सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही के सीधे प्रसारण को तैयार

Samachar Jagat | Wednesday, 29 Aug 2018 01:45:46 PM
Supreme Court prepares direct broadcast of the proceedings

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सुप्रीम कोर्ट अपनी कार्यवाहियों को सीधा प्रसारण करने पर सहमत हो गया है। कोर्ट इस बारे में विस्तृत फैसला देगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि प्रसारण कैसे हो, किस चैनल पर हो, कितने कैमरे लगाए जाए, किन मामलों में प्रसारण हो और किनमें नहीं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने पिछले सप्ताह शुक्रवार को अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल के सीधा प्रसारण को लेकर दिए गए सुझावों  पर सहमति जताई और फैसला सुरक्षित रख लिया।

 पीठ ने कहा लोगों को पता लगना चाहिए कि कोर्ट की कार्यवाही कैसे चल रही है। जज कैसी टिप्पणियां कर रहे हैं, उनकी भाव-भंगिमा क्या है और वकील कैसे बहस कर रहे हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। यहां यह उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह और कानून की छात्रा स्वनिल त्रिपाठी की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही है। इसमें उन्होंने राष्ट्रहित में महत्वपूर्ण मामलों तथा संविधान पीठ की कार्यवाही की यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीमिंग करने का आग्रह किया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग पर सहमति जताते हुए कहा कि इससे खुली अदालत की परिकल्पना साकार होगी। मामले की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा हम कोर्ट को खुद खोल रहे हैं, रास्ते चौड़े कर रहे हैं ताकि वकीलों को आने जाने में दिक्कत न हो। अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने के अनुरोध संबंधी याचिका पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई की। इस दौरान अदालत ने एक वकील के इन तर्कों को खारिज कर दिया यदि लाइव स्ट्रीमिंग की गई तो लोग कुछ ऐसी वीडियो क्लिपों को उठा लेंगे, जिनमें जज की कोई तल्ख टिप्पणी होगी और उन्हें वायरल कर देंगे। जबकि वह एक टिप्पणी भर होगी, जिसका कोई अर्थ नहीं होगा। ऐसे में कोर्ट के पास कोई विकल्प नहीं होगा क्योंकि कोई  भी चीज एक बार इंटरनेट पर चली गई तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता। 

वकील के तर्क पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह रूढ़ीवादी सोच है। हम जो भी बोलते हैं वह कुछ देर बाद ही शब्दश: वेबसाइटों पर टीवी पर और अगले दिन विस्तृत रूप से अखबारों में हूबहू छपता है। हम देखकर खुद हैरान हो जाते हैं। अब यदि लोग यह सब आंखों से देखें, तो क्या दिक्कत है। आंखों से देखने और सुनने की एक अलग ही बात होती है। इसका फायदा वादियों के अलावा कानून के छात्रों को होगा जो दूर दराज से यह कार्यवाही देख सकते हैं। इससे पहले की सुनवाई में अटार्नी जनरल ने लाइव स्ट्रीमिंग के लिए कुछ सुझाव दिए थे। अटार्नी जनरल की ओर से दिए गए सुझावों के अनुसार पायटल प्रोजेक्ट के रूप में लाइव स्ट्रीमिंग कोर्ट नंबर एक यानी देश के मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट से शुरू की जाए। 

यह प्रसारण सिर्फ संवैधानिक मामलों की कार्यवाही का ही किया जाए। दूसरे कोर्ट में पर्याप्त आधारभूत ढांचे के साथ एक मीडिया रूम बनाया जाए, जहां पत्रकार, वकील, आगन्तुक कार्यवाही देख सके। मूक बधिरों के लिए विशेष व्यवस्था की जा सकती है। तीसरे लाइव स्ट्रीमिंग के बाद कोर्ट इनका रिकार्ड भी रखा सकता है, जो लोगों और छात्रों को अहम मामलों के बारे में ज्ञान बढ़ाने में मददगार हो। चौथा प्रसारण से सुनवाई की निष्पक्षता या पक्षों के अधिकार प्रभावित हो रहे हो तो कोर्ट इसे सीमित कर सके। कुछ मामलों में सीमाएं निर्धारण की बात कही गई है जिसमें यौन अपराधों की संवेदनशील सूचनाएं न दी जाए। ऐसे मामले जिनके प्रसारण से न्याय प्रशासन प्रभावित हो, भावनाओं को भडक़ाने तथा समुदायों में वैमनस्य पैदा करने वाले मामले  आदि हो, इसके अलावा वैवाहिक विवाद, बच्चों से जुड़े मामले, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले यदि किसी केस में गवाह पेश हो रहा है तो उसका चेहरा न दिखाया जाए। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस को मोबाइल फोन की अनुमति दी है। जजों की नियुक्ति संबंधी कॉलजियम के प्रस्ताव सार्वजनिक किए जाते हैं। न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा वेबसाइट पर दिया है। 

पारदर्शिता के लिए उठाए जाने वाले कदमों के साथ ही इसके दुरूपयोग रोकने के उपाय भी किए जाने जरूरी है। जिसके अनुसार फुटेज का व्यावसायिक, विज्ञापन तथा कटाक्ष करने के लिए इस्तेमाल न करने देने की बात कही गई है। फुटेज का उपयोग शैक्षिक समाचार व समयसामियिकी के लिए होगी। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना लाइव स्ट्रीमिंग और वेबसाइट को पुन: निर्माण, प्रसारण, अपलोड, पोस्ट, छेड़छाड़ करने आदि पर रोक है। फुटेज का अनाधिकृत प्रयोग, कॉपी राइट एक्ट 1957 तथा आईटी एक्ट 2000 के अधीन अपराध हो और साथ ही अवमानना के कानून भी इस पर लागू होंगे। सिर्फ दो कैमरों की इजाजत हो, जिनमें एक जज व दूसरे वकील पर फोकस हो। यहां यह बता दें कि इंग्लैंड में कोर्ट ऑफ अपील ने 2013 में 70 सेंकड की देरी से कोर्ट की कार्यवाही यूट्यूब पर दिखाने की अनुमति दी है। यदि जजों को लगता है कि कोई टिप्पणी जनता के लिए उचित नहीं है, तो उसे म्यूट करवा देते हैं।
 

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