बड़े नेताओं के बिगड़े बोल पर चुनाव आयोग ने लगाम कसी

Samachar Jagat | Monday, 22 Apr 2019 04:25:10 PM
The Election Commission has hampered the big leaders

चुनाव आयोग ने प्रचार के दौरान बड़े नेताओं के बिगड़े बोल पर सख्ती दिखाई है। आयोग ने बीते सप्ताह बसपा सुप्रीमो मायावती और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के चुनाव प्रचार करने पर 48 घंटे की रोक लगाने का फैसला किया, वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा नेता आजम खां के प्रचार करने पर 72 घंटे तक रोक लगाई। आयोग ने इन चारों नेताओं के प्रचार के दौरान सांप्रदायिक और अभद्र बयान देने की शिकायतों पर संज्ञान लिया और अलग-अलग आदेश जारी किए।

आयोग ने इन नेताओं को फटकार लगाते हुए कहा कि वे प्रतिबंधित अवधि में किसी भी जनसभा, पदयात्रा या रोड शो में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। वे प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया में कोई साक्षात्कार भी नहीं दे सकेंगे। चुनाव आयोग ने अनुच्छेद 324 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ये आदेश जारी किए। यहां यह उल्लेखनीय है कि आयोग ने यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद आया। अदालत ने आयोग से पूछा था कि वह विद्वेषपूर्ण भाषण देने वाले नेताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई कर रहा है। यहां यह बता दें कि इससे पहले भी चुनाव आयोग इस तरह की कार्रवाई करता रहा है। 2014 के चुनाव में चुनाव आयोग ने घृणास्पद भाषण देने पर सपा आजमा को जनसभा, रोड शो से रोक दिया था। 2014 में ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भडक़ाऊ भाषण देने के मामले में चुनाव में प्रचार से प्रतिबंधित कर दिया था। आयोग ने शिवसेना के सुप्रीमो रहे स्व. बाल ठाकरे से साल 1995 से लेकर 2001 तक के लिए वोटिंग का अधिकार छीन लिया था। साथ ही चुनाव प्रचार पर भी रोक लगा दी थी। 

इसी प्रकार विवादित बयान देने वाले भाजपा नेता गिरिराज सिहं को बिहार और झारखंड में चुनाव प्रचार करने पर रोक दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं और रैलियों में हमारे माननीय जनप्रतिनिधि उम्मीदवार और बड़े से लेकर छुट भैये नेता जिस तरह की अभद्र भाषा का खुलकर और गर्व के साथ प्रयोग कर रहे हैं, यह शर्मनाक तो है ही, गंभीर चिंता का विषय भी है। तकरीबन हर दल में ऐसे नेता है, जिन्होंने चुनाव आयोग की आचार संहिता की धज्ज्यिां उड़ाने की ठान ली है। धमकी भरे लहजे में वोट मांग रहे हैं और अनुकूल नतीजे नहीं आने पर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं। 

खासतौर पर सरेआम महिलाओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे हैं। मंच से किसी को गाली देना बता रहा है कि देश को दिशा देने वालों का किस कदर पतन हो चुका है। हैरानी की बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं कार्यकर्ताओं को भाषा के मामले में संयम और शालीनता बरतने की सीख नहीं दे रहा है। यह लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली प्रवृति है। नेताओं के इस तरह के बिगड़े बोल पूरी तरह से कोई नई चीज है यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन पिछले एक दौर में जिस तरह राजनीति और सार्वजनिक जीवन का चारित्रिक पतन बढ़ा है। उससे इस तरह की चीजों में वृद्धि तो हुई ही है। एक ओर फर्क यह पड़ा है कि मोबाइल कैमरे और सोशल मीडिया के कारण अब हर कोई निगरानी में रहता है। हर सार्वजनिक सभा, हर बैठक, हर बातचीत कहीं न कहीं रिकॉर्ड हो रही होती है। आजकल टीवी और सोशल मीडिया ने ऐसी भाषा वाले बयानों को चटकारे लेकर और बढ़ा चढ़ाकर परोसना शुरू कर दिया है। 

इस तरह आम लोगों का मानस कुछ इस तरह बनाने का प्रयास हो रहा है कि एक पान की दुकान पर खड़े होकर बतियाने वालों की भाषा और माननीय प्रतिनिधियों या जिम्मेदार नेताओं की भाषा में कोई अंतर नहीं होता। भाषण में भडक़ाऊपन, आक्रामकता और अशालीनता कहीं न कहीं राजनीति को कमजोर करते हैं। नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की तो बनती ही है। राजनीतिक दलों को भी अपने ऐसे नेताओं को सभ्यता और शिष्टाचार का पाठ पढ़ाना होगा। यह शर्मनाक है कि कई राजनेता अपने विपक्षी पर वार करने की धुन में अपने पद की गरिमा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाते। इस बार चुनाव में यह प्रवृति कुछ अधिक ही दिख रही है।



 

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