नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित मसौदा जारी

Samachar Jagat | Tuesday, 09 Jul 2019 04:22:37 PM
Proposed draft of new education policy

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में वर्ष 2019-20 का बजट पेश करते हुए नई शिक्षा लाने की घोषणा की और साथ ही राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र का निर्माण करने, उच्च शिक्षा संस्थानों को 400 करोड़ रुपए की मदद दिए जाने और विदेशी छात्रों के लिए ‘स्टेडी इन इंडिया’ प्रोग्राम शुरू किए जाने और भारतीय शैक्षणिक संस्थानों को विश्व के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिलाए जाने की भी बात कही। यहां यह बता दें कि नई शिक्षा नीति लाए जाने की घोषणा से पहले ही सरकार ने नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित मसौदा जनता की राय के लिए जारी किया है। इस मसौदे को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि एक आदर्श भारतीय समाज और इसकी शिक्षा व्यवस्था के लिए सुंदरतम शब्दों, मुहावरों और तरीकों के साथ एक नई व्यवस्था आकार लेने जा रही है। यह नीति वर्तमान और भविष्य के बीच राज्य के रुख को स्पष्ट करती है। इस नीति में एक सकारात्मक सोच निहित है, जो शिक्षा द्वारा भारत के प्रत्येक व्यक्ति के निजी और नागरिक जीवन को समृद्ध करना चाहती है। 

प्रस्तावित मसौदे के आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है कि इसका लक्ष्य शिक्षा द्वारा भारत के प्रत्येक व्यक्ति का सर्वांगीण विकास है। 
मसौदे में जहां-जहां सर्वांगीण विकास का उल्लेख है, वहां प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: इस विकास को ज्ञान आधारित समाज, इक्कीसवीं सदी की दुनिया की दक्षताओं, आलोचनात्मक और सृजनात्मक चिंतन, निर्णय लेना आदि चौथी औद्योगिक क्रांति की तैयारी और संवैधानिक मूल्यों खासकर समानता के सापेक्ष परिभाषित किया गया है। इस वैश्वि दृष्टि के साथ इतिहास बोध और सांस्कृतिक अस्मिता के पक्ष को पूरा स्थान देकर यह प्रयास किया गया है कि परंपराओं, इतिहास, संस्कृतियों और मूल्यों के साथ इक्कीसवीं सदी की जरूरतों को पूरा किया जाए।

 इन दोनों आयामों का संतुलन ही इक्कीसवीं सदी का भारत बनाएगा। ऐसी मान्यता इस नीति में निहित है। यह मान्यता दुधारी तलवार के समान है। यदि नीति के क्रियान्वयन में किसी एक पक्ष में झुकाव हुआ तो यह भारतीयता के सामासिक अर्थ का विग्रह कर देगा। यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि भारतीय का असल अर्थ उसके बहुवचन में है। देखना है कि यह नीति इस बहुवचन को कैसे क्रियान्वित करती है।

प्रस्तावित नीति ‘नए भारत’ शिक्षा के स्थायी संकट परीक्षा केंद्रित रटंत प्रणाली से मुक्त करना चाहती है। नए भारत में विकास के लिए आवश्यक सांस्कृतिक पूंजी के प्रसार को मध्यम वर्ग तक सीमित न रखकर वहां तक पहुंचाना चाहती है जहां इसे खरीदने की क्रय शक्ति नहीं है। इस नीति में औपचारिक शिक्षा की एक नई रूपरेखा सुझाई गई है जिसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति के लिए 3 वर्ष की आयु से 18 वर्ष की आयु तक शिक्षा का प्रबंध है।



 

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