बोलने की आजादी का मतलब दिनभर बोलते रहना नहीं

Samachar Jagat | Saturday, 03 Nov 2018 03:57:10 PM
The freedom to speak means not to speak throughout the day

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प्रभु ने मनुष्य को बोलने की शक्ति दी है, अभिव्यक्ति दी है तो घर-परिवार और समाज ने उसे अक्षर ज्ञान दे दिया, बोली दे दी, भाषा दे दी और संविधान ने उसे बोलने की आजादी दे दी। जब व्यक्ति को इतनी सारी बोलने की छूट मिल गई तो फिर वह बोलने का महत्व भूल बैठा, उसके मूल्य को गंवा दिया और जब चाहे जो चाहे बोलने लगा। वह दो कान और एक मुंह के प्राकृतिक सिद्धांत को बिल्कुल सिरे से खारिज कर दिया। 


इसका परिणाम यह निकला कि वह चीख रहा है, चिल्ला रहा है, दहाड़ रहा है, हल्ला मचा रहा है, बक रहा है, बकवास कर रहा है, लड़-झगड़ रहा है और ऊंची आवाज में एक-दूसरे को दबा रहा है। बोलने की आजादी का मतलब यह तो नहीं है, ऐसा करने से बोलने में अपना महत्व खो दिया है। यह एक प्रमाणित बात है कि जिस प्रकार से लगातार काम करने से, लगातार शारीरिक परिश्रम करने से, लगातार दौड़ने से, लगातार खेलने से और यहां तक कि लगातार बैठे रहने और सोते रहने से भी ऊर्जा का क्षरण होता है, ऊर्जा में कमी आती है, स्टेमना में कमी आती है, शारीरिक क्षमता में कमी आती है और शरीर में पूरी थकान आ जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि निर्धारित मापदण्ड से अधिक क्रिया-कलाप, गतिविधियां और शारीरिक कार्य निश्चित रूप से न केवल शारीरिक से बल्कि मानसिक रूप से नुकसानदेह है।

अब प्रश्न यह उठता है कि बोलने की अपनी परिभाषा क्या हो, मर्यादा क्या हो और एक आम सिस्टम क्या हो? यह आम आदमी नहीं जानता है। वरना तो बोलने पर प्रारम्भ से ही एक आधार बना हुआ है- कम बोलें, मधुर बोलें, धीरे बोलें और जरूरत का बोलें। बोलने पर ये चार या पांच बातें बहुत महत्वपूर्ण है। यदि इन बातों का कुछ हद तक पालन किया जाए तो यह तय है कि बोलने को कुछ हद तक नियंत्रित करता है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि बहुत कम लोग हैं जो कम बोलते हैं, मधुर बोलते हैं, धीरे बोलते हैं, जरूरत का बोलते हैं और सार्थक बोलते हैं। 

आज देखा वही घर में, परिवार में, संस्थान में, स्कूल में, गली में, समाज में, फंक्शन में और यहां तक की श्मशान में भी लोग बोलने को लेकर गंभीर नहीं है, सावचित नहीं है, जागृत नहीं है और मनमानी का बोल रहे हैं। किसी का दबाव नहीं है और किसी की शर्म नहीं है। घर में खूब बोला जा रहा है और जितना अधिक बोला जाएगा उतना ही गलत बोला जाएगा, जितना ज्यादा बोला जाएगा उतना ही निस्सार बोला जाएगा, जितना ज्यादा बोला जाएगा उतनी ही झगड़े की संभावना बढ़ जाती है, जितना ज्यादा बोला जाएगा उतना ही समय नष्ट होगा, जितना ज्यादा बोला जाएगा उतनी ही ऊर्जा खत्म होगी, जितना जोर से बोला जाएगा उतना ही महत्वहीन बोला जाएगा, जितना लगातार बोला जाएगा उतना ही उस पर कम ध्यान दिया जाएगा और जितना कर्कश बोला जाएगा उतनी ही आत्मियता कम होती जाएगी और दुश्मनी बढ़ती जाएगी। 

इसलिए बोलना जीवन का आधार है, जीवन का सार है, जीवन बनाने वाला है, जीवन को सार्थक बनाने वाला है और जीवन को सफल बनाने वाला है। क्योंकि घर-परिवार में ही बोलना, बोली और भाषा सीखी जाती है, यह दायित्व माता-पिता, परिजनों और शिक्षकों पर होता है कि वे बोलने को लेकर सतर्क रहे क्योंकि जैसा वे बोलेंगे वैसा ही बच्चे लोग बोलेंगे। ध्यान रहे हमारी बोली-भाषा को हमारे बच्चे सुन रहे हैं, ग्रहण कर रहे हैं और उसे जीवन चरित्र में उतार रहे हैं।
प्रेरणा बिन्दु:- 
कम बोलें, मधुर बोलें, धीरे बोलें, सार्थक बोलें और जरूरत पर बोलें।

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