मन का कोई अंतिम संतुष्टि बिंदु नहीं होता

Samachar Jagat | Friday, 12 Apr 2019 02:16:01 PM
There is no final satisfaction point of mind

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इस दुनिया में सारा खेल मन का है और कहा जाता है कि मन बड़ा चंचल होता है और इसकी चंचलता का प्रभाव व्यक्ति की इच्छाओं पर बहुत पड़ता है। मन अनंत उड़ान भरता है तो इच्छाएं भी अनंत होती जाती हैं जो व्यक्ति के जीवन के सारे आनंद को खा जाती हैं और एक भी मिनट चैन का जीवन नहीं जीने देती हैं। इसी को सार्थक बनाती एक कहानी इस प्रकार से है- बहुत पहले एक राजा था जो अपनी प्रजा के बीच में बहुत ही प्रिय था। प्रजा उसे राजा होने के कारण ही प्रिय नहीं मानती थी, धनवान होने, सक्षम होने, सुंदर होने और उसके पास सब कुछ होने के कारण ही प्रिय नहीं मानती थी बल्कि उसकी प्रियता का मूल कारण तो राजा के द्वारा प्रजा को बेहद प्रेम करना, उनके सुख-दुख का ख्याल रखना और उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना था। राजा का रोज दरबार लगता, प्रजा की इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए। इस प्रकार से इच्छाओं की पूर्ति करते-करते राजा को इस बात को लेकर परेशानी होने लगी कि प्रजा की इच्छाएं तो बढ़ती ही जा रही है, कम नहीं हो रही।

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राजा इसी चिंता में बीमार पड़ गया। बहुत सारे वैद्य हकीम बुलवाए गए, लेकिन राजा स्वस्थ नहीं हुआ। प्रजा में शौक की लहर फैल गई। राजा को किसी ने एक नामी वैद्य के बारे में बताया और उस वैद्य को तुरंत बुलवाया गया। वैद्य ने राजा का निरीक्षण-परीक्षण बहुत अच्छे से किया। वैद्य जी के तुरंत समझ में आ गया कि राजा को तन की कोई बीमारी नहीं है, केवल मन की बीमारी है। वैद्य ने राजा को कहा कि आपके तन से संबंधित कोई बीमारी नहीं है, आपको सारी बीमारी केवल और केवल सोच की है। आप प्रजा की प्रत्येक इच्छा की पूर्ति करते हैं और ऐसा करते हुए आपको बहुत समय हो गया है, बावजूद इसके ये सब इच्छाएं कम होने के बजाय बढ़ी हैं। मेरी समझ से हर इच्छा की पूर्ति ठीक नहीं अगर ऐसा होता है तो फिर इच्छाएं अमरबेल की तरह फैलती जाती हैं।

इच्छाओं की पूर्ति में उचित-अनुचित का अंतर तो होना ही चाहिए। राजा को वैद्य का यह नुस्खा समझ में आ गया, अब उसने प्रजा की केवल उचित इच्छाओं की पूर्ति का मन बनाया और इसका प्रभाव इतना अच्छा रहा कि लोगों की इच्छाएं घटते-घटते बहुत घट गई और राजा की खुशियां बहुत बढ़ गई। मित्रो, जीवन इच्छाओं से प्रभावित-संचालित होता है, लेकिन हर इच्छा की पूर्ति जीवन के मूल मकसद, आनंद और सार्थकता को खा जाती है।

प्रेरणा बिन्दु:- 
मन चंचल मन उतावला
हर चीज का चावला
हर इच्छा कब पूरी होती
रे मानव तू बावला।
 

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