युगान्तकारी विशाल व्यक्तित्व की प्रतिमूर्ति अटल बिहारी वाजपेयी के कृतित्व हमारे लिए अनुकरणीय मीडिय़ा

Samachar Jagat | Wednesday, 22 Aug 2018 11:34:40 AM
The art of Atal Bihari Vajpayee, the image of the epoch-making personality, is the exemplary media for us.

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जब सारा देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की 72 वीं वर्षगांठ के आयोजनों में तल्लीन था तब हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जीवन के आखिरी पड़ाव पर संघर्षरत थे और उन्होंने 16 अगस्त 2018 के अपरान्ह 5 बजकर 5 मिनट पर मृत्यु ने भारत रत्न ‘‘अटल’’ पर विजय प्राप्त कर ली, जिन अटल जी ने मृत्यु की उम्र ‘दो पल’ बताई थी, अटल बिहारी वाजपेयी जिन्हें जितनी श्रद्घा से नवाजा जाये उतना ही कम है। भारतीय राजनीति के इस अपराजेय शत्रु ने 25 दिसम्बर, 1924 को कृष्ण और कृष्णा के घर जन्म लिया, उल्लेखनीय है कि अटल बिहारी वाजपेयी के पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम कृष्णा था, ग्वालियर में अटल जी का जन्म था और अटल जी के पिता एक शिक्षक थे अटल जी ने अपने नाम को जीवन प्रत्येक क्षेत्र में अटल जी ही रखा’’।

 अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से भारतीय राजनीति का एक ऐसा वट वृक्ष गिर गया है जो भारतीय राजनीति की विविधताओं के साक्षी महापुरुष और यह कहा जाये कि युग पुरुष थे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अटल बिहारी वाजपेयी जिन्हें अपने आपको राजनीतिज्ञों मे सम्मिलित करने पर बहुत कुछ अखरता था और उनका कहना था की मैं राजनीति से दूर रहना चाहता हूँ लेकिन राजनीति मुझे दूर नहीं होने देती। राजनीति से ज्यादा अटल जी लगाव कविताओं की रचनाओं और पत्रकारिता में रहा और अटल जी जब-जब भी मौका मिला उन्होंने अपनी कलम को नहीं रुकने दिया। प्रेरणादायी कविताऐं और पत्रकारिता के क्षेत्रों में वे हमेषा सक्रिय रहे। अटल जी हर सामाजिक विषयों पर कलम चलाते और कविओं और कलम कर्मियों की स्वागत करना उन्हें अपने को सम्मानित करने जैसा लगता था। वे कविता लिखते ही नहीं थे वरन् उनका कविता पाठ सुनने वालों को उर्जावान कर देता था कवि सम्मेलन में मौका मिलने पर वे उत्साह से भाग लिया करते थे। 

मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे अटल जी के निधन समाचार से स्तब्ध हो गयी और उनकी आंखों में आँसुओं ने छलकाकर पारिवारिक आत्मिय सम्बन्धों की गवाही दे दी। राजे ने कहा कि यह उनकी ऐसी व्यक्तिगत क्षति है, जिसकी ताउम्र, पूर्ति नहीं हो सकेगी, अटल जी मेरे पिता तुल्य थे मुझे अटल जी के मंत्रीमण्डल में साथ करने का सौभाग्य मिला, संगठन की मजबूती के उनके गुढ मन्त्रों से भाजपा को एक नयी सषक्तता मिली। भारतीय राजनीति में अटल जी का स्थान कोई पूरा नहीं कर सकेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल जी के निधन को एक व्यक्तिगत रूप से ऐसा झकझौरने वाला समाचार बताया कि मैं नि:शब्द होकर रह गया हूँ एक ऐसे नेपथ्य का वातावरण बन गया है, मैं अपने आपको नितान्त अकेला महसूस कर रहा हूँ। क्योंकि मेरे पीठ पर रखे जाने वाला हाल अब हट गया।

 मेरे राजनैतिक ऊँचाईयों को बढ़ाने वाला प्रेरक अब हमारे साथ नहीं है। अटल जी इस देश की ऐसी शख्सियत रहे है जिनका कोई विकल्प नहीं हो सकता। निराला, हरिवंशराय बच्चन उनके प्रिय कवियों में थे लता मंगेशकर के गायन के भी वे बहुत मुरीद थे। फिल्मों में उन्हें देवदास और गांधी फिल्म ने काफी प्रभावित किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अटल जी ने 1952 में भारतीय जन संघ से मथुरा से संसद का चुनाव लड़ा और वे हारे। लेकिन इस चुनाव में जिस राजनैतिक साहृयता का परिचय अटल जी ने दिया वह आज की राजनीति में सबको हैरान करने वाला होगा। क्या कोई अपने विरूद्ध लडऩे वाले के लिये उसकी जीत की कामना कर सकता है लेकिन अटल जी ऐसा करके दिखाया। इस 1952 के चुनाव में मथुरा से अटल जी भारतीय जन संघ के प्रत्याशी थे, कांग्रेस की ओर से किशन चन्द तथा स्थानीय राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जो क्रान्तिकारी भी थे, ने चुनाव लड़ा था। इस चुना में कांगे्रस प्रत्याशी किशन चन्द विजयी हुये थे लेकिन इस चुनाव अभियान के दौरान अटल जी ने अपने भाषणों के दौरान कहा था कि वे राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जो क्रान्तिकारी विचारधारा के है, मैं उन्हें संसद में देखना चाहते हैं। 

1952 के चुनावों में यह संभव नहीं हुआ लेकिन अटल जी स्वयं हार गये थे। लेकिन 1957 के संसदीय चुनावों में अटल जी ने बलरामपुर और मथुरा से फिर भारतीय जन संघ के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और फिर सामने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह थे तो अटल जी ने फिर दोहराया कि वे तो बलरामपुर से जीत जायेंगे यहां से अब की बार तो क्रान्तिकारी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को संसद में भिजवा दो, 1957 के इस चुनाव में कार्यालय वाकई में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जीते, अटल जी की मथुरा में जमानत जब्त हुई और वे बलरामपुर से विजयी हुये। लेकिन अटल जी की इस महान राजनैतिक उदारता की उदाहरण कहीं देखने को नहीं मिलता। कैसा आदर्श या स्वयं हार कर अपने विरोधी राजनैतिक प्रत्याशी जो क्रान्तिकारी अवधारणा का लेकिन उसके प्रति अटल जी का सम्मान देखिये। अटल जी का राजनैतिक व्यक्तित्व उन मर्यादित राजनैतिक आदर्षों की प्रतिभूति थी जो सहजता - सरलता से न केवल भरपूर थी। उनमें अपने विरोधी राजनीतिजों में भी पारिवारिक सम्बन्धों की मजबूती की इमारत थे। राजनैतिक के दृष्टिकोण से कोई विरोधी होगा लेकिन अटल जी की राजनीति मतभेदों पर आधारित मनभेदों पर नहीं।

 अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में हम राष्ट्रीय स्तर के नेता की मान्यता देते है लेकिन उनका कद अन्र्तराष्ट्रीय स्तर का था। मोरारजी सरकार में जब वे विदेष मंत्री थे तब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघों में ह्म्दिी में भाषण देकर जब नया इतिहास रच दिया था। विष्व के देषों को इस सम्बोधन में उन्होंने ‘‘वासुदेव कुटम्बकम’’ के आदर्श को स्थापित कर जिस प्रकार अपने सम्मोहनीय कला का परिचय दिया वह अपने आप में एक मिसाल बन गया था। विदेश मंत्री के रूप में अटल जी ने भारतीय विदेष नीति को बहुत है। सम्मानीय और गरिमा पूर्ण तरीके से निरूपित किया था। अटल जी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जो कांग्रेस के विरोधी तो लेकिन पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। जब अटल जी ने प्रधानमंत्री का कार्यकाल सम्हाला तब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू की फोटो तस्वीर को देखा था लेकिन बाद में वहां से हटा दिया गया। वाजपेयी ने पूछा कि नेहरू जी का तस्वीर कहां है? वापस पं. नेहरू  का चित्र लगाया गया। यह अटल जी की सोच उनका राजनैतिक बड़प्पन था। इस पांच वर्षीय कार्यकाल में देश को आगे ले जाने का संकल्प और आदर्श उनके प्रधानमंत्रीत्व काल की बहुत बड़ी यादें रही है।

 अटल जी ने अपने मंत्रीमण्डल में जिसे ‘‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक संगठन’’ का समर्थन था उसे किस प्रकार राजनैतिक कौशलता में नेतृत्व प्रदान किया, उस समय उनके मंत्रीमण्डल में लगभग 80 सदस्य थे वे भारत को सैन्य दृष्टि से काफी मजबूत बनाना चाहते थे। अटल जी ने पोकरण में 1988 पुन: भारत को परमाणु शक्ति बनाने के लिये परमाणु विस्फोट सम्पन्न कराये थे और तत्समय पष्चिमी देशों ने भारत पर आर्थिक-व्यापारिक प्रतिबन्ध लगाये थे लेकिन देशहित के सामने अटल जी के लिये ये प्रतिबन्ध कुछ नहीं थे क्योंकि उन्हें भारत की जनता का विश्वास था-जिससे वे लबरेज थे। अटल जी लाल बहादुर शास्त्री जी के नारे जय जवान-जय किसान से काफी प्रभावित थे इसी तौर में अटल जी ने जय जवान-जय किसान जय विज्ञान जोड़ दिया। 

अटल जी ने पाकिस्तान के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने के प्रयास किये गये थे पाकिस्तान गये अपना बड़ा दिल दिखाया, लेकिन पाकिस्तान ने अपनी नापाक हरकतों से मुंह नहीं मोड़ा और अटल जी के भारत लौटने के बाद कारगिल युद्घ छेड़ दिया, जिसमें पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी थी। अटल जी पाकिस्तान के साथ क्रिकेट के खेलों को भी चाहते थे। भारतीय क्रिकेटरों में सचिन तेंदुलकर उनकी पहली पसन्द थे। अटल जी की राजनैतिक आदर्शवादिता केे संकल्प देखना हो तो देखिये एक वोट नहीं जुटा पाने के कारण तेरह दिन ही सरकार चलाकर त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने हमेशा देश को बड़ा माना; अटल जी इस अवसर पर कहा था कि देश में सरकारें आती है और चली जाती है, राजनैतिक दलों की अपनी राजनीति होती है, होनी भी चाहिये लेकिन देश के सम्मान और आदर्शों से समझौता नहीं होना चाहिये। अटल जी को भारत रत्न से नवाजा गया है निश्चय ही वे ऐसे भारत रत्न है जो इस देश के विश्वास और श्रद्घा के पूज्य रहे उनका कोई राजनैतिक शत्रु था ही नहीं उन्होंने भारत के किसी भी राजनैतिक दल के नेता को छोटा नहीं माना, वे सबसे पारिवारिक सम्बन्ध रखते थे उनमें ऐसी निजता रखते थे सामने वाला ही उनके व्यवहार का कायल हो जाता था।

 उन्हें विपक्षी पार्टियों ने नेताओं की अच्छाईया दिखने पर वे उनका मन में गुणगान करने से नहीं रोक पाते थे। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब 2000 से पूर्व कुछ समय के लिए अमेरिका में थे तब अटल जी को नरेन्द्र मोदी के बारे में पता चला कि वे अमेरिका में है और किसी मिशन पर है, मोदी जी आर.एस.एस. के निष्ठावान कार्यकत्र्ता रहे थे। उस समय गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल थे, लेकिन पार्टी कमजोर हो रही थी, उस चुनावों और स्थानीय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ रहा था जब अटल जी को नरेन्द्र मोदी जी में वे क्षमताए दिखी थी वे गुजरात को सम्भाल सकते हैं। अटल जी ने मोदी जी से कहा कि अमेरिका छोड़ो-गुजरात सम्भालो। मोदी जी गुजरात आए और उसकी नेतृत्व क्षमता में अटल जी ने जो स्वपन देखा था वह आज जग जाहिर है। कोई किसी के सपनों को पूरा कर सकता है क्या वास्तव में ऐसा होता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वह शखस्यित है।

 जो हर कसौटी पर खरे उतरे है और जो भारत को विश्व में ऊँचाईयों पर ले जाने की कृत संकल्पित है। कवि हृदय अटल जी से जब उनके विवाह के बारे में प्रतिक्रिया पूछी थी तो उन्होंने कहा था कि यह राजनीति इस तरफ उन्हें सोचने ही नहीं देती, किसी ने पूछा कि क्या उनकी कोई महिला मित्र है तो उन्होंने हंसते हुये कहा कि ये चर्चा सार्वजनिक नहीं होती। इस संसार में जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। अटल जी अपवाद नहीं हो सकते थे। लेकिन ऐसे कार्यों, आदर्शों मर्यादाओं, विविधिता में एकता की क्षमता दर्शाना, सरल हृदय व्यक्तित्व का धनी बनना, राष्ट्र प्रेम और आमजन में शुभचिन्तक की छवि बनाना, राजनैतिक परम्पराओं व्यापार नहीं बनने देना, आदर्शों और मूल्यों के स्तम्भ के रूप स्थापित होने की कला के शिल्पकार अटल जी इतनी ऐसी आवश्यक विशेषताओं को हमारे लिये ऐसी पगडंडिया छोड़ गये है, जिन पर हम चल सकते है, उनके आदर्शों-मर्यादाओं का अनुकरण कर सकते है, हम उनकी राजनैतिक कौशलता का अंगीकार कर सकते है, लेकिन यह सब तब ही संभव है जब हम इस महान व्यक्तित्व के धनी के कुछ भी गुणों की सीढिय़ों पर चल सकने का साहस जुटा सकने की क्षमता प्रदर्शित करने का साहस दिखा सकेंगे। 

वर्तमान केन्द्र-राज्यों में शासित भारतीय जनता पार्टी जिसकी स्थापना 1980 में हुई थी और अटल जी उसके संस्थापक अध्यक्ष थे, जिन्होंने 1986 तक ऐसे खून पसीने से सींचा जो न केवल भारत की वरन् विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में आम जनता का विश्वास जीत चुकी है। यह पार्टी अब दक्षिण पंथी पार्टी से मुक्त होकर सबका साथ-सबका विकास ध्येय की पार्टी बन चुकी है, यही ध्येय तत्समय अटल जी जैसे अटल जी पुरुषों के मन-मस्तिष्क में था। नरसिम्हाराव के समय अटल जी की देश भक्ति और देश की विदेष नीति का पारदर्शिता कितनी सहज थी कि जब देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे तब जिनेवा में भारत-पाक सम्बन्धों पर चर्चा होनी थी तब अटल जी संसद में विपक्ष के नेता थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने जिनका जिस प्रतिनिधि मण्डल को भेजा उसका नेतृत्व की बागड़ोर अटल जी को सौंपी गयी थी जिसके बारे में काफी चर्चा रही लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने अटल जी की योग्यता का जिस प्रकार सम्मान लिया वह भारतीय राजनीति का गर्व प्रदान करने वाला राजनैतिक संदेश रहा।

मौत खड़ी थी सर पर
इसी इंतजार में थी
ना झुकेगा ध्वज मेरा
15 अगस्त के मौके पर
तू ठहर इन्तजार कर
लहराने दे बुलन्द इसे
मैं एक दिन और लड़ूँगा
मौत तेरे से
मंजूर नहीं है कभी मुझे
झुके तिरंगा स्वतत्रंता के मौके पर पे...
(ये लेखक के निजी विचार है) 

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