देश में नवासी फीसदी लोग तनाव के शिकार

Samachar Jagat | Thursday, 23 Aug 2018 01:22:08 PM
Tens of thousands of people in the country suffer from stress

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देश में 89 फीसदी लोग तनाव के शिकार है, जबकि वैश्विक औसत 86 फीसदी है। यह बात हाल में एक सर्वे में सामने आई है। भारत में जितने लोगों को इस सर्वे में शामिल किया गया, उनमें से 75 फीसदी का कहना था कि वह अपने तनाव की समस्या के बारे में चिकित्सकीय मदद नहीं ले पाते क्योंकि अगर वह इस समस्या के निदान के लिए किसी पेशेवर चिकित्सक के पास जाते हैं तो उन्हें इसके लिए बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। तनाव के कारणों की बात की जाए तो लोगों का काम और उनकी आर्थिक स्थिति इसकी सबसे बड़ी वजह है। हालांकि ज्यादातर लोगों का कहना था कि अगर उनके कार्यस्थल का माहौल उनके अनुकूल हो तो उनके तनाव का स्तर कम हो सकता है।

 वैसे यह राहत की बात है कि सर्वे में शामिल 50 फीसदी लोगों ने कहा कि इस बारे में बात करने पर उन्हें कार्यस्थल पर सहयोग मिला और वह कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं। अधिकतर लोगों, करीब 87 फीसदी ने कहा कि अगर उन्हें किसी दो नियोक्ताओं में से किसी एक को चुनना हो तो वह उसे चुनेंगे, जहां उन्हें काम करने की अनुकूल परिस्थितियां और कार्यस्थल, स्वास्थ्य कार्यक्रमों की सहूलियत मिलेगी। सर्वे में शामिल 50 फीसदी तादाद ऐसे लोगों की थी, जो सामाजिक व्यस्तता में कमी ओर परिवार और दोस्तों के साथ पर्याप्त समय न गुजार पाने और उनके शौक पूरे न कर पाने के कारण तनाव के शिकार हो जाते हैं।

माता-पिता की देखभाल और बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने की जद्दोजहद भी बहुत लोगों को तनाव के दरवाजे पर पहुंचा देती है। सर्वे के निष्कर्ष से यह तथ्य सामने आया कि भारत में हर दो में से एक व्यक्ति वृद्धावस्था में अपनी बचत से अपने स्वास्थ्य संबंधी खर्चे पूरे करता है और उसके बाद बीमे का नंबर आता है। भारत में हर दस में से चार लोग अपने लिए स्वास्थ्य बीमा लेते हैं।

 यहां यह उल्लेखनीय है कि वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे लोग इस मामले में बेहतर तैयारी करते हैं और नियमित स्वास्थ्य जांच के साथ ही बीमा भी कराते हैं। लोगों के तनाव ग्रस्त होने के कारणों में मोटापा और बीमारी भी शामिल है और इस क्रम में नींद संबंधी परिवर्तनों का स्थान सबसे नीचे रहा। सर्वे में शामिल लोगों में से हर 8 तनाव ग्रस्त लोगों में से एक व्यक्ति को इन परेशानियों से निकलने में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लोग कई कारणों से अपनी इस समस्या का इलाज नहीं करा पाते।

इनमें सबसे बड़ी समस्या इसके इलाज पर आने वाले खर्चे की है। यह सर्वे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, चीन, ब्राजील और इंडोनेशिया सहित 23 देशों में किया गया और इसके नतीजे भारत के लिए चिंता की बात हो सकती है क्योंकि दुनिया के इन तमाम देशों के मुकाबले भारत के लोग कहीं ज्यादा तनाव सामना कर रहे हैं। सिग्ना टीटी के हेल्थ इंश्योरेंस ने अपने सिग्ना 360 डिग्री वेल-बीइंग सर्वेक्षण-फ्यूचर एश्योर्ड की एक रिपोर्ट जारी की है। विकसित और कई उभरते देशों की तुलना में भारत में तनाव का स्तर बड़े रूप में है। 

इस सर्वे के दौरान दुनिया के विभिन्न देशों में रहने वाले 14 हजार 467 लोगों का ऑनलाइन साक्षात्कार लिया गया। जिसके बाद यह सामने आया कि भारत लगातार चौथे साल तनाव के मामले में दुनिया के बाकी देशों से कहीं आगे है। आम लोगों की जिंदगी में तनाव जिस कदर हावी हो चुका है, वह चिंता का विषय है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो हालात की गंभीरता का सहज ही पता चल जाता है। देश में 89 फीसदी लोग तनावग्रस्त है। तनावग्रस्त लोगों का यह आंकड़ा चौकाने वाला तो है ही साथ ही एक बड़े खतरे की ओर भी इशारा करता है। लगता है देश में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव से जूझ रहा है।

घर-परिवार, समाज, दफ्तर सब जगह लोग इसके शिकार है। बच्चे, बड़े, बुढ़े कोई भी इससे अछूता नहीं है। तनाव का बढ़ना चिंता की बात इसलिए है कि तमाम बीमारियों की जड़ है, यह। ज्यादातर मानसिक और शारीरिक बीमारियों के पीछे बड़ी वजह तनाव ही होती है। ऐसे में जो सवाल परेशान करता है, वह यह कि अगर इतनी बड़ी आबादी तनाव मे जी रही है तो कैसे स्वस्थ समाज का निर्माण होगा। सरकार को इस बारे में सोचना होगा। अगर इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया तो भारत में मानसिक रोगियों की तादाद तेजी से बढ़ जाएगी और तब यह विस्फोटक स्थिति होगी। आज शहरों और महानगरों में लोग जिस तरह की भागदौड़ भरी जिंदगी जी रहे हैं, उसकी परिणति तनाव में ही होती है।

 जल्द ही सब कुछ हासिल कर लेने की चाह और गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने तनाव को ज्यादा बढ़ाया है। बच्चों में पढ़ाई और परीक्षा का तनाव इतना हावी रहता है कि इसके घातक परिणाम दसवीं-बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा के परिणाम आने पर देखने को मिलते हैं। उम्मीदों के मुताबिक नतीजे न आने पर कुछ बच्चे मौत को भी गले लगा लेते हैं। नौजवानों में रोजगार और परिवार से जुड़ी समस्याएं तनाव का बड़ा कारण बनकर उभरी है। वृद्धावस्था का तनाव तो अवसाद जैसी स्थिति में ला देता है और देश में ऐसे मरीजों की तादाद काफी ज्यादा है। जीवन में आर्थिक पक्ष भी तनाव का बड़ा कारण बनता है। भारत में एक बड़ी समस्या यह भी है कि लोग तनाव को जरा भी गंभीरता से नहीं लेते। ज्यादातर लोग इसे नजरअंदाज करते हैं। वैसे भी हमारे यहां तनाव और अन्य मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूकता का घोर अभाव है और हर स्तर पर लापरवाही ही देखने को मिलती है।

 ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है, जो मानसिक रोग का पता चलने पर भी उपचार नहीं कराते। इसका बड़ा कारण इलाज पर होने वाला खर्च है। तनाव से होने वाली अवसाद की स्थिति तो और भी खतरनाक है। भारत में अवसाद और अन्य मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या करोड़ों में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एचओ) ने इसे भारत के लिए खतरे की घंटी करार दिया है।

भारत में चार साल पहले पहली बार राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति शुरू की गई थी। इसका मकसद देश में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों का नजरिया बदलने और उन्हें जागरूक बनाना, मनोचिकित्सा केंद्र खोलना और पहले से चल रहे अस्पतालों को उन्नत बनाना था। सरकार को देश में बढ़ रहे मानसिक रोगियों को बचाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे और इसके इलाज की व्यवस्था करनी होगी।

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