किसानों की समस्या चुनावी मुद्दा नहीं, राजनीति से हट कर इनका हल ढूंढे

Samachar Jagat | Monday, 03 Dec 2018 11:01:27 AM
The issue of farmers is not an electoral issue, but politically

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देश में किसानों की समस्या ने विकराल रूप ले रखा है। इसलिए हर कोई राजनैतिक दल किसानों की समस्याओं को इस बार चुनावी माहौल में चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। कांग्रेस पहले मध्यप्रदेश और अब राजस्थान में सत्ता में आने के बाद किसानों का कर्जा माफ करने वादा कर चुकी है। वहीं भाजपा के नेता ये दावा कर रहे हैं कि प्रदेश में किसानों का कर्जा कभी कांग्रेस सरकार ने माफ नहीं किया। आजादी के बाद प्रदेश में केवल दो बार ही किसानों का कर्जा माफ किया गया है। एक बार भैरांसिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने और दूसरी बार वसुंधरा राजे की वर्तमान सरकार ने।


वहीं भाजपा की ओर से राजस्थान में चुनाव प्रचार करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो अलग ढंग से ही किसानों की समस्या के बारे में बात की। चुनावी सभाओं में मोदी कहते है कि आजादी के बाद की सरकारों ने अगर किसानों की समस्याओं को समझा होता और उनके निराकरण का प्रयास किया होता तो आज किसानों को आंदोलन ही नहीं करना पड़ता। दूसरे शब्दों में मोदी आजादी के बाद बनी कांग्रेस सरकारों पर आरोप लगा रहेे हैं कि उन्होंने अपने शासनकाल में किसानों की उपेक्षा की, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की आज दुर्दशा हो रही है और वे अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे है। वहीं कांग्रेस तो सिरे से इस बात को नकार रही है कि राज्य में किसानों की कर्जा माफी की सिर्फ घोषणा हुई। 

कांग्रेस का आरोप है कि लेकिन वास्तव में किसानों के कर्जों को माफ किया ही नहीं गया। कांग्रेस ने अब राजस्थान में यह वादा किया है कि अगर उसकी राजस्थान में सरकार आती है तो सत्ता में आने के दस दिन के भीतर किसानों का कर्जा माफर दिया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कर्जे माफी के पीछे तर्क ये है कि कि मोदी सरकार जब अनिल अम्बानी, अडानी जैसे चंद बड़े उद्योगपतियों के कर्जे माफ कर सकती है तो किसानों ने उनका क्या बिगाड़ा है, उनके कर्जे भी माफ किए जाएं।

कर्जे माफ करने पर किसानों को एक बार तात्कालिक राहत तो मिल सकती है लेकिन यह समस्या का स्थाई हल नहीं है। किसानों की समस्याओं के स्थाई हल के लिए यूपीए शासनकाल में स्वामीनाथन कमिशन का गठन किया गया था और उसने किसानों की समस्याओं का गहन अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट भी यूपीए सरकार को सौंप दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट पर तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। 

मोदी सरकार ने स्वामीनाथन रिपोर्ट के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाए लेकिन तब के हालात और आज के हालात में काफी अंतर आ गया है। उस समय स्वामीनाथन की रिपोर्ट पर अमल किया गया होता तो शायद उसके अच्छे परिणाम भी आ सकते थे। लेकिन अब हालात इतने बदल गए है कि किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए नए सिरे से अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।

अब यूरिया , खाद और बीजों के दाम इतने अधिक बढ़ गए है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने से भी किसानों को कोई खास राहत नहीं मिल पाई है। वास्तविकता ये है कि आज देश में खेती करना पूरी तरह महंगा सौदा हो गया है। बड़े किसान अपने साधनों के बल पर भले ही खेती से मुनाफा कमा पाते हो लेकिन अधिकांश किसानों की हालत खस्ता है। एक तो पीढि़यों के साथ वंश परंपरा में किसानों की जमीन बंटती जा रही है और फिर उसे फसल के लिए बीज, खाद, कीटनाशकों पर पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। 

इसके बाद खड़ी फसल को काटने और उसे वाहन पर लाद कर मंडी तक पहुंचाने पर भी पहले से ज्यादा व्यय करना पड़ता है। इन सबके बाद उसे मंडी पर फसल की बिक्री से इतना दाम भी नहीं मिल पाता कि फसल को खेत में उगाने से लेकर मंडी तक पहुंचाने के लिए किए गए खर्च की भी भरपाई हो सके। अपने परिवार को पालने और परिवार के बच्चों को पढ़ाने तथा उनका विवाह आदि सामाजिक दायित्वों को निभाने के लिए उसे कर्जे पर ही निर्भर करना पड़ता, जिसे चुकाने का उसके पास कोई इंतजाम नहीं होता। इस हालत में कर्जा और उस पर बैंकों के ब्याज का उस पर भार बढ़ता ही जाता है।

सरकारें कर्जे को माफ करने को ही ये मान बैठी है कि वह किसानों के प्रति संवेदनशील है और कर्जमाफी कर वह किसानों के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति कर रही है तो यह कहना होगा कि वे गलत सोचती है। किसानों की मुख्य समस्या ये है कि मंडी में जिस भाव से वह अपनी फसल बेचता है उससे दुगने तिगने ही नहीं, कई गुना अधिक भाव पर अनाज बाजार में खुली बिक्री में बिकता है। 

ऐसा क्यों होता है। असलियत ये है कि खुली बिक्री में जिस भाव से अनाज बिकता है, अगर उसी भाव पर या उससे थोड़े कम भाव पर उसकी फसल बिक जाए तो उसका वर्ष भर गुजारा हो सकता है। लेकिन व्यवस्था में यह बदलाव किसी सरकार ने, किसी नेता ने करने के बारे में कभी विचार तक नहीं किया। अगर फसल के किसान से लेकर मंडी से होते हुए खुली बिक्री में बिकने तक की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी कर दिया जाए तो उस अतंर को समझा जा सकता है जिसके कारण किसानों को भी फसलों का सही पैसा नहीं मिल पाता और आम ग्राहक को बाजार में अनाज सस्ता नहीं मिल पाता। 

तब इस अंतर को दूर करने के प्रयास भी किए जा सकते हैं। वास्तविकता ये है कि किसानों की समस्याओं को विभिन्न राजनैतिक दल राजनीतिक दृष्टि से ही देखती है और उसको चुनावी मुद्दे के रूप में ही इस्तेमाल करती है। इसलिए किसी भी दल की सरकार बनें, वह किसानों की समस्याओं को राजनीतिक रूप से ही देखती है और इस कारण उसका कोई स्थाई हल नहीं निकाला जाता। आज आवश्यकता इस बात की है कि किसानों की समस्याओं को स्थाई हल ढूंढने के लिए प्रयास किए जाए और इसको अपने राजनैतिक हित के लिए कोई भी इस्तेमाल नहीं करें। सभी दल अपने स्वार्थो से ऊपर उठ कर किसानों के हितोंं के बारे में सोचेंगे तो कोई कारण नहीं है कि किसानों की समस्याओं का निराकरण नहीं हो।

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