एससी-एसटी एक्ट अब जस का तस

Samachar Jagat | Tuesday, 07 Aug 2018 09:48:21 AM
SC-ST act now as it is

एससी-एसटी एक्ट में बिना जांच एफआईआर और बिना मंजूरी गिरफ्तारी के प्रावधान जोड़ने वाला विधेयक सरकार ने पिछले सप्ताह शुक्रवार को लोकसभा में पेश कर दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि एक्ट से सख्त प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्ते निष्प्रभावी करने के लिए सरकार को संशोधन विधेयक पेश करना पड़ा है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक पेश किया। संशोधित विधेयक में एक्त के आरोपी को अंतरिम जमानत नहीं देने का भी प्रावधान है। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाराज दलित संगठन और सांसद सरकार पर इस विधेयक के लिए दबाव बना रहे थे। यहां यह बता दें कि एससी-एसटी एक्ट को पहले की तरह ही मजबूत बनाए जाने के लिए पिछले सप्ताह ही बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस कानून में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी और इसके एक दिन बाद ही शुक्रवार को इस विधेयक को संशोधन के साथ लोकसभा में पेश कर दिया। इस संशोधित विधेयक को सरकार चालू मानसून सत्र में ही पास कराना चाहती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इसी साल 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के प्रावधानों में कई बदलाव करते हुए ऐसे मामले में आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। उसने गिरफ्तारी से पहले आरोपों की जांच डीएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी से कराए जाने की बात कही थी। इसका देश भर में जबर्दस्त विरोध हुआ। 

दलित संगठनों ने कहा कि बड़ी मुश्किल से हासिल एक सहूलियत इस समाज से छीन ली गई है। इस फैसले के बाद अनुसूचित जातियों और जनजातियों का उत्पीड़न और बढ़ सकता है, जो कि पहले से ही वर्तमान सरकार के दौर बढ़ा हुआ है। खुद सरकार के सहयोगी दलों ने भी इसकी निंदा करते हुए सरकार से जल्द से जल्द कानून के मूल स्वरूप को बहाल करने की मांग की। कोर्ट के फैसले के बाद 2 अप्रैल को दलित संगठनों के भारत बंद के दौरान हिंसक झगड़े हुई जिसमें 12 लोगों की मौत हो गई। विवाद तब और बढ़ा जब फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति गोयल को एनजीटी का अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद दलित संगठनों ने एक बार फिर से 9 अगस्त को भारत बंद का आह्वाान किया। जाहिर है, सरकार पर काफी दबाव था। उसे सहयोगी दलों के साथ-साथ भाजपा के दलित सांसदों की भी नाराजगी झेलनी पड़ रही थी। 

बहरहाल अब संशोधित विधेयक में उन सभी पुराने प्रावधानों को शामिल किया गया है। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में हटा दिया था। लोकसभा में पेश संशोधित विधेयक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधित विधेयक 2018 के तहत इस तरह के अपराध की शिकायत मिलते ही पुलिस एफआईआर दर्ज करेगी और केस दर्ज करने से पहले जांच जरूरी नहीं होगी। गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेना आवश्यक नहीं होगा। केस दर्ज होने के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होगा। भले ही इस संबंध में पहले का कोई अदालती आदेश हो। लोकसभा मेें पेश संशोधित विधेयक चूंकि संविधान में संशोधन का विधेयक है। ऐसे में इसके लिए सरकार को दोनों सदनों में दो तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। चूंकि इस मामले में सभी दलों की राय एक है।

 इसलिए सरकार को चालू मानसून सत्र में विधेयक को पारित कराकर इसे कानूनी जामा पहनाने में कोई समस्या नहीं आएगी। इस प्रकरण का संदेश व्यवस्था के सभी अंगों को समझना होगा। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था हर वर्ग को भेदभाव और उत्पीड़न से बचाव की गारंटी देती है। इसके लिए जो उपाय किए गए हैं, उन्हें हटाने की या कमजोर करने की कोशिश कोई भी वर्ग बर्दाश्त नहीं करेगा। 

खासकर वह तबका जो औरों की तुलना में ज्यादा उपेक्षित और शोषित रहा है। हमारे देश में अनुसूचित जाति तथा जनजाति वर्गों में आने वाले समुदाय सदियों से कमजोर सामाजिक स्थिति में रहे हैं। इसलिए संविधान में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के मानवीय अधिकारों और गरिमा के संरक्षण की विशेष व्यवस्था की गई। ताकि देश और समाज के विकास में इनकी भी सम्मान जनक भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। दरअसल जाति-संरचना में उच्च और निम्न दर्जा तय होने के साथ ही एक मनोविज्ञान जुड़ जाता है और लोगों के बर्ताव भी उसी से संचालित होने लगते हैं। ऐसे में जो लोग समर्थ और ताकतवर समुदायों से आते हैं, वे अक्सर कमजोर तबके के लोगों के साथ अमानवीय और आपराधिक तरीके से पेश आते हैं। यहां तक कि आपसी संबोधन की भाषा तक में वर्चस्व और दमन का भाव कामकरता है। 

यह बहुत ही चिंताजनक और शर्मनाक बात है कि समाज में जाति के अनाधार पर भेदभाव और दमन की घटनाएं भी आम है। यही नहीं अनुसूचित जाति और जनजाति में भी आपस में ऊंच-नीच का भेदभाव देखने को मिलता है। अनुसूचित जाति के समुदायों में भी एक दूसरी जाति में छूआछूत की बीमारी देखने को मिलती है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सफाईकर्मी वाल्मिकी समाज के साथ अनुसूचित जाति के ही अन्य समाज के लोग छूआछूत करने में कतई नहीं झिझकते हैं। 

अनुसूचित के ही अन्य समाज के लोगों को भी वाल्मिकी समाज की गरिमा और सम्मान की रक्षा करने के लिए आगे आना चाहिए। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में इस भेदभाव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। खैर अब जब केंद्र सरकार ने दलित संगठनों और सांसदों की मांग के अनुरूप कानून में संशोधन करके कानून के मूल प्रावधानों को बहाल करने के लिए लोकसभा में संशोधित विधेयक पेश कर दिया है, तो तमाम दलित संगठनों की शिकायतें दूर हो जानी चाहिए। जब सरकार ने उनकी मांग मान ली तो बेहतर होगा कि 9 अगस्त के भारत बंद के अपने आह्वाान वापस ले लें।
 



 

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