भाजपा और कांग्रेस की ताकत बढ़ेगी गठबंधनों से ही

Samachar Jagat | Wednesday, 13 Mar 2019 04:45:14 PM
The strength of the BJP and the Congress will increase with alliances

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह विपक्षी दलों के ‘महागठबंधन’ को यद्यपि ‘महामिलावट’ बताते रहे हैं, तथापि दोनों नेता अपने साथ अन्य दलों को लेकर लोकसभा चुनाव में उतरने के लिए कतई परहेज नहीं कर रहे हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग (एनडीए) में 29 दल शामिल थे। इनमें से 18 दल चुनाव लड़े, लेकिन अब 16 सहयोगी दल साथ छोड़ चुके हैं। दो सहयोगी दलों से भाजपा की अनबन चल रही है। अपना दल और रामदास आठवले की पार्टी। भाजपा ने अब 127 सीटों वाले 3 राज्यों में नए दल जोड़े है।

इनमें 37 सीटों वाला तमिलनाडु का अन्नाद्रमुक है। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने बिहार में जदयू से गठबंधन करने के लिए अपनी 5 सीटों का बलिदान किया है। इन सभी पांचों सीटों पर भाजपा ने 2014 में जीत दर्ज की थी। कांग्रेस ने बीते सप्ताह ‘आप’ के साथ गठबंधन करने से मना कर दिया। इसके बावजूद कि 2014 में लोकसभा चुनाव में पार्टी को राष्ट्रीय राजधानी की सातों सीटों में से किसी पर भी जीत नहीं मिली थी और न ही वह दूसरे स्थान पर आ पाई थी। भारत में चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी भी बहुत ज्यादा कारगर नहीं है। गठबंधन के प्रभाव कि वोट शेयरों से तुलना कर शीर्षक तो बनाया जा सकता है। लेकिन परिणाम इसके उलट भी हो सकते हैं। 

इसके साथ ही इस तरह के विरोध से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि गठबंधन भारतीय राजनीति के लिए मायने नहीं रखता, विशेष कर देश की दो बड़ी पार्टियों के लिए। आंकड़ों की माने तो बीते तीन दशक में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को कम सीटों पर ही जीत मिली है। इसके उलट देश के दोनों बड़े दलों (भाजपा और कांग्रेस) ने जब भी सीमित सीटों पर चुनाव लड़ा तो उनकी जीत का आंकड़ा बड़ा रहा है। 2014 में नरेन्द्र मोदी की पूर्ण बहुमत वाली जीत सबसे बड़ा उदाहरण है। 2009 के मुकाबले भाजपा ने कम सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। 2009 में कांग्रेस की जीत इस पूरे आकलन में अपवाद है। उम्मीदवारों की संख्या और प्रदर्शन दोनों पार्टियों के लिए गठबंधन को बल देता है।

 इस विश्लेषण में 1989 के बाद से सभी आम चुनाव शामिल है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और भाजपा 2014 के मुकाबले 2019 में कम उम्मीदवार उतारती है या ज्यादा। विश्लेषण के दौरान यह जानकारी भी सामने आई कि सत्तारूढ़ पार्टियां गठबंधन को कम तवज्जो देती है जैसे कि कांग्रेस ने वर्ष 1996, 2009 और 2014 में पिछले चुनावों के मुकाबले ज्यादा उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस अपनी सरकार का पूरा कार्यकाल होने के बाद इन चुनावी मुकाबलों में उतरी थी। इसी तरह भाजपा ने 1999 के मुकाबले 2004 में ज्यादा उम्मीदवार चुनाव में उतारे थे। भाजपा ने 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में ज्यादा उम्मीदवार उतारे जिससे कम गठबंधन के बावजूद कांग्रेस के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई। इस बार लोकसभा चुनाव में 144 सीटों वाले 8 राज्यों में जहां भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है। 

अब तक की सूचनाओं के अनुसार इन 8 राज्यों- मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला है। इनमें तीन राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस सत्तारूढ़ है, वहीं शेष 5 राज्यों गुजरात, असम, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भाजपा सत्तारूढ़ है। इसलिए सत्तारूढ़ होने के कारण दोनों ही दल किसी दल से गठबंधन नहीं कर रहे लगते हैं। जबकि 169 सीटों वाले 5 राज्यों में संप्रग (यूपीए) और राजग (एनडीए) गठबंधनों के बीच मुकाबला होगा। इनमें महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना से कांग्रेस व राकांपा का मुकाबला होगा, वहीं बिहार में भाजपा जदयू और रालोपा से कांग्रेस, राजग का मुकाबला होगा। 

तमिलनाडु में भाजपा व अन्नाद्रमुक का गठबंधन कांग्रेस व द्रमुक के गठबंधन से भिड़ेगा। कर्नाटक में कांग्रेस व जद (एस) गठबंधन से भाजपा के सहयोगी दल और झारखंड में भी भाजपा और कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ मुकाबला करेंगे। सूत्रों के अनुसार जिन राज्यों में अभी तक विपक्षी दलों के बीच लोकसभा चुनावों के लिए गठबंधन अटके हुए हैं, वहां जल्द फैसले होंगे। इसमें पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्य शामिल है।



 

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