थी। भारत विभाजन की प्रक्रिया में देश की स्थिति विस्फोटक बनती जा रही थी। 

कांग्रेस के नेता किसी निर्णयात्मक समाधान पर पहुंचने, अनिश्चय तथा टकराव को मिटाने में लगे हुए थे। इन सब स्थितियों में हिन्दु मन अत्यन्त विचलित था। ऐसे समय में अटल जी का गुरु गोलवकर से मिलना हुआ, जो अपने कानपुर प्रवास में श्री जैन के कक्ष में उनके साथ ही ठहरे थे। जैन का कहना है कि कानपुर में वे और उनके अग्रज अध्ययन के साथ अपने खर्च के लिए कमा रहे थे, जबकि अटल जी के पास कोई काम नहीं था। उनके पिता को सेवा से निवृत्त होने के बाद पेन्शन में चालीस रुपए मासिक मिलता था, जो पारिवारिक खर्च के बाद दोनों के लिए कम पड़ते थे। जैन ने गुरुजी को अटल जी की वाक् शैली, कवि होने की प्रतिभा के साथ आर्थिक स्थिति से भी अवगत कराया। संयोगवश कानपुर में गुरुजी के सम्मान में हुई सभा में अटल जी ने अपने भाषण के साथ कविता पाठ किया। 

जैन के अनुसार अपनी कविता में अटल जी ने गुरुजी के प्रति जैसी काव्यांजलि प्रस्तुत की, अतीत अनूठी थी। कविता का सार था कि जिस तरह शिवजी की जटा से गंगा को मुक्त कराया जाकर भागीरथ ने भारत को जीवन धारा प्रदान की, वैसे ही आपने राष्ट्र की चेतना की धारा प्रदान की है, जो युगों तक इस देश के लिए जीवनदायी शक्ति होकर रहेगी। गुरुजी अटल जी की वाक् शैली और कवित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपने साथ ही बनारस ले गए, जहां आरएसएस का अधिकारी प्रशिक्षण शिविर लग रहा था। अटल जी ने विधि स्नातक होने की इच्छा छोड़ दी और गुरुजी को पूरी तरह समर्पित हो गए। आर्थिक उपार्जन और उसकी दुश्चिन्ताओं से भी मुक्त हो गए।
(ये लेखक के निजी विचार है) 

Rajasthan Tourism App - Welcomes to the land of Sun, Sand and adventures


 

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!



Copyright @ 2018 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.