सुप्रीम कोर्ट की रिजर्व बैंक को चेतावनी

Samachar Jagat | Thursday, 02 May 2019 04:15:38 PM
Supreme Court warns RBI

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक को बीते शुक्रवार को निर्देश दिया कि आरटीआई कानून यानी सूचना के अधिकार कानून के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी मुहैया कराई जाए। न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने रिजर्व बैंक को सूचना के अधिकार कानून के तहत सूचना मुहैया कराने की अपनी नीति की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि कानून के तहत वह ऐसा करने के लिए बाध्य है। 

हालांकि, पीठ ने रिजर्व बैंक के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही नहीं की, लेकिन उसने स्पष्ट किया कि वह सूचना के अधिकार कानून के प्रावधानों का पालन करने के लिए उसे अंतिम अवसर दे रही है। पीठ ने कहा कि अगर रिजर्व बैंक ने अब सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी उपलब्ध कराने से इंकार किया तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। पीठ ने कहा किसी भी तरह के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा। यहां यह बता दें कि जनवरी में शीर्ष अदालत ने सूचना कानून के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट का खुलासा नहीं करने के लिए रिजर्व बैंक को अवमानना नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से आखिरकार अब उम्मीद बनी है कि बैंकों का कर्ज लेकर जान बूझकर उसे ना चुकाने वाले लोगों के नाम अब जगजाहिर होंगे। सरकारों और रिजर्व बैंक ने लंबे समय तक उन्हें संरक्षण दिया। लेकिन आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उनका सुरक्षा कवच हटा दिया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक को कड़ा संदेश देते हुए आदेश दिया कि वह जान बूझकर कर्ज ना चुकाने वालों और अपनी वार्षिक जांच रिपोर्ट को सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक करे। सर्वोच्च अदालत ने एक आरबीआई कार्यकर्ता की तरफ से दायर की गई अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। याचिका में कहा गया था कि भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई बनाम जयंतीलाल मिस्त्री और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के जारी विशेष दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आरबीआई के लिए सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं सार्वजनिक करना अनिवार्य है।

 उस जनहित याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ने सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करने के लिए अलग से नीति बना ली और अपने सूचना अधिकारियों को भी यह आदेश दे दिया कि वह इस केंद्रीय बैंक से मांगी जाने वाली सभी तरह की सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करें। याचिका में कहा गया था कि इन सूचनाओं में वे सूचनाएं भी शामिल थी, जिनको सार्वजनिक करने का आदेश खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया था। इस तरह आरबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब गोपनीयता की आड़ में बैंक कुछ छिपा नहीं पाएंगे। यहां यह बता दें कि अभी तक बैंकों की प्रणाली में मान्य सिद्धांत चला आ रहा था कि वे ग्राहकों के लेन देन व अन्य वित्तीय कारोबार के सिलसिले में कोई भी जानकारी उजागर नहीं करते हैं।

 यह गोपनीयता से ज्यादा बैंकों की ग्राहकों के प्रति वित्तीय मर्यादा कहा जाता है। लेकिन विजय माल्या और उसके बाद अन्य बड़े कर्जों में गोपनीयता (बैंक सीके्रसी) के नाम पर जो भारी घपले किए हैं। उससे रिजर्व बैंक अन्य बैंकों के बारे में और सुप्रीम कोर्ट रिजर्व बैंक के मामले में काफी सख्त हो गया। अब ‘बैंक सीके्रसी’ गोपनीयता आदि के नाम पर कुछ भी छिपाया नहीं जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार के तहत बैंकों से संबंधित सूचना का खुलासा करने के लिए आरबीआई से अपनी पॉलिसी का रिव्यू करने के निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसा करना कानून के तहत उसकी बाध्यता है। कोर्ट उसे पारदर्शिता कानून के प्रावधानों के हिसाब से चलने के लिए आखिरी मौका दे रहा है। रिजर्व बैंक आरटीआई एक्ट के तहत सूचना देने से इंकार नहीं कर सकता। 

यदि ऐसा किया गया तो सुप्रीम कोर्ट उसे गंभीरता से लेगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि विगत जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार के तहत बैंकों की सालाना जांच रिपोर्ट का खुलासा न करने के लिए आरबीआई को अवमानना नोटिस जारी किया था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग ने रिजर्व बैंक को यह आदेश दिया था कि वह तब तक पारदर्शिता कानून के तहत मांगी गई सूचना देने में इंकार नहीं कर सकता, जब तक कि उसे आरटीआई कानून के तहत खुलासा करने की छूट न मिली हो। रिजर्व बैंक ने अपने बचाव में कहा था कि वह सूचना का खुलासा नहीं कर सकता क्योंकि बैंक की सालाना जांच रिर्पोट में किसी ट्रस्टी और बेनीफिशेयरी के बीच की जानकारी है। सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक की इस दलील को माना नहीं था।

 इसी तरह रिजर्व बैंक ने भी सभी कमर्शियल बैंकों को भी कस दिया है कि वे रिजर्व बैंक यह बताएंगे कि खास तिथि को बैंक का किस समूह पर कितना बकाया है और वह राशि इनकम रिकग्नीशन एंड असेट क्लासीफिकेशन नियम के तहत उस बैंक का एनपीए (न वसूल हुई रकम या फंसा हुआ कर्ज) है। लेकिन बैंकों द्वारा उसे एनपीए घोषित नहीं किया गया है। आई.एल. एंड एफ.एस. पर 94 हजार करोड़ रुपए से अधिक का बकाया था। जिनमें 54 हजार करोड़ रुपए से अधिक का बकाया बैंकों का है। केंद्र सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए आईएल एंड एफएस का नया बोर्ड नियुक्त किया है, जो नेशनल कंपनी लॉ एपीलेट ट्रिव्यूनल के आदेश के अनुरूप है। किसी भी बैंक को किसी भी व्यक्ति या समूह पर बकाया राशि को एनपीए घोषित करने से पूर्व ट्रिव्यूनल की अनुमति लेनी पड़ेगी। 

बीच में ऐसी शिकायतें काफी मात्रा में आई थी कि कई बैंकों ने उस व्यक्ति या समूह की राशि को भी एनपीए घोषित कर दिया, जिसने चुकाने में एक-दो दिन की भी देरी कर दी। देश के रिजर्व बैंक के पास कितना रिजर्व फंड होना चाहिए इस पर विमल जालाना कमेटी विचार कर रही है और इसकी रिपोर्ट आगामी माह जून तक आ सकती है। रिजर्व बैंक ने अपनी हिस्सेदारी नेशनल हाउसिंग बैंक (एनएचबी) और नाबार्ड में सरकार को 1450 करोड़ व 20 करोड़ में बेच दी है। अब इन दोनों संस्थानों में सरकारी की पूरी सौ फीसदी हिस्सेदारी हो गई है।



 

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