वनस्पति और जीवों की दस लाख प्रजातियों को खतरा

Samachar Jagat | Thursday, 16 May 2019 11:13:29 AM
Threat to one million species of vegetation and organisms

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सयुक्त राष्ट्र ने बीते सप्ताह सोमवार को आकलन में कहा कि वनस्पति और जीवों की 10 लाख प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। निकट भविष्य में होने वाली यह विलुप्ति एक करोड़ वर्षों की तुलना में कई हजार गुना तेजी से होगी। रिपोर्ट का दावा है कि पृथ्वी से डायनासोर विलुप्ति के बाद यह सबसे बड़ी विलुप्ति संबंधी घटना बन जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के 450 विशेषज्ञों द्वारा तैयार ‘समरी फॉर पॉलिसी मेकर्स’ रिपोर्ट ने यह परिणाम दिए हैं। इस रिपोर्ट को 182 देशों की बैठक में मान्यता दी गई। कहा गया है कि इंसान उसी प्रकृति को नष्ट कर रहा है।

जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर है। खामियाजा प्रजातियां भुगत रही है। जर्मनी में हेल्महोल्तज सेंटर फॉर एनवायर्नमेंटल रिसर्च के विशेषज्ञों ने कहा है कि फिलहाल मनुष्यों पर खतरा नहीं है, पर लंबे समय में यह संभव है। संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट चेताती है कि जीव एवं पौधों की 10 लाख प्रजातियों में से कई प्रजातियों पर खतरा मंंडरा रहा है। पृथ्वी की करीब 80 लाख प्रजातियां कई हजार गुना तेजी से खत्म हो रही है। आशंका है कि 6 करोड़ 60 लाख साल पहले डायनासोर के विलुप्त होने के बाद से पृथ्वी पर पहली बार इतनी अधिक प्रजातियां विलुप्त होगी। मानवता उसी दुनिया को नष्ट कर रही है, जिस पर उसका अस्तित्व है। 

लघुकाल में मनुष्यों पर खतरा नहीं होगा, लेकिन दीर्घकाल में उनके लिए मुश्किल होंगे हालात। संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता व पर्यावरण संरक्षण द्वारा 15 हजार स्त्रोतों से एकत्र एक हजार आठ सौ पेज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मनुष्य की प्राकृति संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की प्रवृति ने मानव के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी ताजे पानी, स्वच्छ हवा व उत्पादक मिट्टी को भी संकट में डाल दिया है। लगातार बढ़ते तापमान को लेकर भी चिंता जाहिर की गई है, जो फिलहाल एक डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ चुका है और सदी के अंत तक तीन डिग्री बढ़ने की आशंका है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के प्रयास और जैव विविधता का विनाश एक दूसरे को बढ़ाते हैं। औद्योगिक कृषि और वनों की कटाई से पारिस्थितिकीय तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

वनों की अंधाधुंध कटाई का दुष्प्रभाव देखना हो तो मेघालय, जिसे बादलों का घर कहा जाता था और चेरापूंजी जहां दुनिया में सर्वाधिक बरसात होती थी, वहां अब सूखा देखने को मिल रहा है। मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन समस्या को और विकट बना रहा है। हर साल ब्रिटेन के आकार के उष्ण कटिबंधीय वनों का कटान से जहां जैव विविधता का संकट गहराया है, वहीं कार्बन डाई आक्साइड भी बढ़ रही है। जिसके चलते हजारों प्रजाति के जीव अपने मूल अधिवास से बेदखल कर दिए गए हैं। ग्लोबल वार्मिंग के संकटों ने इसमें इजाफा ही किया है। दुनिया के तमाम देशों के जंगलों में लगने वाली आग से दुर्लभ वन व जीव प्रजातियां खत्म होने के कगार पर है। मगर इसके बावजूद दुनिया में इस समस्या के समाधान के साझे प्रयास नहीं हो रहे हैं।

 इस भयावह संकट को गंभीरता से लेने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की जारी हालिया रिपोर्ट में उन खतरों के प्रति आगाह किया गया है, जो मनुष्य की भौतिकतावादी सोच व विलासिता के जीवन से उपजी त्रासदी की देन है। कहीं न कहीं ग्लोबल वार्मिंग का जो डरावना स्वरूप हमारे सामने है, वह इसी खतरे की ओर इशारा करता है जो मनुष्य के अतीत व भविष्य के निर्धारण के कारकों से जुड़ा है। वनों की कटाई, समुद्र में भारी प्रदूषण, मिट्टी व हवा की जीवन दायिनी शक्ति का घटना इसके मूल में है। 

जिसकी हम तमाम चेतावनियों के बावजूद अनदेखी कर रहे है। दरअसल, संकट से निपटने के लिए हमें बड़े बदलावकारी परिवर्तनों के लिए तैयार रहना होगा। इसमें हमारे विलासिता के उपभोग पर अंकुश लगाने की जरूरत है। विकास को प्रकृति के अनुरूप ढ़ालने की जरूरत है। वहीं अर्थव्यवस्था का ढांचा भी बदलना होगा। कॉरपोरेट खेती के ढांचे को भी बदलने की जरूरत है, जिसके लिए जंगलों को अंधाधुंध काटा जा रहा है।

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