ये टुकड़े अब किसी के भी काम के नहीं

Samachar Jagat | Monday, 22 Apr 2019 04:27:02 PM
These pieces are no longer used by anybody

एक सीधा-शालीन जुलाहा था। वह अपने अच्छे व्यवहार और नेक कमाई से जाना जाता था। वह अपनी पत्नी के साथ कपड़े रंगने-बुनने का काम करता था। एक दिन कुछ लडक़े उसके घर पर आए। इनमें से एक लडक़ा धनवान बाप का बेटा था। वह शरारती भी बहुत था। जुलाहे ने उनकी आवभगत की और आने का कारण पूछा। एक लडक़े ने कहा कि मुझे वह साड़ी चाहिए, उसकी क्या कीमत है? जुलाहे ने उसकी कीमत 2 रुपए बतलाई। लडक़े ने उस साड़ी को लिया और उसके दो टुकड़े कर दिए। लडक़े ने अब उसकी कीमत पूछी। जुलाहे ने उसकी कीमत एक रुपए बतलाई। अब उस शरारती लडक़े ने उस साड़ी के टुकड़े पर टुकड़े कर फिर उसकी कीमत पूछने लगा और जोर-जोर से हंसने लगा।

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अब उसने साड़ी की कीमत के बजाय कहा कि ‘अब ये टुकड़े मेरे किसी भी काम के नहीं है। लो ये दो रुपए इसकी पूरी कीमत। इस पर जुलाहे ने कहा- बेटा, अब ये टुकड़े किसी के भी काम के नहीं है और जब किसी के भी काम के नहीं है तो फिर मैं इसकी कीमत कैसे ले सकता हूं?’
जुलाहे ने यह बात बहुत ही सहजता के साथ कही। इस पर लडक़े ने गुस्से में कहा- मेरे पास बहुत पैसे हैं और चूंकि मैंने ही इसके इतने सारे टुकड़े किए हैं, इसलिए आपको ये दो रुपए तो लेने ही पड़ेंगे। जुलाहे ने फिर मधुर स्वभाव से कहा कि- बेटा, इसकी कीमत अब बिल्कुल नहीं रही है क्योंकि अब यह किसी के काम की ही नहीं रही तो फिर इसकी दो रुपए से भरपाई कैसे हो सकती है? 

लडक़े ने जुलाहे से इसे और स्पष्ट करने के लिए कहा। जुलाहे ने लडक़े को बड़े प्रेम से समझाया- बेटा इस साड़ी को बनाने के लिए किसान ने पहले कपास तैयार की, उस कपास से रूई तैयार गई, उस रूई से कपड़ा तैयार हुआ, कपड़े की रंगाई का काम हुआ अर्थात् इसकी भरपाई केवल तभी हो सकती थी जब इसे पहना जाता। अब यह टुकड़ों-टुकड़ों हो गई तो किसी के भी काम की नहीं है। अब उस लडक़े के सब कुछ समझ में आ चुका था। उसके यह अच्छी तरह से समझ में आ चुका था कि जब एक साड़ी टुकड़ों-टुकड़ों होने पर किसी काम की नहीं रह जाती है तो फिर किसी इंसान की जिंदगी को टुकड़ों-टुकड़ों करने पर क्या से क्या हो सकता है।

अब उन लडक़ों का सिर शर्म के मारे झुक चुका था। उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी और जुलाहे से क्षमा याचना करने लगे। वह जुलाहा दक्षिण का महान संत तिरूवल्लुवर थे जिनका लिखा ‘कुरल’ आज भी श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है। आइए, हम ऐसी प्रतिज्ञा करें कि किसी की भी जिंदगी में कोई ठेस नहीं पहुंचे, कोई भी आहत नहीं हो, तभी हम राहत महसूस करेंगे।

प्रेरणा बिन्दु:- 
धन-दौलत आनी-जानी है
इससे ऐंठे अभिमानी है
दया प्रेम सहयोग मधुरता
लिखती इंसानी कहानी है।



 

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