रुपया गिरने से मिलेगा निर्यात को बढ़ावा

Samachar Jagat | Wednesday, 22 Aug 2018 11:32:46 AM
Rupee fall will boost exports

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डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा के 70 रुपए का आंकड़ा पार जाने से कई क्षेत्रों पर नकारात्मक असर होगा तो कुछ क्षेत्रों के लिए यह अवसर भी मुहैया कराएगा। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में निर्यात आधारित कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। दरअसल, डालर के मुकाबले रुपए की कम कीमत की वजह से विदेशों से भारत में आने वाली मुद्रा को रुपए में बदलने पर ज्यादा राशि मिलेगी। भारत से सबसे ज्यादा आईटी सेक्टर की सेवाएं, दवाएं, आभूषण, इंजीनियिरिंग, मशीनरी और पेट्रोलियम उत्पादों का विदेशों में निर्यात होता है। इसका भुगतान घरेलू कंपनियों को डालर में किया जाता है। 

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि रुपए में गिरावट से फार्मा, आईटी और ऑटो पार्ट्स के क्षेत्र को लाभ पहुंचेगा क्योंकि यह निर्यात आधारित सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसके अलावा भारत से निर्यात होने वाले रत्न एवं आभूषण के अलावा चावल, मसाले, कपास और अन्य कृषि वस्तुओं के निर्यात में भी इजाफे की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार आईटी उद्योग का आकार 8 फीसदी बढक़र 167 अरब डालर पर पहुंचने की उम्मीद है। चालू वित्त वर्ष में आईटी उद्योग का निर्यात सात से आठ फीसदी की दर से बढ़ रहा है। इसी तरह भारतीय ऑटो उपकरण उद्योग वर्ष 2017-18 में 2 लाख 92 हजार 184 करोड़ रुपए रहा। इस दौरान ऑटो उपकरण का निर्यात 90 हजार 571 करोड़ रुपए रहा, जो इससे पहले 73 हजार 128 करोड़ रुपए था। जहां तक दवा उद्योग का सवाल है वर्ष 2017-18 में दवाओं का निर्यात 17.27 अरब डालर रहा है। 

इसके वर्ष 2020 तक 20 अरब डालर पहुुंचने की उम्मीद है। इसी प्रकार निर्यात होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों में कच्चे तेल से शोधित उत्पाद आते हैं। गत जुलाई माह में पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 3.9 अरब डालर रहा जो 2017 में 3 अरब डालर था। कपड़ा उद्योग में अप्रैल-फरवरी 2017-18 में परिधानों को निर्यात 97 हजार 984 करोड़ रुपए रहा जो पिछले साल की तुलना में 6.25 फीसदी कम है। कुल मिलाकर जुलाई 2018 में 25.77 अरब डालर का कुल निर्यात हुआ, जबकि जून 2018 में यह 22.54 अरब डालर था कुल निर्यात था। यहां यह बता दें कि पिछले सप्ताह सोमवार को तुर्की के आर्थिक संकट का दुनिया भर के बाजारों पर असर पड़ा। इससे रुपया डालर के मुकाबले 110 पैसे की ऐतिहासिक गिरावट के साथ 69.93 रुपए तक लुढक़ गया, जो पांच साल में किसी एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है। इससे पहले 3 अगस्त 2013 को रुपया एक दिन में 2.4 फीसदी या 148 पैसे की गिरावट के साथ बंद हुआ था।

 विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी निवेशकों में घबराहट के माहौल से रुपया करीब 1.57 फीसदी लुढक़ा। रुपया बीते सप्ताह शुक्रवार को 68.84 पर बंद हुआ था और 69.49 रुपए पर खुला। शुरुआती कारोबार में भारतीय मुद्रा 79 पैसे गिरकर 69.62 रुपए पर पहुंच गई। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के हस्तक्षेप के बाद इसमें थोड़ा सुधार आया। हालांकि डालर की भारी मांग के चलते यह फिर बड़ी गिरावट के साथ 70 रुपए से महज सात पैसे ऊपर बंद हुआ। रुपए में 8.67 फीसदी इस साल करीब 9 फीसदी की गिरावट रही है क्योंकि विदेशी निवेशकों में इक्विटी और डेट बाजार से क्रमश: 26.4 करोड़ डालर और 5.43 अरब डालर निकाले हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी के अनुसार रुपया जल्द ही 70 रुपए के स्तर को पार कर सकता है।

 ऐसे में आरबीआई को बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अंतर मुद्रा कारोबार में रुपया पौंड, यूरो, जापानी यून के मुकाबले भी कमजोर हुआ है। तुर्की मेें अमेरिकी पादरी को सजा के बाद दोनों देशों में टकराव गहराया। नाराज अमेरिका ने उसके उत्पादों पर 20 फीसदी आयात शुल्क लगा दिया। इससे तुर्की की मुद्रा लीरा इस साल 45 फीसदी टूट चुकी है और यह 17 सालों के निचले स्तर पर है। रूसी मुद्रा रूबल और ब्राजील की मुद्रा रियाल दो साल के निचले स्तर पर है। 

चीनी मुद्रा युआन लगातार 9 हफ्तों से लुढक़ रही है। मलेशिया की रिंगित, मैक्सिको की पेसों, दक्षिण अफ्रीका की रैंड, अर्जेटीना की पेसों में भी इस साल चार से नौ फीसदी की गिरावट झेल चुकी है। ब्लूम वर्ग इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्री का कहना है कि तुर्की के संकट का भारत पर असर लंबे समय तक नहीं रहेगा। भारत 2013 के मुकाबले इस वक्त किसी वैश्विक झटके से निपटने में ज्यादा सक्षम है। विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति भी ज्यादा मजबूत बनी हुई है। भारत में घरेलू अर्थव्यवथा के मानक, मजबूत और सकारात्मक बने हुए हैं। डीबीएस बैंक के अर्थशास्त्री का कहना है कि आरबीआई बफर स्टॉक की तैयारी कर रहा है, ताकि पूंजी प्रवाह में कमी न रहे। जहां तक भारत में इसके असर का सवाल है, आयातित उत्पाद महंगे हो जाएंगे, आरबीआई ब्याजदर बढ़ा सकता है। कच्चे तेल में उछाल से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे। हालांकि निर्यात करने वाले उद्योग जैसे आईटी, फार्मा को फायदा होगा और आयात करने वाले उद्योगों को घाटा होगा। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद तुर्की की मुद्रा लीरा में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 

आयातकों एवं बैंकों की ओर से डालर की मांग तेजी बढ़ी है। जबकि भारत जैसे उभरते देशों से विदेशी निवेशकों ने पूंजी निकाली है। चीन, रूस व यूरोप के बाजार लुढक़े हैं। इस तरह झटका केवल तुर्की को नहीं बल्कि पूरी दुनिया को लगा है। अमेरिकी डालर के मुकाबले रुपए में जोरदार गिरावट के बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 13 अप्रैल से 10 अगस्त के बीच 25.15 अरब डालर कम हो गया है। रुपए की गिरावट थामने को भारतीय रिजर्व बैंक को डालरों की जोरदार बिक्री करनी पड़ी। आरबीआई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 13 अप्रैल को समाप्त सप्ताह के दौरान देश का विदेशी मुद्रा भंडार 426.03 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन 10 अगस्त को विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 400.88 अरब डालर रह गया। 10 अगस्त को समाप्त सप्ताह में ही भंडार में 1.83 अरब डालर की कमी आई। माना जा रहा है कि रुपए में गिरावट के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आ रही है। रिजर्व बैंक यद्यपि आधिकारिक रूप से रुपए को किसी खास स्तर पर बनाए रखने के लिए दखल की बात नहीं कहता है। लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट से स्पष्ट है कि वह रुपए को संभालने के लिए डालरों की बिक्री करता रहा है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां बदले की भावनाओं वाली है। पिछले दिनों जब अमेरिका ने चीन से आयात के खिलाफ टैरिफ बढ़ाया तो यह माना गया कि अमेरिका चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है। लेकिन अब तुर्की जैसे देशों के खिलाफ जिस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं, ट्रंप प्रशासन अपनी टैरिफ नीति को नया विस्तार दे रहा है। पूरी दुनिया ने इस खतरे को अच्छी तरह समझ लिया है। इसलिए बाजार तेजी से लुढक़ रहे हैं। इस कदम ने पूरी दुनिया को आर्थिक अस्थिरता दी है। भारत को इस टैरिफ युद्ध से पड़ने वाले असर के खिलाफ कदम उठाने होंगे।
 

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