मानव तस्करी के खिलाफ कड़ा कानून

Samachar Jagat | Thursday, 15 Feb 2018 09:25:14 AM
Strict law against human trafficking

केंद्र सरकार मानव तस्करी के खिलाफ कड़ा और मजबूत कानून बनाने जा रही है। बच्चों, महिलाओं और मजबूर लोगों की तस्करी करने वाले अपराधियों के खिलाफ इसमें उम्रकैद और दो लाख रुपए तक जुर्माने का प्रस्ताव है। साथ ही तेजी से मुकदमा चलाने और पीडि़तों के पुनर्वास की पूरी व्यवस्था किया जाना भी शामिल है। मानव तस्करी (बचाव, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक 2017 के लिए तैयार अंतिम मसौदे को सरकार जल्द केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी प्रदान कर संसद में शीघ्र ही पेश करेगी। इसके मसौदे से स्पष्ट है कि 1956 के कानून की तुलना में नया कानून कड़ा होगा। मौजूदा कानून में विभिन्न स्थितियों में एक से दस साल तक की सजा का प्रावधान है।

 नए मसौदे में पहली बार तस्करी में पकड़े जाने पर दस साल आजीवन कारावास की सजा और एक लाख रुपए जुर्माने का प्रस्ताव है। जबकि आदतन या तस्करी का व्यवसाय करने वाले को उम्रकैद की सजा और दो लाख रुपए जुर्माने की सजा प्रस्तावित है। इसके अलावा दोषी की चल-अचल संपत्ति को जब्त किया जा सकता है। मसौदे के मुताबिक, केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय ब्यूरो स्थापित करेगा और राष्ट्रीय स्तर पर पीडि़तों को हर पहलू पर सहायता व राहत देने के लिए एक समिति गठित करेगा।

ब्यूरो देश-विदेश में होने वाली मानव तस्करी पर अंतरराष्ट्रीय समन्वय, निगरानी, अहम मुकदमों घटनाओं के खिलाफ समुचित कदम और खुफिया विभाग को मजबूत करने का काम करेगा। इस मामले में राज्य स्तर पर निगरानी के लिए नोडल प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी नियुक्त होंगे और पुनर्वास के लिए समिति भी गठित करनी होगी। साथ ही देश के सभी जिलों में मानव तस्करी विरोधी इकाई, टास्क फोर्स स्थापित की जाएगी। खासतौर पर इसके लिए अलग से पुलिस अधिकारी तैनात किए जाएंगे।

 राज्य और जिला स्तर की इकाइयों की मांग पर राष्ट्रीय ब्यूरो जांच, अभियोग समेत अन्य जरूरतों में भी मदद देगा। इसे किसी भी मामले को अपने दायरे में लेने का अधिकार भी होगा। राष्ट्रीय से लेकर राज्य स्तर तक की समिति में शीर्ष अधिकारी तैनात होंगे, जबकि जिला इकाई की कमान जिला मजिस्ट्रेट को सौंपी जाएगी। यहां यह बता दें कि पिछले कानून में जहां पीडि़तों को राहत मुहैया कराने जैसा कोई प्रावधान नहीं था, वहीं नए मसौदे में पुनर्वास के लिए संरक्षण, पुनर्वास गृह बनाए जाने का प्रस्ताव है।

वह पीडि़तों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना से मुक्ति दिलाने के लिए अंतरिम राहत मुहैया कराई जाएगी। किसी से जबरन मजदूरी कराना या प्राधिकारों के नाम पर डराना, बकाया के आधार पर काम करना आदि भी शामिल है। किसी को शराब पिलाना, किसी मानसिक रूप से अक्षम बच्चों की तस्करी आदि प्रावधानों में रखा गया है। 

मसौदे में किसी के यौन उत्पीड़न से संबंधित साम्रगी को अखबार या टीवी के माध्यम से दर्शाने पर भी तीन से सात साल की सजा देने का प्रस्ताव है। मीडिया जांच या न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीडि़त से जुड़ी ऐसी किसी सामग्री को प्रदर्शित नहीं करेगा जिसमें उसका नाम, पता या अन्य जानकारी शामिल हो। ऐसे विज्ञापन पर सजा भी हो सकती है।

मानव तस्करी के संबंधित मामलों में मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए राज्य सरकारों को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर अदालतों का निर्धाराण करना होगा। यह अदालतें पीडि़तों को तत्काल राहत देने के लिए हर्जा-खर्चा देने का आदेश जारी कर सकती है। राज्यों को विशेष सरकारी वकीलों को अनिवार्य तौर पर तैनाती का प्रस्ताव है, अगर कोई इस बुराई के लिए अपना स्थान, किराए, लीज या अन्य तरीके से देता है तो उसे भी पांच साल और एक लाख रुपए तक जुर्माने की सजा हो सकती है।

दूसरी बार पकड़े जाने पर सजा सात साल तक और जुर्माना दो लाख रुपए तक हो सकता है। अनजाने में स्थान देने वाले निर्दोष के संरक्षण का जिम्मा मजिस्ट्रेट के विवेक पर होगा। एशिया में भारत इस अपराध का एक केंद्र माना जाता है और सरकारी आंकड़ों की माने तो हर 8 मिनट में देश से एक बच्चा गायब होता है। वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच मानव तस्करी के मामलों में 92 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह बुराई एक बहुत ही ज्यादा मुनाफे का गैर कानूनी धंधा है।  

इस अपराध में सबसे ऊपर तमिलनाडु है, जहां 9 हजार 701 मामलों का रिकार्ड है। 5861 मामलों के साथ आंध्रप्रदेश, 5448 मामलों के साथ कर्नाटक, 4190 के साथ पश्चिम बंगाल और 3628 मामलों के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है। सुप्रीम कोर्ट के एक नरमी वकील के अनुसार दुनिया में करीब 80 प्रतिशत मानव तस्करी जिस्मफरोशी होती है। आशा की जाती है कि इस जघन्य अपराध के खात्मे के लिए शीघ्र ही संसद से मंजूरी मिल जाने के बाद कानून अपना काम शुरू कर देगा।



 

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