बैंक के बड़े बकाएदारों पर शिकंजा

Samachar Jagat | Saturday, 10 Mar 2018 09:27:13 AM
Screws on the bank's big arrears

पंजाब नेशनल बैंक के हजारों करोड़ के घोटाले के बाद सरकार बैंकों के बड़े बकाएदारों पर शिकंजा कसने जा रही है। 50 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज लेकर उसे जान बूझकर नहीं चुकाने वालों की फेहरिस्त में एक हजार से भी ज्यादा बकाएदारी है। सार्वजनिक बैंक इनकी सूची सीबीआई को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। फिर विदेश जाने पर पाबंदी से लेकर संपत्ति जब्त करने समेत अन्य कार्रवाई का सिलसिला शुरू होगा। देशभर में सरकारी बैंकों का कर्ज नहीं चुका पा रहे बकाएदारों की संख्या सात हजार से भी ज्यादा है। बैंकिंग सूत्रों की माने तो सार्वजनिक बैंकों की ओर से इस सप्ताह के अंत तक पहली सूची सीबीआई को सौंप दी जाएगी। इस सूची में 1072 बकाएदारों के नाम है। कुछ छोटे बैंकों ने अभी तक सूची में अपने बकाएदारों के नाम शामिल नहीं किए हैं।

 ऐसे में यह संख्या और बढ़ सकती है। बैंक इन बकाएदारों के पास फंसी कर्ज की रकम लौटाने की तमाम कोशिश कर थक चुके हैं। यहां यह बता दें कि वित्त मंत्रालय ने हाल ही सरकारी बैंकों को निर्देश दिया था कि 50 करोड़ रुपए से ज्यादा के फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए की छानबीन कर 15 दिन में उसका ब्योरा सीबीआई को सौंप दें। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक रिजर्व बैंक और मंत्रालय एनपीए की वसूली के मामले में हरसंभव कदम उठा रहे है। सीबीआई अभियोग चलाने, संपत्ति जब्त करने जैसे कई कदम उठा सकती है। भगोड़ा आर्थिक अपराध विधेयक 2018 संसद में पारित होने के बाद एजेंसियों को बड़े कदम उठाने की क्षमता मिल सकेगी। सरकार ने कर्ज के फंसने के बढ़ते जोखिमों से निपटने के लिए बैंकों के कार्यकारी निदेशकों और चीफ टेक्नोलॉजी अफसर से ब्लू प्रिंट बनाने को भी कहा है। 

उन्हें इसमें सभी खामियों की पहचान के भी निर्देश दिए हैं। यहां यह बता दें कि जान बूझकर कर्ज न चुकाने वालों के खिलाफ बैंक कई तरह की कार्रवाई कर सकते हैं। इनमें ग्राहक की संपत्तियों, परिसंपत्तियों की कुर्की, जब्ती, कंपनी में उनके अधिकारों को खत्म करने, कंपनी के प्रबंधन को अपने हाथ में लेने जैसे कठोर कदम शामिल है। वित्त मंत्रालय ने बैंकों को यह भी निर्देश दिए हैं कि जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों का समय रहते पता लगाएं और सीबीआई को मामला सौंपे। बैंकिंग क्षेत्र के श्रेष्ठ प्रबंधन व्यवस्था से सीख लें और मौजूदा व्यवस्था की खामियां ढूंढे। नियमों के उल्लंघन का शक होने पर ईडी-डीआरआई की मदद लें।

 यहां यह उल्लेखनीय है सरकारी बैंकों यानी सार्वजनिक बैंकों पर पिछले वर्ष सितंबर तक 7.5 लाख करोड़ का एनपीए यानी फंसा कर्ज है। पीएनबी घोटाले का खुलासा होने के बाद शेयर बाजार में लगातार गिरावट होने से निवेशकों के 56 करोड़ रुपए डूब गए हैं। यहां यह बता दें कि पिछले 11 सालों में देश के तीन वित्त मंत्री सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को एनपीए (फंसे कर्ज) से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए लगा चुके हैं। यह सरकार की इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई धन राशि के दोगुने से ज्यादा है। बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए चालू वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष में निकाले गए 1.45 लाख करोड़ रुपए के अलावा सरकार 2010-11 से 2016-17 के बीच बैंकों को सवा लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) समेत अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एनपीए के कारण पिछले दो वर्षों से घाटे में है।

 इस वित्त वर्ष में भी बैंकों के अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं। देश के सबसे बड़े बैंक ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया है। बैंक ऑफ बड़ौदा का हाल भी ऐसा ही है। रेटिंग एजेंसी केयर के अनुसार एनपीए की बात करें तो ऐसा नहीं लगता कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बुरा दौर खत्म हो गया है। सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान बीस सरकारी बैंकों को 88 हजार करोड़ रुपए देने की घोषणा की है। इसके साथ ही सरकार ने इन बैंकों को ज्यादा जवाबदेह बनाने के लिए कड़े नियम भी तय किए। योजना के तहत 80 हजार करोड़ रुपए पुनर्पूंजीकरण बांडों के जरिए और 8 हजार एक सौ उनतालीस करोड़ रुपए बजटीय सहायता के रूप में दिए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा बैंक बाजार से 10 हजार तीन सौ बारह करोड़ रुपए जुटाएंगे। इस प्रकार कुल पंूजीगत सहयोग एक लाख करोड़ रुपए हो जाएगा, लेकिन बैंकिंग घोटाले को देखते हुए यह बेकार की कवायद है। जनता का पैसा एनपीए के जरिए धन्नासेठों की जेबों में पहुंच रहा है और मध्य वर्ग खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

 आलम यह है कि देश में सरकारी बैंकों का एनपीए नौ लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया है। मार्च 2017 में अंत में सरकारी बैंकों की कुल गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 12.47 फीसदी पर पहुंच गई थी, जो मार्च 2014 के अंत में 4.72 प्रतिशत पर थी। इससे पिछले कुछ सालों से वित्तमंत्रियों को भारी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें एनपीए से जूझ रहे सरकारी बैंकों में भारी पूंजी डालने की जरूरत होती है। फंसे कर्जों और कॉरपोरेट के बड़े घोटालों की वजह से बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। 19 जुलाई 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीकरण किया गया था। इन बैंकों पर अधिकतर बड़े औद्योगिक घरानों का कब्जा था। आरोप था कि ये सिर्फ बड़े उद्योगपतियों को कर्ज देते हैं और गरीब इन तक पहुंंच नहीं पाता। इसके बाद राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर 1980 में हुआ, जिसके तहत सात और बैंकों को राष्ट्रीयकृत किया गया। 

इसके पहले केवल एक बैंक भारतीय स्टेट बैंक राष्ट्रीयकृत था। इसका राष्ट्रीयकरण 1955 में कर दिया गया और 1958 में इसके सहयोगी बैंकों को भी राष्ट्रीयकृत कर दिया गया। कुछ समय पहले तक देश में 27 बैंक राष्ट्रीयकृत थे, लेकिन कुछ छोटे बैंकों का एसबीआई समेत कई बड़े बैंकों में विलय कर दिया गया। फिलहाल इनकी संख्या 21 है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीयकरण के बाद भारत के बैंकिंग क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। भारत में अब विदेशी और निजी क्षेत्र के बैंक सक्रिय है।

एक अनुमान के अनुसार लगभग 90 फीसदी लोग अब भी सरकारी क्षेत्र के बैंकों की सेवाएं ले रहे हैं। बैंकों में हो रहे घोटाले से आम आदमी हिल गया है और वह बैंक में पैसा जमा कराने से कतराने लगा है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 50वें साल में ये बैंक दिवालिया होने को है, क्योंकि उन्होंने अमीरों को बिना जांच-पड़ताल के भारी रकम दे दी और कंगाल हो गए। सरकारी बैंकों में आम आदमी का भरोसा बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाने जरूरी है।
 



 

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