फर्जी जीएसटी बिल से कर चोरी

Samachar Jagat | Thursday, 05 Jul 2018 10:51:03 AM
Tax evasion by fake GST bill

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देश में एक समान कर प्रणाली जीएसटी का एक साल पूरा हो गया है, लेकिन इससे कर चोरी पर लगाम नहीं लग पा रही है। इलेक्ट्रानिक बिल की ई-वे बिल प्रणाली भी अस्तित्व में आ चुकी है, लेकिन कर चोरों ने टैक्स बचाने के नए तरीके बना लिए हैं। जीएसटीएन इंटेलीजेंस के महानिदेशक जॉन जोसेफ ने कहा है कि कुछ निर्यातक भी बिना सामान निर्यात किए फर्जी बिल से जीएसटी रिफंड का दावा कर रहे हैं। इससे सरकार को करोड़ों की चपत लग रही है। जीएसटी की खुफिया शाखा की पड़ताल के अनुसार देश मेें करीब एक करोड़ 11 लाख पंजीकृत कारोबारी है, लेकिन कर चुकाने वालों की तादाद बेहद कम है। 

इनमें से महज एक फीसदी यानी करीब एक लाख ही 80 फीसदी टैक्स चुका रहे हैं। बाकी 99 फीसदी की हिस्सेदारी सिर्फ 20 फीसदी है। एक मुश्त कर योजना का टर्न ओवर पांच लाख रुपए से भी कम है। इसमें 1.5 करोड़ से कम टर्न ओवर वालों को एक फीसदी टैक्स देना होता है। जीएसटी की खुफिया शाखा की जांच में कर चोरी का तरीका सामने आया है। इसमें सामानों के लिए फर्जी बिल तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन वास्तव में उनकी कहीं आपूर्ति नहीं हो रही है। इसी बिल के आधार पर कई कारोबारी और कंपनियां इनपुट टैक्स के्रडिट यानी कच्चे माल में चुकाए गए कर छूट के रिफंड का दावा करती है। गत दो माह के करीब दो हजार करोड़ की कर चोरी पकड़ी गई है, लेकिन यह राशि अपेक्षाकृत कम है। केंद्र और राज्य जीएसटी के पहले 8 माह में कर वसूली का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए हैं। राजस्व वसूली नवंबर 2017 में सबसे कम 83 हजार करोड़ रही, जबकि मार्च में यह अधिकतम एक लाख 30 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई।

 जीएसटी इंटेलीजेंस के महानिदेशक जॉन जोसेफ के अनुसार छोटे कारोबारी तो जीएसटी रिटर्न फाइल करने में गड़बडि़यां कर ही रहे हैं, बड़े कारोबारी भी शामिल है। कर अनुपात में अंतर इसका संकेत देता है। जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि दो माह में करीब दो हजार करोड़ रुपए की 45 लाख नए करदाता पंजीकृत है, लेकिन कर वसूली नहीं बढ़ी है। एक लाख करोड़ रुपए कर संग्रह का हर माह का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 10 करोड़ ई-वे बिल पैदा किए गए हैं, पिछले 3 माह में। 3 जून से देश के सभी राज्यों में लागू हुआ है ई-वे बिल। जहां तक रिफंड दावे निपटाने की बात है, इसमें तेजी आई है। इस महीने के शुरू तक 38 हजार करोड़ रुपए के रिफंड के दावे निपटाए गए हैं। 

जांच के बाद 3 हजार करोड़ रुपए के रिफंड दावे खारिज किए गए हैं। अब तक 99 फीसदी कारोबारियों से 20 फीसदी कर की ही वसूली हो पाई है। इन सब स्थितियों के मद्देनजर जीएसटी के क्रियान्वयन के एक साल बाद यह भी देखा जाना चाहिए कि टैक्स चोरी के तौर तरीके पर लगाम कैसे लगे? इन तौर तरीकों के खिलाफ सख्ती बरतने में तभी आसानी होगी, जब रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया भी आसान बनेगी। जीएसटी का दूसरा साल पहले के मुकाबले कहीं अधिक आसान और लक्ष्यों को पूरा करने वाला बनना चाहिए। नि:संदेह ऐसा तभी हो पाएगा, जब जीएसटी संबंधी कानून में बदलाव का काम अपेक्षित समय में पूरा हो जाए। अब यह समय की मांग है कि जीएसटी के स्लैब कम करने के बारे में किसी फैसले पर पहुंचा जाए। 

यह सभी मान रहे हैं कि चार स्लैब ज्यादा है तो फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाना चाहिए। रीयल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाने पर फैसले की दरकार है। इस बारे में कोई फैसला होने पर ही पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने पर कोई सार्थक चर्चा संभव है। चूंकि जीएसटी परिषद ने आम सहमति से काम करने के मामले एक मिसाल कायम की है और अभी तक किसी भी मामले में मतदान के जरिए फैसला कराने की नौबत नहीं आई है। इसलिए इस परिषद को एक अनुकरणीय उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए।

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